2010 में बाघल रियासत के उत्तराधिकारी बने थे हर्ष वर्धन सिंह

Jun 12th, 2019 12:03 am

हर्ष वर्धन सिंह : इनका जन्म 11 अप्रैल, 1980 को हुआ तथा सात जून, 2010 को बाघल रियासत के उत्तराधिकारी बने।  इनका विवाह दो दिसंबर, 2007 को डाटिया रियासत के राजा लोकेंद्र  राजेंद्र सिंह की भतीजी से हुआ। इनकी एक सुपुत्री है। वर्तमान में रियासत की सारी जिम्मेदारी इन्हीं के पास सुरक्षित है। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ। 26 जनवरी, 1948 को बघाट के राजा दुर्गा सिंह ने सोलन मेें पहाड़ी राजाओं  तथा प्रजामंडल के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया…

गतांक से आगे …

हर्ष वर्धन सिंह : इनका जन्म 11 अप्रैल, 1980 को हुआ तथा सात जून, 2010 को बाघल रियासत के उत्तराधिकारी बने।  इनका विवाह दो दिसंबर, 2007 को डाटिया रियासत के राजा लोकेंद्र  राजेंद्र सिंह की भतीजी से हुआ। इनकी एक सुपुत्री है। वर्तमान में रियासत की सारी जिम्मेदारी इन्हीं के पास सुरक्षित है। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ। 26 जनवरी, 1948 को  बघाट के राजा दुर्गा सिंह ने सोलन में पहाड़ी राजाओं तथा प्रजामंडल के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया। इसमें बाघल से हीरा सिंह पाल और राजा राजेंद्र सिंह ने भाग लिया। इन सभी गतिविधियों के फलस्वरूप 15 अप्रैल, 1948 को शिमला तथा पंजाब की पहाड़ी रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया और बाघल रियासत का भी इसमें विलय हो गया।

बघाट ठकुराई

शिमला पहाड़ी रियासतों में बघाट रियासत 300 500 व  300 580  उत्तरी आक्षांश तथा 700 120 पूर्वी देशांतर पर स्थित थी। बघाट शिमला से 20 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित तथा इनका विस्तार सोलन व स्पाटू तक बना हुआ था। बघाट शब्द की उत्पत्ति पहाड़ी भाषा के दो शब्दों बाऊ तथा बहु  अर्थात बहुत व घाट (दरें) कई घाटों की भूमि। बघाट बारह ठकुराइयों में से एक प्रमुख ठकुराई थी। यह ठकुराई पिंजौर से उत्तर में गिरि की सहायक नदी अश्विनी और सतलुज की सहायक गंभर के जलसंभर में स्थित थी। बघाट की स्थापना दक्षिण के धरनगिरी  से आए एक पनवार (पंवार या परमार) वंशीय राजपूत बसंतपाल ने की थी। इस साहसी पुरुष का नाम हरिचंद्र पाल भी मिलता है। बाघल का इतिहास और परंपरा यह कहती है कि उसके और बघाट के संस्थापक अजय देव और विजय देव दोनों भाई थे, जो धारा नगरी से आए थे। बड़े भाई अजय देव ने बाघल की नींव डाली और छोटे भाई विजय देव ने बघाट की। आरंभ में बाघल के शासकों के नाम के साथ ‘देव’ उपनाम लगता था और बघाट के शासकों के नाम के साथ ‘पाल’। बाघल के अजयदेव से लेकर वर्तमान राजा राजेंद्र सिंह तक 35 शासक हुए। बाघल की वंशावली में 75 से ऊपर नाम गिने जाते हैं। ये नाम दुगने से भी ज्यादा है। गढ़वाल के राजा भी पनवार वंशज हैं। इनकी तीन चार वंशावलियां मिलती हैं। इन वंशावलियों में एक में 60 दूसरी में 61 और तीसरी में 64 नाम मिलते हैं। गढ़वाल का संस्थापक भी धारा नगरी से ही आया था। यह संभावना हो सकती है कि बघाट और गढ़वाल के संस्थापक साथ-साथ धरनागिरी से आए हो। उनके आने का कारण  क्या हिमालय के तीर्थ स्थलों की यात्रा रही होगी या बाहरी अक्रमण, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

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