श्री गोरख महापुराण

इतना सुन दत्तात्रेय जी मुस्करा कर बोले, मैं अमी ऋषि का पुत्र हूं और सब मुझे दत्तात्रेय कहकर संबोधन करते हैं। अब बेटा तुम्हारी जो इच्छा हो सुख से कहो। यह सुनकर मछेंद्रनाथ का रोम-रोम प्रफुल्लित हो गया। उन्होंने विचारा आज मेरी तपस्या फलीभूत हो गई। इस प्रकार प्रसन्नचित्त हो अपना मस्तक उनके चरणों में झुका दिया और अपने नैनों से प्रेम आंसू बहाकर दत्तात्रेय जी के चरण धो डाले…

मैं  तो कितनी मेहनत से मछलियां पकड़ कर लाता हूं और तू उन्हें पानी में बहा रहा है। अब खाएगा क्या, खाक? भीख मांगनी पड़ेगी भीख। अब मछलियां पानी में मत छोड़ना। इतना कहकर वह तीसरी बार मछलियां पकड़ने के लिए पानी में चला गया। मछलियों के कारण पिता से पड़ी डांट से मछेंद्र को काफी दुख हुआ। उसने सोचा-मेरा ये अधर्मी पिता मानने वाला नहीं है। इससे तो भीख मांगकर खाना ज्यादा अच्छा है। इसलिए अब जब भी खाना खाऊंगा भीख मांगकर ही खाऊंगा। पिता को मछलियां पकड़ने में मगन देख उसकी नजर से बचकर वह बद्रिकाश्रम के रास्ते चल दिया। मछेंद्र काफी दिनों बद घूमता-फिरता बद्रिकाश्रम जा पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने बारह साल तक कठिन तपस्या की, जिससे शरीर ढांचा मात्र ही रह गया। उसके शरीर में हड्डियां ही हड्डियां दिखाई देती थीं। इधर भगवान दत्तात्रेय शिवालय पधारे और शिवजी की उपासना कर महादेव का मन मोह लिया। तब शिवजी ने भुजा भेंट देकर आलिंगन किया और अपने पास बैठाकर एक ने दूसरे का कुशल समाचार पूछा। फिर दोनों बद्रिकाश्रम की रमणीकता देखने चल पड़े और धर्म चर्चा करते हुए उसी वन के निकट जा पहुंचे जहां मछेंद्रनाथ तप कर रहे थे। जब भाग्य उदय होता है तो इसी प्रकार कारण बन जाते हैं। इसी कारण से शिवजी की दत्तात्रेय जी को साथ लेकर वन विहार की इच्छा हुई। दोनों को ही बद्रिकाश्रम की वन शोभा देखकर अपार आनंद हुआ।

श्री गोरख महापुराण-दूसरा भाग प्रारंभ ः

भगवान शिवजी और दत्तात्रेय  वन विहार करते हुए भागीरथी के तट पर घूम रहे थे तभी एकाएक उनकी दृष्टि तप करते हुए मछेंद्र नाथ पर पड़ी। कलियुग में ऐसी कठिन तपस्या देखकर दत्तात्रेय जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर एक जगह रुक कर शिवजी ने दत्तात्रेय को कोतूहल दिखा मछेंद्रनाथ के पास पूछताछ को भेजा। दत्तात्रेय जी मछेंद्रनाथ के पास गए और पूछा- बेटा तुम कहां किस उद्देश्य से तपस्या कर रहो हो? इस पर मछेंद्रनाथ ने अपने दोनों नैन खोल हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोले, प्रभु मुझे यहां तप करते बारह वर्ष बीत गए और मुझे यहां एकांत में कोई मनुष्य नजर नहीं आया। आज अचानक ही आप क्यों पूछ रहे हैं? पहले आप ही बतलाएं कि आप कौन हैं? मैं समझता हूं जब आज आपके दर्शन हुए हैं तो मेरी मनोकामना पूर्ण होने का वक्त आ गया है। इतना सुन दत्तात्रेय जी मुस्करा कर बोले, मैं अमी ऋषि का पुत्र हूं और सब मुझे दत्तात्रेय कहकर संबोधन करते हैं। अब बेटा तुम्हारी जो इच्छा हो सुख से कहो। यह सुनकर मछेंद्रनाथ का रोम-रोम प्रफुल्लित हो गया। उन्होंने विचारा आज मेरी तपस्या फलीभूत हो गई। इस प्रकार प्रसन्नचित्त हो अपना मस्तक उनके चरणों में झुका दिया और अपने नैनों से प्रेम आंसू बहाकर दत्तात्रेय जी के चरण धो डाले। फिर हाथ जोड़ कर बोले, प्रभु आप तो साक्षात अंतर्यामी हो। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आप तीनों का ही एक रूप हो। परंतु इस दास को आप भूल कैसे गए? अब मेरे सारे दुर्गुणों को दूर करने की कृपा करें। ऐसा कह बार-बार मस्तक उनके चरणों पर रखने लगे। तब दत्तात्रेय जी ने कहा, बेटा अब चिंता मत करो। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होने का वक्त आ गया है। इतना कह कर दत्तात्रेय जी ने अपना हाथ मछेंद्र के शीश पर रख कर कान में मंत्र फूंका जिससे मछेंद्रनाथ के अज्ञान का नाश हो गया और चारों ओर उन्हें ब्रह्मा ही ब्रह्मा नजर आने लगा।                  

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