संघर्ष से परिपूर्ण रहा हेमराज कौशिक का जीवन

*          कुल पुस्तकें :

*           शोध ग्रंथ : एक

*          शोध पत्र : 60

*           साहित्य सेवा : चार दशक से

*           कुल पुरस्कार : 7

*           संपादित पुस्तकें : 2

डा. हेमराज कौशिक का जन्म 09 दिसंबर 1949 को जिला सोलन के बातल गांव में हुआ। उनके पिता जयानंद कौशिक ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में अध्यापन किया, फिर विधवा मां की आकांक्षा के अनुरूप पंडिताई का कार्य करने लगे। कर्मकांड और ज्योतिष ही उनके जीविका के आधार रहे। डा. कौशिक की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय बातल में हुई। पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के अनंतर 12 अप्रैल 1961 को राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अर्की में प्रवेश लिया और दसवीं की परीक्षा 1966 में उत्तीर्ण की। घर की आर्थिक कठिनाइयों के कारण उच्च शिक्षा अर्जित करने के लिए शिमला या बिलासपुर में महाविद्यालय में प्रवेश लेकर नियमित छात्र के रूप में अध्ययन करना दुष्कर था। सन् 1967 में लोक निर्माण विभाग शिमला में चार मास तक दैनिक भागी लिपिक के रूप में कार्य किया। फिर घर लौट आए। उच्च शिक्षा अर्जित करने की उत्कंठा थी। परंतु प्राइवेट छात्र के रूप में शिक्षा प्राप्ति के दरवाजे लगभग बंद ही थे। आज की भांति पत्राचार के माध्यम से शिक्षा अर्जित करने की भी व्यवस्था नहीं थी। किसी हितैषी ने परामर्श दिया कि प्रभाकर कर पंजाब विश्वविद्यालय के पुराने नियमों में बीए करने की व्यवस्था है। अतः उन्होंने प्रभाकर और इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण कर एक प्राइवेट मिडल स्कूल में मुख्याध्यापक के पद से अध्यापक के रूप में अध्यापन किया। 1970 में पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अर्जित की। इसी मध्य 1971 में भाषा अध्यापक का प्रशिक्षण और 1972 में बीएड का प्रशिक्षण लिया। कुछ समय भाषा अध्यापक और स्नातक अध्यापक के रूप में कार्य किया। सन् 1970 में राजकीय शिक्षा महाविद्यालय सोलन में भाषा अध्यापक का प्रशिक्षण लिया और सन् 1972 में बीएड हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से किया। तदनंतर 1974 में एमए, 1975 में एमएड और 1997 में एमफिल और 1984 में हिंदी के प्रख्यात कथाकार व आलोचक डा. विजय मोहन सिंह के निर्देशन में पीएचडी उपाधि अर्जित की। डा. कौशिक का कहना है कि डा. बच्चन सिंह और डा. विजय मोहन सिंह के आलोचनात्मक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वह आलोचना विधा की ओर अग्रसर हुए। इससे पूर्व उनके हिंदी सृजन की शुरुआत कविता से हुई और समय-समय पर वह कविता का सृजन करते रहे हैं, परंतु प्रख्यात आलोचक डा. बच्चन सिंह और डा. विजय मोहन सिंह के प्रभाव के फलस्वरूप वह आलोचना के पथ पर अग्रसर हुए। उनकी अब तक चौदह आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं। अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘नए मूल्यों की तलाश’ शीर्षक उनका शोध वर्ष 1984 में ही प्रकाशित हुआ। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का यह कदाचित प्रथम शोध प्रबंध था जो प्रकाशित हो सका था। वह सैंतीस वर्षों तक हिंंदी प्राध्यापक का कार्य करते हुए वर्ष 2009 में प्रधानाचार्य के रूप में सेनानिवृत्त हुए। वह निरंतर सृजनरत हैं और उनकी चौदह आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं तथा अनेक कहानी संग्रहों और कविता संग्रहों की भूमिकाएं भी लिखी हैं। एक शिक्षक के रूप में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि वर्ष 1992 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से अलंकृत किया। साहित्य के प्रति उनके अनन्य योगदान के लिए अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग में राष्ट्र भाषा हिंदी की सतत, उत्कृष्ट एवं समर्पित सेवा के लिए सरस्वती सम्मान से वर्ष 1998 में अलंकृत किया गया। आथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल प्रदेश ने उन्हें साहित्य सृजन में योगदान देने के लिए 2011 में सम्मानित किया। इसी भांति भुट्टिको वीवर्ज सोसायटी लिमिटिड कुल्लू ने उन्हें वर्ष 2018 में वेदराम राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत किया। कला, भाषा, संस्कृति और समाज सेवा के लिए समर्पित संस्था नवल प्रयास (शिमला) ने वर्ष 2018 में राज्यस्तरीय साहित्य उत्सव में उन्हें धर्म प्रकाश साहित्य रत्न सम्मान 2018 से सम्मानित किया। इसके अलावा प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका इरावती के द्वितीय इरावती 2018 के साहित्य सम्मान से भी उन्हें अलंकृत किया गया। वह आज भी साहित्य लेखन के प्रति समर्पित हैं।

You might also like