विष्णु पुराण

अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।

लक्षद्वये तु भोमस्य स्थितो देवपुरोहितः।।

शोरिबृंहस्पतेश्चोर्ध्व द्विलक्षे समवस्थितः।

सप्तर्षिमंडल तस्माल्लक्षमेकं द्विजोत्तम।।

ऋषिभ्यस्तु सहस्राणां शतदूर्ध्व व्यवस्थितः।

मेढोभूत समस्तस्त ज्योतिश्चक्र य वै ध्रुवः।।

त्रैलोक्यनेतत्कथितमुत्सेन महामुने।

दृज्याफलस्य भूरेषा इज्या चात्र प्रतिष्ठिता।।

ध्रुवावाध्वं महार्लोको यत्र ते कल्पदासिनः।

ऐकयोजनकोटिस्तु यत्र ते कल्पवासिनः।।

द्वे कोटो तुम जनो लोको यत्र ये ब्राह्मणः सुताः।

सनन्दनाद्याः प्रथिताः मैत्रेयामलचेतसः।।

चतुर्गणोत्तरे चोर्ध्व जनलोकोत्तपः स्थितम।

वैराजा यप्र ते देवाः स्थिता दाहविवर्जिता।।

शुक्र से दो लाख योजन दूर मङ्गल और मङ्गल से भी दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति हैं। बृहस्पति से दो लाख योजन की ऊंचाई तक शनि और शनि से एक लाख योजन ऊंचा सप्तर्षि-मंडल हैं। उस सप्तर्षि-मंडल से एक लाख योजन ऊपर संपूर्ण ज्योति चक्र की नाभि के समान ध्रुव-मंडल है। हे महामुने! मैंने तुम्हें तीनों लोकों की ऊंचाई का परिमाण बता दिया। यह तीनों लोक यज्ञफल की भोग भूमि कहे हैं, परंतु यज्ञानुष्ठान की भूमि यह भारत वर्ष ही है। ध्रुव से एक करोड़ योजन ऊंचा महर्लोक है, जहां कल्प के अंत तक रहने वाले भृगु आदि सिद्धगण निवास करते हैं। हे मैत्रेयजी! उससे भी दो करोड़ योजन ऊंचाई पर जन लोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक स्थित है जहां दाह विवर्जित वैराज नामक देवता वास करते हैं।

षड्गुणेन तपोलोकात्सत्यलोको विराजते।

सपुनर्मारका यत्किचिद्वत्श्वस्ति पृथिवीमयम।।

स भूर्लोकः समारयाता विस्तरोऽस्य मयोदितः।

भूमिसूर्यान्तरं यच्चसिद्धादिमुनिसेवितम्।।

भुवर्लोकस्तु योऽप्येक्तो द्वितीयो मुनिसत्तम।

धु्रवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश।।

स्वर्लोक सोऽपि गदितो लोकसंस्थानविन्तकै।

त्रैलोक्यनेतत्कृतक मैत्रेय परिपठयते।।

जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतक त्रयम्।

कृतकाकृतयोमध्ये महर्लोक इति स्मृतः।

शून्यो भवंति कल्पांते योऽत्यंत न विनश्यति।।

तप लोक से बारह करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक है, उसी को ब्रह्मलोक कहते हैं, इस लोक में पुनः मृत्यु को प्राप्त न होने वाले अमगरगण रहते हैं। परंतु अंङ्ग संचार के योग्य पार्थिव वस्तु भूर्लाेक ही है उसका विस्तार मैं पहिले ही कह चुका हूं। पृथिवी और सूर्य के बीच से सिद्धों और मुनियों द्वारा सेवित स्थान भूवर्लोक है। सूर्य और धु्रव के मध्य में चौदह लाख योजन की दूरी है, उसे लोकस्थित के विकारकों से स्वर्लोक कहा है। हे मैत्रेयजी! यही भूः, स्वः, कृतज्ञ त्रैलाक्य कहा गया है तथा जन, तप और सत्य ‘अकृतक’ तीन लोक हैं। इन कृतक और अकृतक त्रैलोक्य के बीच में महर्लोक बताया जाता है, कल्प के अंत में ही जन-शून्य होता है। उसका अत्यंत नाश नहीं होता।

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