शहनाज की मम्मी बीमार हुई तो खुशियां छिन गईं

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन ः एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है दसवीं किस्त…

-गतांक से आगे…

वह जानी-पहचानी सीढि़यों से भागते हुए कमरों की भूल-भुलैया में दौड़ने लगी। वह घर अपने भाई वल्ली के साथ लुका-छिपी खेलने के लिए एकदम बढि़या था। 50 कमरों का आलीशान घर। वह अपनी स्कूल की किताबों को मेज पर करीने से लगाकर शाम होने का इंतजार करतीं, जब उस पर जान छिड़कने वाले अब्बू घर आ जाते। छोटी शहनाज सहजता से स्कूली जीवन में रच-बस गईं। स्कूल में समय बिताना अब उन्हें रास आने लगा था और उन दिनों में एक दिन ऐसा भी था, जब मानो उनकी हंसती-खेलती दुनिया एकदम से थम गई थी। वह दिन उन्हें अच्छी तरह से याद है। उन्होंने ध्यान दिया था कि कुछ दिनों से उनकी अम्मी कुछ पीली लगने लगी थीं। अब वह शाम को घूमने भी नहीं जाती थीं और बच्चों के स्कूल से आने पर, खाने की मेज पर उनका इंतजार करती हुई भी नहीं मिलती थीं। जब भी शहनाज उनके बारे में पूछतीं, तो जवाब मिलता, ‘मम्मी सो रही हैं, क्योंकि वह बहुत थक गई हैं।’ घर में रोज-रोज डाक्टरों के आने से बच्चे निराश थे और सोचते थे कि कुछ तो गड़बड़ है। छोटी शहनाज कभी भी अपनी मां से दूर नहीं रही थीं। उस दिन वह दरवाजे के पीछे छिपकर चुपचाप अपने पिता और अंग्रेज डाक्टर मर्चेंट की बात सुनने लगीं। वह डा. सईदा बेगम का इलाज कर रही थीं और उनकी लगातार गिरती सेहत के बारे में उनके शौहर को बता रही थीं। ‘उन्हें फेफड़ों में तकलीफ है। बदकिस्मती से यह पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता। पेंसिलीन से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है और इसे और बढ़ने से रोका जा सकता है।’ ‘मेरे पास और कितने दिन हैं?’ सईदा बेगम ने रोते हुए पूछा। ‘वैल, यह तो निर्भर करता है…’ डा. मर्चेंट टालने की कोशिश करने लगीं, लेकिन अपने पेशेंट की आंखों में देखते हुए उन्हें मानना पड़ा, ‘लगभग तीन साल।’ अपने वालदैन के गंभीर चेहरों को देखते हुए, शहनाज सुबकने लगीं और बरामदे से भागते हुए नीचे अपने भाई के कमरे में पहुंच गईं। ‘मम्मी मरने वाली हैं, मैंने अभी डाक्टर से सुना है। उन्होंने का है कि मम्मी मरने वाली हैं।’ छोटी बच्ची बेबसी से रो रही थी। उसी दिन से घर का माहौल बेइंतहा बदल गया, जैसे मानो घर की खुशियों को लकवा मार गया हो। घर के बच्चे डरे-सहमे से रहने लगे। शहनाज, जो उन सबमें छोटी थी, कुछ ज्यादा ही सुबकती थीं। उनका बड़ा भाई, उन्हें शांत कराने की नाकाम कोशिश करता, उस समय वह उनका सबसे नजदीकी दोस्त और सहायक बन गया था। लीविंग रूम को उनकी मां के लिए अस्पताल के कमरे में बदल दिया गया था और बच्चों को उसमें जाने की सख्त मनाही थी। वे खिड़की के पास खड़े होकर उसके शीशे से अपनी मां को देखते थे, उनके चेहरों पर चिंता और डर के भाव साफ दिखते थे।   

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