शारीरिक खेलों का महत्त्व

 हितेंद्र शर्मा, शिमला

‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ शरीर को स्वस्थ व निरोगी रखना ही मनुष्य का सर्वप्रथम धर्म है, क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। यदि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे, तभी हम अपना प्राणिक, बौधिक और आध्यात्मिक विकास करने में समर्थ होंगे। खेल हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के अभिन्न अंग हैं। यह हमारा दुर्भाग्य रहा है कि हम अपने पारंपरिक खेलों में रुचि नहीं रखते। खेलों के नाम पर सिर्फ ‘क्रिकेट’ ही नजर आता है, जिसके लिए देश-विदेश हर जगह लोग पागल हैं, लेकिन वर्तमान दौर ज्यादा खतरनाक चल रहा है, जहां खेल के नाम पर सिर्फ ऑनलाइन गेम्स, कम्प्यूटर व मोबाइल हैं। निष्क्रिय शरीर, मोबाइल रेडियेशन और मनोविकार का यह दौर तकनीक से ज्यादा मीठे जहर का विस्तार है। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कल्पना करना ही विरोधाभासी है।

 

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