हिमाचल में रोजगार का घाटा

हिमाचली विकास का रोजगार से रिश्ता किस तरह स्वीकार हो रहा है, इस पर राज्य के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि चाहिए। देश से कहीं भिन्न हिमाचल में रोजगार के मायनों का सरकारीकरण, हमारी पीढि़यों को अलग तरह की प्रतिस्पर्धा में ले गया, जहां मकसद और मंजिल सीमित हो गई। विकास से स्कूल-कालेज, कार्यालय या अस्पताल खुले तो कुछ हद तक सरकारी रोजगार मिला, लेकिन अधोसंरचना विकास ने मजदूरी बढ़ाकर हिमाचल को घाटा ही दिया। सरकारी निवेश की परिपाटी में ठेकेदार तो बन गए, लेकिन मजदूरी का निर्यात हो गया। हर दिन हिमाचल इतना रोजगार तो पैदा करता है कि प्रदेश में कम से कम पांच से सात लाख बाहरी मजदूर-मिस्त्री, रेहड़ी-फड़ी चलाने वाले, औद्योगिक मजदूर या अन्य धंधों में मशगूल लोग आसानी से अपने जीवन को सुरक्षित कर लेते हैं। यह आंकड़ा हर दिन बढ़ रहा है और अब कृषि-बागबानी से ग्रामीण मजदूरी तक इसके पांव पसर रहे हैं, तो यह कहना होगा हिमाचली विकास में मजदूरी का घाटा पैदा हो रहा है। ऐसे रोजगार का घाटा हर बाजार, पर्यटन उद्योग और हुनर में उठाना पड़ रहा है। आश्चर्य यह कि न तो सरकार का निवेश स्थानीय व्यक्ति की दिहाड़ी लगा रहा है और न ही निजी क्षेत्र को पूर्ण कौशल हासिल स्थानीय लोग मिल रहे हैं। इसका अर्थ यह भी कि हिमाचली योग्यता केवल सरकारी नौकरी की दरख्वास्त बन कर रह गई है, जबकि रोजगार की योग्यता के गुण कम हो रहे हैं। हिमाचल का सृजनात्मक पक्ष निरंतर कमजोर हो रहा है, जबकि मानसिक तौर पर नौकरी को सहज मानकर रोजगार संभावनाओं के कठिन प्रश्न छोड़े जा रहे हैं। ऐसे में जहां रोजगार का बाजार खुल रहा या जहां स्वरोजगार के अवसर मिल सकते हैं, वहां हिमाचली कौशल व व्यक्तिगत मनोवृत्ति इसे स्वीकार करने के काबिल नहीं या यही असमर्थता बन चुकी है। हिमाचल में रोजगार काबिलीयत के संदर्भ में बौद्धिक रुझान तथा सीखने की ललक बहुत कम हो चुकी है। हैरानी तो यह कि अच्छे दर्जी या वाहन मेकेनिक तक की तलाश भी किसी बाहरी व्यक्ति के आगमन से पूरी होती है। हमने मनोवृत्ति को ही अपंग बनाकर नौकरी का ख्वाब पालना शुरू किया है, जबकि स्वरोजगार के माध्यम से समाज में एक साथ काम करने की संभावनाएं व क्षमता बढ़ सकती है। ऐसे में प्रदेश को उच्च गुणवत्ता के रोजगार पर काम करना चाहिए। इसके लिए कौशल विकास के नए आयाम, स्कूल-कालेज शिक्षा में गुणवत्ता, पाठ्यक्रम सुधार तथा रोजगार में महिला भागीदारी बढ़ाने का माहौल सशक्त करना होगा। हिमाचल में ग्रामीण पर्यटन को अगर स्वरोजगार से जोड़ा जाए, तो यह प्रदेश क्षमतावान युवाओं को आगे बढ़ाने का सारथी बन जाएगा। विडंबना यह है कि पिछले एक दशक में हिमाचली युवाओं ने इंजीनियरिंग की दिशा में अपनी शैक्षणिक योग्यता तो बढ़ाई, लेकिन प्रदेश ने मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र को न तो आमंत्रित किया और न ही इंडस्ट्रियल, नालेज, जैव विविधता या आईटी पार्क स्थापित किए, ताकि उच्च गुणवत्ता से परिपूर्ण रोजगार के अवसर पैदा हों। बेशक मनरेगा की दिहाड़ी से हमारा ग्रामीण परिदृश्य खुश है, लेकिन असली रोजगार के लिए हुनर कब और कहां पैदा होगा। ऐसे में इन्वेस्टर मीट के जरिए जयराम सरकार के संकल्प कुछ ऐसे क्षेत्रों को छू सकते हैं, जहां उच्च रोजगार या स्वरोजगार पैदा किया सकता है। प्रदेश के शहरी निकायों का प्रबंधन अगर पारदर्शिता के साथ स्वरोजगार अधोसंरचना का विकास करे या भूमि बैंक बनाकर, बेरोजगारों को स्थान उपलब्ध कराए, तो कई तरह की व्यापारिक, व्यावसायिक, सर्विस तथा पर्यटन गतिविधियों के तहत स्वरोजगार संभव होगा। रोजगार के लिए शिक्षा की पहली सीढ़ी अगर दुरुस्त करनी है, तो स्कूली शिक्षा का ढांचा बदलना पड़ेगा। एम्प्लायबिलिटी की दिशा में हिमाचल के मानव संसाधन को आरंभ से अंत तक नए दिशा-निर्देश, प्रोत्साहन तथा आदर्शों की आवश्यकता है, वरना रोजगार के ज्यादातर अवसर बाहरी लोगों की तरक्की करते रहेंगे-जैसा हो रहा है।

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