स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ करने की जरूरत

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

 

सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सुविधाएं कम और परेशानियां   ज्यादा झेलनी पड़ रही हैं। इन अस्पतालों में तैनात स्टाफ की निजी अस्पतालों के साथ सांठ-गांठ के चलते ही ज्यादातर मरीज वहीं रैफर किए जा रहे हैं। मरीजों को पर्ची बनाने के लिए ही केवल ओपीडी में घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। अगर इस तरह की व्यवस्थाएं रहेंगी, तो आम जनता को सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का लाभ कैसे होगा…

सरकारें बेशक आयुष्मान और हिम केयर जैसी योजनाएं चलाकर आम जनमानस को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने के दावे कर रही हैं, मगर जब तक सरकारी अस्पतालों में स्टाफ की कमी पूरी नहीं की जाती, तब तक सरकारों की यह मुहिम सफल नहीं हो सकती है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सुविधाएं कम और परेशानियां   ज्यादा झेलनी पड़ रही हैं। सरकारी अस्पतालों में तैनात स्टाफ की निजी अस्पतालों के साथ सांठ-गांठ के चलते ही ज्यादातर मरीज वहीं रैफर किए जा रहे हैं। मरीजों को पर्ची बनाने के लिए ही केवल ओपीडी में घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। जब तक पर्ची बनती है, तब तक स्टाफ लंच ब्रेक पर जा चुका होता है। अगर इस तरह की व्यवस्थाएं रहेंगी, तो आम जनमानस को सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा? लंच के बाद कोई चिकित्सक  वापस अपनी ड्यूटी पर आएगा या नहीं, किसी को पता नहीं होता है।

लोकसभा चुनावों से पहले हिमाचल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में 56 टैस्ट मुफ्त रखे गए थे। चुनाव खत्म होते ही अब टैस्ट लोगों को सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी लैब में महंगे दाम पर करवाने पड़ रहे हैं। चिकित्सक सरकार की ओर से भेजी जा रही सस्ती दवाइयां को लिखने की बजाय महंगी दवाइयां पर्चियों में लिखते हैं। प्रदेश सरकार ने ऐसी महंगी दवाइयां लिखने वाले चार सौ डाक्टरों का डाटा सीएमओ से मंगवाया था, मगर ऐसे डाक्टरों के खिलाफ सरकार ने अब तक क्या कार्रवाई की, कोई नहीं जानता है। हिमाचल प्रदेश में निर्मित उद्योगों से बनी आठ दवाइयों के सैंपल फेल हुए, जो मानव स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। आखिर क्या कारण हो सकते हैं कि प्रदेश सरकार इस तरह नकली दवाइयां बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहती है? स्वास्थ्य से बढ़कर और कोई धन नहीं होता है। मगर अफसोस आजकल इस स्वास्थ्य रूपी धन से वंचित होकर जनता कई बीमारियों की चपेट में आकर अस्पतालों की लंबी कतारों में खड़ी है। हिमाचल प्रदेश के उद्योगों की पहली तेरह दवाइयां सब स्टैंडर्ड की पाई गई थीं। सब स्टैंडर्ड दवाइयों में पेन किलर, डायबिटीज, गैस्टिक, हाइपर टेंशन, आयरन की कमी, मल्टी विटामिन, एनीमिया और किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों को दी जाने वाली दवाइयां नकली पाई गई हैं। यह पहला मौका नहीं, इससे पहले भी हिमाचल प्रदेश में बनने वाली दवाइयों की गुणवत्ता शक के घेरे में रही है। बावजूद इसके ऐसे दवा विक्रेताओं पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही, जो जनता के स्वास्थ्य के साथ इस तरह नकली दवाइयां बेचकर खिलवाड़ करते रहे हैं। केंद्रीय औषधी मानक नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल 31 उद्योगों की दवाइयां नकली पाए जाने की पुष्टि की थी। प्रदेश की जनता को बेहतर स्वास्थ्य मुहैया करवाने के दावे सरकार बेशक करती रहे, मगर जिस तरह दवाइयों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नकली दवाइयों की आड़ में किस तरह दवा निर्माता कंपनियां अपनी जेबें भरने में मशगूल हैं। अगर यह कहा जाए कि सरकारी अस्पतालों में सरकार से ज्यादा दवा माफिया की पकड़ मजबूत है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक तो नकली दवाइयां, ऊपर से मेडिकल स्टोर में एयरकंडीशनर नहीं होने की वजह से दवाइयां असरदार हो सकती हैं,  एक बड़ा सवाल है? दवाइयों की गुणवत्ता कायम रखने के लिए सही तापमान में रखने की जरूरत होती है। ज्यादातर दवाखाने बगैर एयरकंडीशनर के चलाए जा रहे हैं।

दवाखानों में सालों दवाइयां धूल फांकती रहती हैं, उनकी जांच करने के लिए ड्रग्ज कंट्रोलरों की कमी हमेशा ही बनी रही है। एक समय ऐसा था कि पशुओं का गोबर कंपोस्ट बनाकर खेतों में डाला जाता था। उस जमीन में सब्जियां और अनाज पैदा किया जाता था। आजकल किसानों का पशुपालन से मोहभंग होता जा रहा है और नतीजतन खेतों में रासायनिक खादों से फसलों की पैदावार की जा रही है। ऐसी रासायनिक खादों से जमीनें बंजर और इससे उत्पन्न होने वाला अनाज विषाक्त होता जा रहा है।

किसानों में  सब्जियों का ज्यादा उत्पादन करने की होड़ लगी हुई है। किसान सब्जियों पर आंखें बंद करके जहरीली दवाइयों और कीटनाशकों की सप्रे करके पैदावार बढ़ा रहे हैं। जनता को ऐसी सब्जियां बेचने से पहले स्वास्थ्य विभाग को इनकी गुणवत्ता परखनी चाहिए कि उन पर कीटनाशक दवाइयों का कितना छिड़काव किया गया है। केंद्र सरकार ने इसी वजह से ऐसे दवा विक्रेताओं पर अंकुश लगाने की कोशिश की थी, जिनके पास ऐसी शिक्षा की कोई डिग्री नहीं थी। सब्जियों के साथ-साथ फलों की पैदावार भी जहरीली दवाइयों पर ही निर्भर होकर रह गई है। एक तो नकली दवाइयां ऊपर से जहरीली दवाइयों से उत्पन्न होने वाले अनाज, फल और सब्जियां खाने से   आदमी किस तरह अपना स्वास्थ्य बेहतर रख सकता है, प्रशासन को विचार करना चाहिए।

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