वैश्विक समस्याओं का समाधान दूर

भारत डोगरा

स्वतंत्र लेखक

यदि हम विश्व की सबसे गंभीर समस्याओं के समाधान के प्रयासों का विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि इनमें संतोषजनक प्रगति से अभी हम बहुत दूर हैं। कुछ अति गंभीर समस्याओं के समाधान की तरह जो गतिविधियां दिखती भी हैं, तो वे या इतनी कम रही हैं कि समस्याएं जहां की तहां मौजूद हैं या फिर कई मामलों में इनकी स्थिति पहले से और भी जटिल हो गई है। इस संदर्भ में हम महाविनाशक हथियारों की स्थिति देख सकते हैं। वर्ष 1945 में जापान के दो शहरों-हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु बमों के उपयोग से दुनियाभर को यह तो पता चल ही गया था कि यह खतरनाक, विध्वंसक हथियार है तथा इससे धरती का जीवन ही खतरे में पड़ जाएगा। इसके बावजूद ब्रिटेन और अमरीका में यह विचार उछाला गया कि सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथियार बनाने से पहले ही उस पर परमाणु हथियारों का एक बड़ा हमला कर दिया जाए, ताकि उसकी सैन्य क्षमता सदा के लिए नष्ट हो जाए। हालांकि इस सोच पर अंततः कोई कार्रवाई  तो नहीं की गई, पर सत्ता के उच्चतम स्तर पर काफी चर्चा जरूर हुई। विशेषकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विनस्टन चर्चिल का नाम इस विचार से जोड़ा गया। तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा परमाणु बम बना लेने के बाद उसमें व अमरीका में परमाणु हथियारों की होड़ आरंभ हुई। यह इस हद तक बढ़ी कि 1980 के दशक में विश्व में परमाणु हथियारों की संख्या करीब 60,000 के आसपास तक पहुंच गई थी। इसी दौर में विश्व को कई बार पूरी तरह उजाड़ने से भी कहीं अधिक विध्वंसक हथियारों का जखीरा मौजूद था। ऐसे में इन दोनों देशों के अपेक्षाकृत समझदार विशेषज्ञों व नेताओं ने यह समझा कि इतने परमाणु हथियारों को रखने का कोई औचित्य ही नहीं है। इस दौरान कतिपय देशों के बीच परमाणु हथियारों के मैदानी उपयोग की नौबत तक आ गई थी और नतीजे में इस कारण भी नियंत्रण की कुछ जरूरत समझी गई। इसी दौर में कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण समझौते भी हुए, जिनके चलते परमाणु हथियारों की संख्या में कमी आई और उनके उपयोग की संभावना भी कम हुई, लेकिन तब भी 2017-18 में विश्व में लगभग 14,500 हथियारों का विशाल जखीरा मौजूद था। यही वह दौर था जब परमाणु हथियारों की होड़ में नई तेजी आई और अमरीका ने परमाणु हथियारों के नवीनीकरण में भारी निवेश किया। नतीजे में रूस व चीन भी इसमें लग गए। इन तीनों देशों ने नए रोबोट हथियारों में भी बहुत निवेश किया, जो पुराने हथियारों से कई गुना ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं। एक तरफ परमाणु हथियारों की बेतहाशा बढ़ोतरी और दूसरी तरफ अमरीका व रूस के बीच परमाणु हथियारों के नियमन को लेकर हुए समझौतों की समाप्ति पृथ्वी के जीवन पर खतरा बढ़ा रहे हैं। आजकल परमाणु हथियारों की संख्या की रिपोर्टिंग भी ठीक से नहीं हो रही है, तो संभव है कि इनकी संख्या नए सिरे से कई गुनी बढ़ी हो। इस समय परमाणु हथियारों से विध्वंस की संभावनाएं नई ऊंचाइयों पर हैं। जाहिर है, यह समस्या अपने समाधान से कोसों दूर है। एक और गंभीर समस्या जलवायु परिवर्तन को लें, तो वर्ष 1990 के आसपास यह स्पष्ट हो गया था कि यह संकट दुनिया को समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके बावजूद तब से अब तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में बहुत वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-17 के बीच इस वृद्धि पर कुछ रोक लगी थी, पर वर्ष 2018 में फिर से वृद्धि दर्ज हुई, जबकि जरूरत उसमें बहुत भारी कमी की थी। इनसानी जीवन के लिए ग्रीन हाउस गैसों में जितनी कमी की जरूरत है, वर्ष 1990 के बाद अब तक नहीं हो सकी है और दूर-दूर तक इसकी संभावना भी नजर नहीं आ रही है। विश्व में विभिन्न जीव, वनस्पति प्रजातियों के लुप्त होने या संकटग्रस्त होने की समस्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। वन-विनाश बढ़ा है, विभिन्न प्रजातियों के आश्रय-स्थल पहले से अधिक तेजी से तबाह हो रहे हैं। अनेक नए खतरे उत्पन्न करने वाले उत्पादों व उपकरणों में अभूतपूर्ण तेजी आई है। वायु व जल प्रदूषण बहुत बढ़ गए हैं। विश्व के अनेक भागों में जल-संकट असहनीय स्थिति में पहुंच रहा है। विश्व के सबसे तनावग्रस्त क्षेत्रों के समाधान जहां के तहां हैं। फिलिस्तीन का ही उदाहरण लें, तो पिछले सात दशकों में समाधान के नाम पर बहुत कुछ किया गया, पर फिलिस्तीन के न्यायसंगत संसाधनों की दृष्टि से विश्व-बिरादरी आज भी उतनी ही दूर है, जितनी पहले थी। विश्व के अनेक देशों में लोकतंत्र संकट में है, तानाशाही व फासीवादी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायसंगत सहयोग की संभावना कम हो रही है। विश्व में वित्त व व्यापार के अंतरराष्ट्रीय संस्थान विषमता व अन्याय की समस्याएं कम नहीं कर रहे हैं, अपितु उन्हें बढ़ा रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि कब तक धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं तक को खतरे में डाला जाएगा? जो सबसे खतरनाक, आसन्न समस्याएं हैं, क्या कम-से-कम उनका समाधान तत्काल हो सकेगा? यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं के ‘टिपिंग प्वाइंट’ हैं, जिनसे आगे बढ़ने पर वे अनुमान के नियंत्रण से भी बाहर निकल सकती हैं। आज के विश्व को बहुत गंभीरता से सोचना पड़ेगा कि आखिर सबसे कठिन, खतरनाक समस्याओं के समाधान में अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल रही है? क्या यह अंतरराष्ट्रीय गवर्नेंस की कमी है? क्या विश्व स्तर पर जो सहयोग की सीमित क्षमता है, इसके लिए जो अंतरराष्ट्रीय संस्थान हैं, वे विश्व की सबसे गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए अपर्याप्त हैं? क्या विश्व की अर्थव्यवस्था की मूल प्रवृत्तियां इन संकटों (विशेषकर पर्यावरणीय संकटों) के समाधान के प्रतिकूल हैं? क्या विश्व में प्रचलित, प्रभावी जीवन-मूल्य है, वे इन समस्याओं के समाधान के प्रतिकूल हैं? इन सवालों का जवाब यदि हां है, तो हमें बड़े बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए, इस दिशा में बढ़ना चाहिए, इसके अनुकूल सोच बनानी चाहिए।

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