हिमाचली जीवन में नया निवेश

हिमाचल के नागरिक जीवन में निवेश की भूमिका का वर्णन अब वैयक्तिक नहीं रहा और न ही अपनी जरूरतों या भविष्य की पैरवी में लोग इसे बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि तेजी से बदलते नजरिए ने पर्वतीय मिजाज बदल दिया है। ऐसे में हिमाचल सरकार राज्य में पचासी हजार करोड़ के निवेश से जो पाना चाहती है, उसे प्रदेश के निजी व्यक्तित्व से जोड़ने की आवश्यकता दिखाई देती है। इसमें दो राय नहीं कि हिमाचल में नागरिक खुशहाली की पैगंबर सरकारें ही रहीं, लेकिन अब ऐसी सीमा के बाहर भी राज्य के लोगों ने नई आर्थिकी जुटाई है। प्रोफेशनली कुछ लोगों ने अपनी उपलब्धियों को इस कद्र समाहित किया कि इसका असर गैर सरकारी क्षेत्र में भी दर्ज हुआ, फिर भी सरकार की नौकरी ने हिमाचली बाशिंदों को निजी निवेश के दायरे बढ़ाने की क्षमता दी है। यह व्यापक सर्वेक्षण का विषय हो सकता है कि नागरिक निवेश में हिमाचली समाज आज कहां खड़ा है, फिर भी कुछ साक्ष्य ऐसे हैं, जो बदलते लाइफ स्टाइल, पाने की लालसा और दिखाने के मंतव्य में दर्ज हैं। हिमाचल से बाहर संपत्तियों के मालिकाना हक पाने की इच्छाशक्ति अब एक स्वीकार्य क्षमता की तरह है और इसीलिए पंजाब, चंडीगढ़ व हरियाणा के कुछ बिल्डर्स या नई बस्तियां इनके लिए प्रतीक्षारत हैं। ऐसे में अगर शहरी विकास को समझा गया होता या हिमाचल ने इस मांग को परखा होता, तो नागरिक क्षमता का लाभ राज्य को मिलता। हिमाचल की नागरिक क्षमता का दोहन पड़ोसी राज्य कई तरह से कर रहे हैं और इसका सहज अंदाजा हर दिन बसों के बाहरी डेस्टीनेशन या निजी वाहनों से बढ़ रही यात्राओं का विवरण है। बंगलूर या पुणे से चंडीगढ़ या दिल्ली उतरी फ्लाइट्स में जो हिमाचल देखा जाता है, वह भविष्य की क्षमता का प्रदर्शन है। कई और शहरों में हिमाचली क्षमता का ठिकाना अगर जद्दोजहद कर रहा है, तो यह अपने प्रदेश की मिट्टी पर भी मेहनत के फूल खिला सकता है। क्या युवा शक्ति का हिमाचल में पूर्ण निवेश हो पाया या बच्चे यह तय कर चुके हैं कि उनकी महत्त्वाकांक्षा अंततः विस्थापन करते हुए परिचय बदल देगी। ऐसे में सवाल यह भी है कि इन्वेस्टर मीट के खाके में कितनी हिमाचली प्रतिभा की रिवर्स माइग्रेशन होगी। उदाहरण के लिए कई गांव ऐसे हैं, जहां से प्रतिभा का पलायन हुआ या उन्हें वापसी का मार्ग मिले, तो क्षेत्र की आर्थिकी बदल सकते हैं। गरली-परागपुर की धरोहर इमारतों के सामने तरक्की का मार्ग आज बिखरा पड़ा है। रिवर्स माइग्रेशन के प्रयास में सरकार अपनी भूमिका निभाती है, तो प्रदेश के प्रति यह भी निवेश होगा, जिसके तहत बाहर बसे समूह गरली-परागपुर की विरासत में न केवल धरोहर पर्यटन को कंधा देंगे, बल्कि सिने पर्यटन की तहजीब को भी आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। कई प्रवासी हिमाचली लौटकर प्रदेश को अपनी क्षमता के पालने में संवारना चाहते हैं, तो क्या हम इन्हें बुला पाएंगे। आश्चर्य यह कि हिमाचली डाक्टर पीजीआई, एम्स के अलावा पड़ोसी राज्यों के कई अस्पतालों की बुनियाद की तरह सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन हम अपने मेडिकल कालेजों की संरचना में इनकी भूमिका हासिल नहीं कर सके। देश-विदेश में सफल हिमाचलियों के अनुभव तथा आर्थिक क्षमता का निवेश अगर हम प्रदेश में करवा पाएं तो आत्मीयता के इस पहलू से राज्य को आत्मसम्मान ही हासिल होगा। प्रदेश की अपनी आर्थिक संभावनाएं, जरूरतें तथा नागरिक इच्छाएं हैं, अतः इन्हें तसदीक करने की मंशा से वर्तमान में जो निजी निवेश हो रहा है, उसे भी सरकार का आतिथ्य भाव चाहिए। पिछले दो दशकों में हिमाचली व्यवहार और लाइफ स्टाइल में आ रही तबदीली के कारण निजी निवेश की ऊर्जा बढ़ रही है। उपभोक्ता मामलों में हिमाचल का प्रगतिशील चेहरा जिस मांग का पीछा कर रहा है, उसके कारण निवेश को नए-नए सारथी मिल रहे हैं।

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