श्रीसनकादि मुनि

गतांक से आगे… 

यह चारों कुमार किसी भी प्रकार की अशुद्धि के आवरण से रहित हैं, परिणामस्वरूप इन्हें दिगंबर वृत्ति वाले जो नित्य नूतन और एक समान रहते हैं कहा जाता है। तत्त्वज्ञ  योगनिष्ठ में निपुण, समद्रष्टा सभी को एक सामान देखना तथा ब्रह्मचर्य से युक्त होने के कारण इन्हें ब्राह्मण कहा जाता है। ब्रह्मा जी ने समस्त देवताओं को एक घटना से अवगत करवाया। तुम्हारे पूर्वज तथा मेरे प्रथम मानस पुत्र सनकादि ऋषि आसक्ति का त्याग कर समस्त लोकों में आकाश मार्ग से विचरण किया करते थे। एक बार वे वैकुंठ में गए, वहां पर सभी साक्षात विष्णु स्वरूप ही होते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग कर केवल भगवत शरण युक्त रहते हैं। वहां सर्वदा भगवान नारायण भक्तों को सुख प्रदान करने हेतु शुद्ध सत्व मय रूप धारण कर रहते हैं। परम सौंदर्य शालिनी देवी लक्ष्मी जी, जिनकी कृपा प्राप्त करने हेतु देवगण भी आतुर रहते हैं, श्री हरि के धाम में अपनी चंचलता त्याग कर स्थित रहती हैं। जब सनकादि ऋषि वैकुंठ में पहुंचे, तो वहां के मनोरम वन, सरोवरों में खिली हुई वासंतिक माधवी लता की सुमधुर गंध, मुकुंद, तिलक वृक्ष, उत्पल (रात्रि में खिलने वाले कमल) चंपक, अर्ण, पुन्नाग, नागकेसर, बकुल, अंबुज (दिन में खिलने वाले कमल) पारिजात आदि पुष्पों की सुगंध से उन्हें बड़ा ही आनंद हुआ। भगवान दर्शन की इच्छा से वहां के मनोरम रमणीय स्थलों को देखकर छठी ड्योढ़ी पार कर जब वे सातवीं पर पहुंचे, उन्हें हाथ में गदा लिए दो पुरुष दिखें। सनकादि ऋषि बिना किसी रोक-टोक के सर्वत्र विचरण करते थे, उनकी सभी के प्रति समान दृष्टि थीं, सर्वदा वे दिगंबर वेश धारण करते थे। वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्व ज्ञानी थे, ब्रह्मा जी के सर्वप्रथम संतान होते हुए भी वे सर्वदा पांच वर्ष के बालक की आयु वाले थे। इस प्रकार निःसंकोच हो भीतर जाते हुए कुमारों को जब द्वारपालों ने देखा,उन्होंने शीलस्वभाव के विपरीत सनकादि के तेज की हंसी उड़ाते हुए उन्हें रोक दिया। भगवान दर्शन पर जाते हुए कुमारों को द्वारपाल के इस कृत्य पर क्रोध आ गया। सनकादि कुमारों ने द्वारपालों से कहा! तुम तो भगवान समान ही समदर्शी हो, परंतु तुम्हारे स्वभाव में यह विषमता कैसी? भगवान तो परम शांत स्वभाव के हैं,उनका किसी से विरोध भी नहीं हैं, तुम स्वयं कपटी हो परिणामस्वरूप दूसरों पर शंका करते हो। भगवान के उदर में यह संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित हैं, यहां रहने वाले ज्ञानीजन सर्वात्मा श्री हरि विष्णु से कोई भेद नहीं देखते हैं। तुम दोनों हो तो भगवान के पार्षद, परंतु तुम्हारी बुद्धि बहुत ही मंद है, तुम काम, क्रोध, लोभ युक्त प्राणियों की पाप योनि में जन्म धारण करो। सनकादि के इस प्रकार कठोर वचनों को सुनकर, अत्यंत दीन भाव से युक्त हो पृथ्वी पर पड़ कर उन दोनों ने कुमारों के चरण पकड़ लिए। वे जानते थे कि ब्राह्मण के श्राप का उनके स्वामी श्री हरि विष्णु भी खंडन नहीं कर सकते हैं, वे भी ब्राह्मणों से बहुत डरते हैं। इधर जब भगवान को ज्ञात हुआ कि उनके द्वारपाल एवं पार्षद जय तथा विजय ने सनकादि साधुओं का अनादर किया है, वे स्वयं लक्ष्मी जी सहित उस स्थान पर आए। परम दिव्य विग्रह वाले श्री हरि विष्णु तथा लक्ष्मी जी को देखकर सनकादि कुमारों ने उन्हें प्रणाम किया। उनकी दिव्य, मनोहर छवि को निहारते हुए कुमारों के नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे। भगवान श्री हरि विष्णु ने उन कुमारों से कहा, यह जय तथा विजय मेरे पार्षद हैं, इन्होंने बड़ा अपराध किया है, आप मेरे भक्त हैं, इस प्रकार मेरी ही अवज्ञा करने के कारण आपने जो दंड इन्हें दिया हैं, वह उचित ही है। मेरी निर्मल सुयश सुधा में गोता लगाने वाला चांडाल भी क्यों न हो तुरंत पवित्र हो जाता हैं, तत्काल समस्त पापों को नष्ट कर देती है, मेरे उदासीन होने पर भी लक्ष्मी जी मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ती हैं। ब्राह्मण, दूध देने वाली गउएं तथा अनाथ प्राणी मेरे ही शरीर हैं। भगवान श्री हरि ने अपने द्वारपाल जय तथा विजय से कहा! तुम्हें यह श्राप मेरी इच्छा के अनुसार प्राप्त हुआ है, यही तुम्हारी परीक्षा है। तीन जन्मों तक तुम्हारा जन्म दैत्य योनि में होगा तथा मैं तुम्हारा प्रत्येक जन्म में उद्धार करूंगा, उस योनि से मुक्ति प्रदान करूंगा। श्राप के कारण तुम दोनों प्रथम जन्म में हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यप बनोगे, द्वितीय में रावण तथा कुंभकर्ण तथा तृतीय जन्म में शिशुपाल तथा दंतवक्र बनोगे।

 

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