सूर्य नाड़ी इड़ा, चंद्र नाड़ी पिंगला है

योग में सूर्य नाड़ी को इड़ा और चंद्र नाड़ी को पिंगला कहा गया है। ‘मिस्टीरियस कुंडलिनी’ के अंगे्रज लेखक डा. रेले ने योग में वर्णित षट्चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र) का स्थान शरीर विज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार बताया गया है-श्रोणी जालिका, अधोजठर जालिका, सौर जालिका, हृदीय जालिका, ग्रसनी जालिका और नासा रोमक जालिका। योगियों के अनुसार सुषुम्ना गुदास्थि की त्रिकोणीय पीठ पर टिकी है। योग शास्त्रों ने इस स्थल को ब्रह्मांडी का द्वार बताया है। गुदास्थि और त्रिकस्थि के सामने की मूलाधार शिरा एवं उसके ऊपर की पेशी का आकार अंडे जैसा है जिसे ‘कंड’ कहते हैं…

-गतांक से आगे…

योग में सूर्य नाड़ी को इड़ा और चंद्र नाड़ी को पिंगला कहा गया है। ‘मिस्टीरियस कुंडलिनी’ के अंगे्रज लेखक डा. रेले ने योग में वर्णित षट्चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र) का स्थान शरीर विज्ञान की दृष्टि से इस प्रकार बताया गया है-श्रोणी जालिका, अधोजठर जालिका, सौर जालिका, हृदीय जालिका, ग्रसनी जालिका और नासा रोमक जालिका। योगियों के अनुसार सुषुम्ना गुदास्थि की त्रिकोणीय पीठ पर टिकी है। योग शास्त्रों ने इस स्थल को ब्रह्मांडी का द्वार बताया है। गुदास्थि और त्रिकस्थि के सामने की मूलाधार शिरा एवं उसके ऊपर की पेशी का आकार अंडे जैसा है जिसे ‘कंड’ कहते हैं। इसी कंड के केंद्र में कुंडलिनी शक्ति सोई पड़ी है। योग में जिन छह चक्रों का उल्लेख है, वे भी सुषुम्ना नाड़ी में स्थित हैं। योग शास्त्रों ने सिर के ऊर्ध्व में चंद्रमा का स्थान माना है जिसे ‘सहस्रार’ कहा गया है। चंद्रमा से अमृत टपकता रहता है। यह अमृत शरीर में शक्ति के रूप में विद्यमान रहता है। नाभिमंडल में सूर्य का निवास है। सूर्य और चंद्र-दोनों अधोमुखी हैं। सूर्य इस अमृतमयी शक्ति को जलाता और नष्ट करता रहता है। ‘योगदर्शन सूत्र’ और ‘वाचस्पति भाष्य’ में कहा गया है ः

अंतरिक्षगतो वह्निर्वेद्युतः स्वांतरात्मकः।

नमस्थ सूर्यरपोअग्निर्नाभिमंडलाश्रितः।।

विषं वर्षति सूर्योअसौ स्रवत्यमृतमुंमुखः।

तालुमूले स्थितश्चंद्रः सुधांवर्षत्यघोमुखः।।

अर्थात आकाश में चमकने वाली बिजली के समान इस शरीर के अंदर भी एक अग्नि है। आकाश में स्थित सूर्य के समान ही नाभिमंडल में भी एक सूर्य विद्यमान है। यह सूर्य विष टपकाता रहता है। लेकिन जब उसे ऊर्ध्वमुखी कर दिया जाता है तो इससे अमृत झरता है। तालुमूल में चंद्रमा स्थित है जो अधोमुखी है। इससे सदा अमृत बरसता रहता है। जो प्राणधारा अधोमुखी होकर क्षीण होती रहती है, कुंडलिनी के जागृत होते ही अधोमुखी सूर्य के ऊर्ध्वमुखी हो जाने से अमृत की वर्षा होने लगती है। इसके बाद कुंडलिनी की भी ऊर्ध्व गति आरंभ हो जाती है। यह सुषुम्ना नाड़ी से होकर सहस्रार की ओर बढ़ने लगती है। सुषुम्ना का वर्णन इस प्रकार किया गया है ः

सुषुम्ना जननी मुख्या सूक्ष्मा पंकज तंतुवत,

सुषुम्ना मध्य देशेतु वज्राख्या नाड़ी वैशुभा।

तत्र सूक्ष्माहि चित्रिणी तत्र श्री कुंडली गतिः,

तथा संग्राह तं नाड्या षट्पदम सुमनोहरम।।

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