50 रुपए दिहाड़ी में कैसे चलेगा परिवार

नेरवा—नेरवा तहसील की ग्राम पंचायत बौर में एक परिवार मात्र 50 रुपये की दिहाड़ी से गुजारा कर रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि इस परिवार तक सरकार की गरीबों के लिए चलाई गई कोई भी योजना नहीं पहुंच पाई है। पंचायत प्रधान ने माना है कि इन सुविधाओं पर कुछ साधन संपन्न और प्रभावशाली लोग कुंडली जमाये बैठे है। इससे सवाल यह पैदा होता है कि सरकार द्वारा गरीबों के नाम पर चलाई जा रही योजनाएं क्या प्रभावशाली लोगों के लिए बनाई गई है। इन योजनाओं का लाभ पात्र गरीबों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे मामलों के प्रति सरकार उदासीन क्यों बनी बैठी है। बौर पंचायत की प्रभा का मामला सामने आने के बाद क्या सरकार पंचायत की जवाबदेही सुनिश्चित कर कोई कारगर कार्रवाई करेगी या फिर एक गरीब की यह हालत अनदेखी ही कर दी जाएगी। पंचायत की दलित बस्ती की निवासी 38 वर्षीय प्रभा के पति रामसा राम की चार साल पहले मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी प्रभा के कन्धों पर आ गई। प्रभा के तीन बच्चे हैं। बड़ा बेटा बौर स्कूल में दसवीं क्लास में उससे छोटी बेटी पांचवी क्लास में एवं सबसे छोटी बेटी आंगनबाड़ी में पड़ती है। प्रभा ने बताया कि वह रोजाना पच्चास रुपए की दिहाड़ी कर अपना व अपने बच्चों का पेट पाल रही है। प्रभा के पास मकान के नाम पर एक कमरे का टूटा फूटाघर है जिसकी छत टपकती है। छत के टपकने की वजह से प्रभा ने अपने आधार कार्ड आदि जरूरी दस्तावेज दूसरों के घरों में रखे हुए हैं। खाना बनाने के लिए घर से बाहर पत्थरों के ऊपर तख्तियां लगा कर उनके नीचे एक चूल्हा बनाया गया है एवं प्रभा अपने परिवार के लिए खुले आसमान के नीचे अपना दो वक्त का भोजन बनाने के लिए मजबूर है। प्रभा के घर में ना तो बिजली है और ना ही पानी, शौचालय भी नहीं है। मात्र 50 रुपये प्रतिदिन कमाने वाली इस महिला का परिवार ग्राम पंचायत द्वारा न तो बीपीएल श्रेणी में रखा गया है और ना ही इसकी  कोई पेंशन लगाईं गई हैएजिस वजह से ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। बहरहाल इस महिला की स्थिति को देखते हुए सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं का क्रियान्वयन भी सवालों के घेरे में है। एक तरफ  तो सरकार गरीब, उपेक्षित अंतिम व्यक्ति तक इन योजनाओं को पंहुचाने की बात करती है दूसरी तरफ  इस तरह के मामले सामने आने पर समझ में नहीं आता कि सरकार की नजर में वह अंतिम व्यक्ति कौन है जिसके लिए यह योजनाएं बनाई गई हैं। उधर इस विषय में ग्राम पंचायत बौर की प्रधान सरला जोशी का कहना है कि पंचायत में बीपीएल का चयन सात साल पहले 2012 में हुआ था उसके बाद बीपीएल का चयन ना होने के कारण प्रभा के परिवार का बीपीएल में चयन नहीं हो पाया है। पूछे जाने पर उन्हों ने माना कि कुछ साधन संपन्न व अपात्र लोगों का बीपीएल में चयन हुआ है परंतु वह इस सुविधा को छोड़ने पर तैयार ही नहीं है। बता दें कि दिव्य हिमाचल ने बौर पंचायत के बिगरौली गांव का एक ऐसा ही मामला ‘ऐसी जिंदगी से तो मौत को गले लगाना बेहतर’ शीर्षक के माध्यम से 18 मई के अंक में उठाया था जिसमें एक दृष्टिहीन विधवा महिला सुमित्रा और उसके चार छोटे-छोटे बच्चों की व्यथा को सरकार के समक्ष रखने का प्रयास किया था। इस मामले में सरकार की तरफ  से तो कुछ नहीं किया गया परंतु प्रदेश के जाने माने समाजसेवी संजय शर्मा के माध्यम से यह परिवार जिला कुल्लू के खकनाल स्थित एक प्रतिष्ठित एनजीओ श्राधाश के पास पंहुच गया है। अब सुमित्रा और उसका परिवार इस संस्था के आश्रम में खुशी-खुशी अपने दिन गुजार रहा है।

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