हाथ की कला में करियर

जब आपका मनपसंद शौक आपका करियर बन जाता है तो आप अपना सौ फीसदी उसमें देते हैं और फिर सफल होने से आपको कोई नहीं रोक सकता। ऐसा ही एक पैशन है आर्ट, जो शौक से शुरू होता है और अगर चाहें तो एक ऐसा करियर बन जाता है, जहां पैसा भी है, अपने शौक से ताउम्र जुड़े रहने का सुकून भी और शोहरत भी। इसमें नौकरी करने के तो बेशुमार मौके हैं ही, फ्रीलांसिंग करके भी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। यदि आप में हुनर है तो अपनी कला प्रदर्शनियों के सहारे आप नाम और पैसा दोनों कमा कर शोहरत की बुलंदियों को छू सकते हैं…

कांगड़ा पेंटिंग्स

कांगड़ा चित्रकारी का उदगम कांगड़ा से हुआ जो कांगड़ा राजवाड़े दौर की देन है। इसके फलने-फूलने का कारण बिसोहली चित्रकारी का अठारवीं शताब्दी में फीका पड़ जाना था। हालांकि कांगड़ा चित्रों के मुख्य केंद्र गुलेर, बसोली, चंबा, नूरपुर, बिलासपुर और कांगड़ा हैं, बाद में यह शैली मंडी, सुकेत, कुल्लू, आर्की, नालागढ़ और टिहरी गढ़वाल मोला राम द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया में भी पहुंच गई और अब इसे सामूहिक रूप से पहाड़ी चित्रकला के रूप में जाना जाता है, जो कि 17वीं और 19वीं शताब्दी के बीच राजपूत शासकों द्वारा संरक्षित शैली को दर्शाता है। कला जगत को भारत की लघुचित्र कला एक अनुपम देन है। जम्मू से लेकर गढ़वाल तक उतर. पश्चिम हिमालय पहाड़ी रियासतों की इस महान परंपरा का वचस्व 17वीं से 19वीं शताब्दी तक रहा। छोटी-छोटी रियासतों जिनमें से अधिकांश वर्तमान हिमाचल प्रदेश मे पनपी है यह चित्रकला पहाड़ी शैली के नाम से विश्व भर में विख्यात है। पहाड़ी चित्रकला के मुख्य केंद्र थे गुलेर, कांगड़ा, चंबा, मंडी, बिलासपुर, कुल्लू। कांगड़ा कलम को लघुचित्र में सबसे उत्कृष्ट माना गया है । गुलेर कांगड़ा शैली ने चित्रकला की ऊंची उड़ान भरी। उसके चित्रकार और उनके वशंजों का महान योगदान है। पंडित सेऊ के पुत्रों क्रमशः माण्क और पौत्रोफत्तु, खुशाला, कामा, गोढू, निक्का और रांझा आदि चित्रकारों ने चित्रकारी के विकास में महत्त्वपुर्ण भूमिका निभाई व कुशनलाल हस्तु आदि भी राजा संसार चंद के चितरे थे । उनके पुत्र रामदयाल का नाम संसार चंद के चित्रों में आया था। महाराजा संसार चंद (1775-1823) ने कांगड़ा चित्र शैली को विकास के शिखर पर पहुंचाया । महाराजा का शासन काल कांगड़ा कलम का स्वर्ण युग कहा जाता है। राजा संसार चंद ने गुलेर के कलाकारों को अपने दरबार की ओर आकर्षित किया। कृष्ण भिन्न रूपों में इस चित्र कला का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजा के साथ श्रीकृष्ण के श्रृंगारिक चित्र, राग-रानियों ,रामायण, महाभारत, भागवत्त , चंडी-उपाख्यान दुर्गा पाठ, देवी महत्मये व पौराणिक कथाओं पर चित्र कला तैयार हुई ।

वेतन

जो मीडिया या प्रकाशन संस्थानों, विज्ञापन एजैंसियों और टैक्सटाइल उद्योग में काम कर रहे हैं, उनकी शुरुआत 12000 से 25000 रुपए महीने से हो जाती है। प्रोडक्शन हाऊस में काम करने वाले 8000 से 20000 रुपए महीने से अपनी शुरुआत करते हैं।

अवसर

फाइन आर्ट के प्रोफैशनल्स को अपने हुनर और व्यक्तित्व के मुताबिक आर्ट स्टूडियोज, विज्ञापन एजेंसियों, टैक्सटाइल उद्योग, प्रकाशन संस्थानों, टेलीविजन, फिल्म और थिएटर प्रोडक्शन्स में मौके मिलते हैं। इसके अलावा वे टीचंग को भी करियर विकल्प के रूप में अपना सकते हैं। कुछ लोग आर्ट क्रिटिक के रूप में आर्ट पर लिखने को ही अपने प्रोफैशन के रूप में चुन लेते हैं। वैसे कुछ लोग पेंटिंग, स्कल्प्चर, सिरेमिक डिजाइन, म्युरल डिजाइन और पॉटरी डिजाइन से भी खासा कमा रहे हैं।

महत्त्वपूर्ण संस्थान

— नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ  डिजाइन, अहमदाबाद

— कॉलेज ऑफ आर्ट, दिल्ली

— दिल्ली कालेज ऑफ आर्ट, दिल्ली

— सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई

— एमएस यूनिवर्सिटी ऑफ  बड़ौदा, गुजरात

कोर्स एवं योग्यता

पेंटिंग और एप्लाइड आर्ट के 4.4 साल के डिग्री कोर्स बीएफए बैचलर इन फाइन आर्ट के लिए अभ्यर्थी का किसी भी संकाय से 12वीं पास होना जरूरी है। इन्हीं में 2.2 साल के एमएफए मास्टर्स इन फाइन आर्ट के डिग्री पाठ्यक्रमों के लिए किसी भी संकाय में स्नातक होना चाहिए। इसके अलावा डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। पेंटिंग और एप्लाइड आर्ट विद ग्राफिक डिजाइनिंग के 4.4 साल के डिप्लोमा पाठ्यक्रमों डीएफए के लिए अभ्यर्थी का 12वीं पास होना जरूरी है। कोर्स के दौरान छात्रों को बेसिक ड्राइंग एंड पेंटिंग, मीडियम एंड टैक्नीक्स, आर्ट एंड क्राफ्ट, म्युरल्स, ग्राफिक्स, एडीशनल आर्ट तथा थ्यूरी की पढ़ाई करवाई जाती है। थ्यूरी में हिस्ट्री ऑफ आर्ट, एस्थैटिक्स और मैथड एंड मैटीरियल पढ़ाया जाता है। अश्विनी के अनुसार, हर बच्चा, हर छात्र अपने बचपन में कागज पर चित्र उकेरता है, रंगों का संसार बनाता है पर कुछ बच्चों के बनाए चित्र देख उनके माता-पिता, उनके सहपाठी, उनके शिक्षक हैरत में रह जाते हैं। बावजूद इसके उनकी यह जन्मजात प्रतिभा, यह शौक, यह हुनर धीरे-धीरे खत्म हो जाता है, क्योंकि हम सब, चाहे  शिक्षक हों या अभिभावक, अपनी इच्छाएं, अपनी सोच उन पर लाद देते हैं और उन्हें ऐसे विषयों की तरफ  धकेल देते हैं, जिनमें न तो उनका मन लगता है और न ही उनमें उनसे जुड़ी प्रतिभा होती है। हम आज सामने आ रहे करियर के अनूठे एवेन्यूज के बावजूद उन्हें इंजीनियर, डाक्टर, एमबीए प्रोफैशनल के दायरे से बाहर नहीं निकलने देते। इस सोच को बदलना होगा। अगर बच्चे में अच्छा आर्टिस्ट बनने के लक्षण दिखाई दें तो उसे प्रोत्साहित करें।

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