हाई कोर्ट ने खारिज की अवमानना याचिका

शिमला —प्रदेश हाई कोर्ट ने नरेंद्र नायक, छविंद्र व  अन्य कनिष्ठ अभियंताओं की 30 मई  को सरकार के निर्णय के खिलाफ दायर की अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा लिए निर्णय को सही ठहराया है और अवमानना याचिका को रद्द कर दिया। नरेंद्र नायक व छविंद्र कुमार को पीडब्ल्यूडी ने वर्ष 1995-96 में एक वर्ष के अनुबंध पर  कठिन व दुर्गम क्षेत्रों में बिना हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग को कंसल्ट कर स्टोप गैप अरेंजमेंट के तहत बिना आरएंडपी नियमों को फॉलो किए रखा था। वर्ष 1999 में सरकार ने इन्हें निकालने का निर्णय लिया, जिस पर ये सभी अभियंता ट्रिब्यूनल से स्टे ले आए। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने नरेंद्र नायक को छोड़कर अन्य सभी कनिष्ठ अभियंताओं की याचिकाओं का निपटारा कर दिया। सरकार ने वर्ष 2004 में नए आरएंडपी रूल्स के तहत अनुबंध पर रखे इन कनिष्ठ अभियंताओं को नियमित कर दिया था।  नरेंद्र नायक की याचिका ट्रिब्यूनल से निरस्त होने के बाद हाई कोर्ट को ट्रांसफर की गई। प्रदेश हाई कोर्ट की एकल पीठ ने अपने फैसले में नरेंद्र नायक को वरिष्ठता एवं वित्तीय लाभ के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महाराष्ट्र एवं डायरेक्ट रिक्रूटमेंट के सिद्धांतों के आधार पर कंसीडर करने को कहा। इस फैसले को डिवीजन बेंच ने भी सही ठहराया।  नरेंद्र नायक ने जानबूझ कर इस फैसले से प्रभावित होने वाले हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा 1997 में चयनित उन कनिष्ठ अभियंताओं को पार्टी नहीं बनाया, जो कि असंवैधानिक है। इसके बाद प्रदेश सरकार ने सर्वाच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इसमें एचपीपीएससी द्वारा वर्ष 1997 में नियमित आधार पर चयनित कनिष्ठ अभियंता रविशंकर व राकेश शर्मा ने भी दरख्वास्त डाली।  सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सरकार की याचिका खारिज कर दी, परंतु रविशंकर व राकेश शर्मा जो एचपीपीएससी में इंटरव्यू से रेगुलर आए थे, को निर्देश दिए कि यदि उनकी वरिष्ठता प्रभावित होती है तो वे उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं। इंटरव्यूर ने प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका डाली, जिसमें कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि पहले टेंटेटिव सीनियोरिटी निकाली जाए, इसके बाद सभी प्रभावित जेई की आपत्तियां ली जाए और कानून के अनुसार विभाग सीनियोरिटी फाइनल करें। जनवरी 2018 को छविंद्र ने अवमानना याचिका प्रदेश हाई कोर्ट में दायर की।  सरकार ने सर्वोच्च व उच्च न्यायालय द्वारा दिए निर्देशानुसार पहले सीनियोरिटी लिस्ट निकाली फिर सभी प्रभावित अभियंताओं से ऑब्जेक्शन मांगे। आयोग से वर्ष 1997 में आए कनिष्ठ अभियंताओं की आपत्तियों को सरकार ने सही पाया, जबकि नरेंद्र नायक व अन्य लोग जो अनुबंध आधार पर कठिन व दुर्गम क्षेत्रों में बिना आरएंडपी नियमों के तहत आए थे, उनको वरिष्ठता व वित्तीय लाभ देने से इनकार कर दिया। 

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