हिमाचल का वांछित आधार

केंद्र में नई सरकार के द्वार में पुनः हिमाचल की हाजिरी का ‘एकलव्य’ जाग गया। लक्ष्य की साधना में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हर प्रभावशाली मंत्री तक मुलाकात का सिलसिला औपचारिकताओं के बीच, प्रदेश के भविष्य को रेखांकित करता है। मोटे तौर पर विकास की आस पुनः मुखातिब है और अगर केंद्र इसी केंद्र बिंदु पर हिमाचल की परिधि को अपना वांछित आधार दे, तो कदमताल करती इच्छाएं सम्मानित होंगी। मुख्यमंत्री के पास इन्वेस्टर मीट का एक महत्त्वाकांक्षी खाका है और इसी तरह केंद्र में फंसे अधिकारों का वही खाता भी है। कुछ स्वाभिमान के प्रश्न, कुछ राष्ट्रीय नीतियों से आशा, कुछ पहाड़ का दर्द, कुछ वित्तीय मसले और कुछ जीने और पाने की दिशा में हिमाचल का संघर्ष पुनः खुद को रेखांकित कर रहा है। इन इच्छाओं के भीतर हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा दिलाने का मांग पत्र तथा हिमालयन रेजिमेंट की वर्दी पहनने का हिमाचली खिताब सामने है। पर्यावरण एवं वन संरक्षण अधिनियम की फाइलों में जकड़े हिमाचली विकास के अर्थपूर्ण तर्क फिर पूछ रहे हैं कि कब केंद्र अपने सहयोग की परिपाटी विकसित करेगा। हालांकि अभी केवल पांच हेक्टेयर वन भूमि बदलने के अधिकार पर  व्यावहारिक मांग हो रही है, लेकिन इसके साथ प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में हाथ बांधे खड़े हिमाचल की आर्थिक भरपाई तथा जलाधिकारों का मसला भी नत्थी है। यहीं से पर्वतीय पहचान का एक लंबा संघर्ष है, जो कभी बांध परियोजनाओं के सीने में नश्तर बनकर चुभता है, तो विस्थापन की आह में समुद्र बनकर स्थिर व स्थायी आकार लेता है। हिमाचल ने अपने अस्तित्व के लिए जो सबसे अधिक हारा, वह इन्हीं बांधों की संरचना में अधिकारों से महरूम होने की सजा है। देश में नर्मदा बांध परियोजना की चर्चा ने राष्ट्रीय नीतियों और समझौतों की रूप रेखा बदल दी, लेकिन अपनी तरह का सबसे बड़ा विस्थापन आज भी पौंग व गोबिंदसागर जलाशयों के बाहर फेरी लगाता है। यह दर्द केवल जमीन या आर्थिकी खोने का होता तो भी हिमाचली हृदय की विशालता इसे समाहित कर लेती, लेकिन यहां तो राष्ट्रीय तिरस्कार की लंबी श्रृंखला स्थापित होती है। राष्ट्रीय संसाधनों में पानी की अहमियत पर टकराते प्रदेशों और पंचाटों के फैसलों पर आपत्तियां उठाती रणनीति पर देश झुकता है, लेकिन सरहद पर सीना ताने खड़े हिमालयी राज्यों द्वारा जलवायु, वन तथा जल संसाधनों के संरक्षण पर निभाई जा रही भूमिका पर केंद्र की खामोशी पीड़ा में इजाफा करती है। सेना की भर्ती में कोटा मुकर्रर करने वाली सरकारों को अब हिमालयन रेजिमेंट के औचित्य से भी परेशानी है, तो यह हिमाचल के सैन्य इतिहास को नजरअंदाज करने की सबसे बड़ी तोहमत है। दरअसल पर्वतीय प्रदेशों के प्रति राष्ट्रीय नजरिया बदलने की आवश्यकता एक स्वतंत्र केंद्रीय मंत्रालय के तहत ही संभव है। भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय दृष्टि से हिमालयी या समस्त पहाड़ी राज्यों या क्षेत्रों की नुमाइंदगी के लिए पर्वतीय विकास एवं अनुसंधान मंत्रालय के गठन की आवश्यकता इसलिए भी है, क्योंकि राष्ट्रीय कसौटियों में बंटती प्राथमिकताएं केवल राजनीतिक भरण ही करती है। अभी जिस तरह हिमाचल की दो फोरलेन परियोजनाओं को ठंडे बस्ते में डाला गया है, उसके मायने केवल राजनीतिक अंक गणित ही हैं। पठानकोट-मंडी व धर्मशाला-शिमला फोरलेन परियोजनाएं पिछले पांच वर्षों से सियासत बटोर कर ठंडी हो रही हैं, तो यह पर्वत की पीड़ा है। इसी तरह राष्ट्रीय धन आबंटन की शर्तों पर छोटे राज्यों को हारना पड़ता है। हिमाचल को जिस तरह औद्योगिक पैकेज मिला था, उसी तर्ज पर रेलवे, पर्यटन व पर्वतीय विकास के पैकेज की दरकार है, ताकि विकास के मानक स्थापित किए जा सकें। जाहिर है मुख्यमंत्री ने केंद्र के समक्ष कई लंबित मामले रखे हैं और अगर चिन्हित लक्ष्यों पर कुछ कदम भी चलें, तो मंजिल और स्पष्ट होगी।

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