श्री गोरख महापुराण

मछेंद्रनाथ के जन्म के समय शिव और गौरा पार्वती कैलाश पर्वत पर पधार रहे थे, तभी पार्वती ने महादेव से कहा-आप किस मंत्र का जाप करते हैं वह मंत्र मुझे भी बताने की कृपा करें। इतना सुन शिव मुस्कराकर बोले – देवी इस मंत्र के लिए एकांत होना परम् आवश्यक है। उठो अब चलकर एकांत स्थल ढूंढें। ऐसा कह दोनों प्राणी उठ खड़े हुए और घूमते-घूमाते समुद्र तट पर जा पहुंचे। जहां किसी भी मनुष्य का कोसों तक वास नहीं था।  इसलिए उन्हें वही स्थान पसंद आया। दोनों प्राणी वही पर आसन बिछाकर विराजमान हो गए, तब शिवजी ने महामाया पार्वती को ब्रह्मज्ञान का उपदेश सुनना आरंभ किया, परंतु जिस मछली ने ब्रह्म वीर्य निगल कर गर्भ धारण किया था वह मछली पास ही पानी में थी। मछली मां के गर्भ में उन मंत्रों को जीव अहम्भावना तज ब्रह्मरूप हो गया। कथा समाप्ति के बाद महादेव ने पार्वती जी से पूछा कि – कुछ कथा का सार समझी? गर्भ के भीतर से मछेंद्रनाथ बोले – सब कुछ ब्रह्मरूप है। दूसरी आवाज सुनकर शिवजी ने उस ओर देखा तब जाना कि मछली के गर्भ से कवि नारायण जन्म लेने वाले हैं। ऐसा समझ शिवजी बोले – तुम्हें मेरे उपदेश से महान ज्ञान लाभ हुआ है, लेकिन पूर्ण उपदेश लाभ दत्तात्रेय जी के दर्शनों द्वारा होगा। तुम सामर्थ होने पर बद्रिकाश्रम आना वहीं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। इतना कहकर शिवजी पार्वती को संग ले कैलाश पर्वत को चले गए और मछेंद्रनाथ मछली मां के उदर में शिवजी से सुने मंत्र का जाप करने लगे। पूरे दिन होने पर मछली मां समुद्र के बाहर अंडा देकर वापस समुद्र में चली गई। कुछ समय उपरांत एक बगुला मछली पकड़ने समुद्र तट पर आया और वहां अंडा पड़ा देखकर अपनी तेज चोंच से अंडा फोड़ने लगा। अंडे के भीतर से हुआ, हुआ की तेज आवाज सुनकर बगुला भाग गया। कुछ देर बाद कामिक नामक एक मछुआरा वहां आया और सूर्य के समान तेज मुख वाला, रोता हुआ बालक देखकर उसका दिल भर आया। वह सोचने लगा कि यह प्रभु का प्रसाद तो मुझ अभागे को मिला दिखाई देता है। इतने में ही आकाशवाणी हुई हे कामिका! यह बालक यहां तो तड़प-तड़प कर मर जाएगा। यह कवि नारायण का अवतार है। इसे अपने  घर ले जाकर पुत्र समान इसका लालन-पालन कर और इसका नाम मछेंद्रनाथ रखना। तेरे सब पाप नष्ट होकर सारा कुल तर जाएगा और पृथ्वी पर तेरा नाम अमर हो जाएगा। आकाशवाणी सुन कामिक बालक को अपने घर ले जाकर  अपनी पत्नी से बोला – यह बालक हमें भगवान ने दिया है। पत्नी ने बालक को गोद में लेकर दूध पिलाया, तब तक कामिक ने सारी घटना बयान कर दी। तब (सार दत्ता) ने खुश हो बालक को नहला-धुला, कपड़े पहना झूले में सुला दिया। एकाएक अपूर्व सुंदर बालक के मिलने से पति-पत्नी दोनों को ही आनंद हुआ। धीरे-धीरे बालक मछेंद्र पांच साल का हो गया।  तब उसके पिता कामिक उसे एक दिन उसे मछली पकड़ने समुद्र तट पर अपने संग ले गया। जब उसने मछली पकड़ने के लिए अपना जाल फैलाया तब बहुत सी मछलियां जाल में आ फंसी। मछेंद्र के पिता ने उन्हें टोकरे में भरकर अपने बेटे के पास रख दिया। अपने पिता का यह कार्य देख बालक ने सोचा मेरे मातृ वंश का हनन करने वाला कसाईयों जैसा कार्य मेरे पिता करें, यह मैं कैसे बर्दाश्त कर सकता हूं? आस्तिक ऋषि ने जिस तरह जन्मेयजय के यज्ञ से सर्पों के कुल को बचाया था। उसी तरह मुझे भी अपने पिता को समझाकर यह उद्योग बंद करवाना चाहिए। ऐसा विचार कर बालक मछेंद्र ने एक -एक मछली पानी में डालकर सारा टोकरा खाली कर दिया। कामिक जब दोबारा की पकड़ी हुई मछिलयां लेकर मछेंद्र के पास आया और उसने टोकरे को खाली देखा तो अपने बेटे की करतूत समझ गया। कामिक मछेंद्र को धमका कर बोला।        

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