आर्थिक असमानता चिंताजनक

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

 

खुशहाली के पैमाने पर वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट की तरह अन्य कई रिपोर्टें बता रही हैं कि आर्थिक-सामाजिक खुशहाली के मुद्दे पर भारत बहुत पीछे है और भारत में आर्थिक असमानता का भयावह चेहरा है। ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2019-20 में दो से पांच करोड़ रुपए सालाना कमाने वालों पर तीन फीसदी सरचार्ज लगाया है, वहीं पांच करोड़ रुपए से अधिक कमाने वालों को सात फीसदी सरचार्ज देना होगा। यह कदम आर्थिक असमानता कम करने के मद्देनजर सराहनीय है…

यकीनन इस समय देश में बढ़ती हुई आर्थिक असमानता को घटाना देश की सबसे बड़ी आर्थिक-सामाजिक चुनौती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस समय देश और पूरी दुनिया में भारत में तेजी से घटती हुई गरीबी और भारत में तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक असमानता से संबंधित दो रिपोर्टें गंभीरतापूर्वक पढ़ी जा रही हैं। हाल ही में 12 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) ने 101 देशों में गरीबी पर पॉवर्टी इंडेक्स रिपोर्ट 2019 जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 101 देशों में 130 करोड़ गरीब हैं। भारत ने 2006-2016 के बीच दस विकासशील देशों के समूह में सबसे तेजी से गरीबी कम की है। इन दस सालों में देश के 27.1 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। पॉवर्टी इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक भारत में गरीब 55.1 फीसदी (64 करोड़) से घटकर 27.9 फीसदी (36.9 करोड़) रह गए हैं । इंडेक्स के आठ पैमानों के आधार पर गरीबी की रेटिंग की गई है, जिनमें पोषण की कमी, शिशु मृत्यु दर में कमी, रसोई गैस में कमी, स्वच्छता में कमी, पीने का पानी कम होना, बिजली की कमी, घरों की कमी तथा संपत्तियों का अभाव शामिल है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के कुल गरीबों में से करीब आधे गरीब यानी 19.6 करोड़ गरीब लोग देश के चार राज्यों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में रहते हैं। जहां संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में भारत में गरीबी तेजी से घटने की बात कही गई है, वहीं ऑक्सफैम इंडिया द्वारा प्रस्तुत आर्थिक असमानता रिपोर्ट 2018 में कहा गया है कि भारत में 1991 के बाद शुरू हुए उदारीकरण के बाद आर्थिक असमानता और अधिक भयावह होती जा रही है। कहा गया कि वर्ष 2017 में भारत में अरबपतियों की कुल संपत्ति देश की जीडीपी की 15 फीसदी के बराबर हो गई है, जबकि पांच वर्ष पहले यह 10 फीसदी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत विश्व के सबसे अधिक आर्थिक असमानता वाले देशों में से एक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 में भारत में जितनी संपत्ति बढ़ी, उसका 73 फीसदी हिस्सा देश के एक फीसदी अमीरों के पास पहुंचा। इसी तरह वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी क्रेडिट सुइस द्वारा प्रकाशित एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है। अति धनाढ्य लोगों की संख्या के हिसाब से भारत का दुनिया में छठा स्थान है। इसी तरह ऑक्सफैम और डिवेलपमेंट फाइनांस इंटरनेशनल द्वारा दुनिया में असमानता को कम करने की प्रतिबद्धता के सूचकांक 2018 में कहा गया है कि असमानता को दूर करने में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण कोरिया, नामीबिया और उरुग्वे जैसे देश असमानता दूर करने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं। इस सूचकांक में 56वें पायदान पर स्थित दक्षिण कोरिया के प्रयासों को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक विकास के कई कार्यक्रम चलाए गए और उनसे श्रमिकों का वेतन बढ़ा तथा बड़ी कंपनियों और सुपर रिच वर्ग पर भारी कर लगाकर उससे मिले पैसों को कमजोर वर्ग के विकास में खर्च किया गया। चाहे भारत में पिछले एक दशक में गरीबी कम हुई है, लेकिन अभी भी आर्थिक और सामाजिक असमानता के विभिन्न मापदंडों में पीछे होने के कारण भारत के करोड़ों लोग खुशहाली में भी पीछे हैं। यह चिंता की बात है कि खुशहाल और प्रसन्न देशों की सूची में भारत का क्रम काफी पीछे है। एक ओर जहां देश के विकास की रफ्तार वर्ष 2019 में करीब सात फीसदी से ज्यादा रहने और देश के दुनिया में सबसे तेज विकास दर वाला देश रहने की वैश्विक रिपोर्टें प्रकाशित हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर खुशहाली के पैमाने पर वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट की तरह अन्य कई रिपोर्टें बता रही हैं कि आर्थिक-सामाजिक खुशहाली के मुद्दे पर भारत बहुत पीछे है और भारत में आर्थिक असमानता का भयावह चेहरा है। ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2019-20 में दो से पांच करोड़ रुपए सालाना कमाने वालों पर तीन फीसदी सरचार्ज लगाया है, वहीं पांच करोड़ रुपए से अधिक कमाने वालों को सात फीसदी सरचार्ज देना होगा।

यह कदम आर्थिक असमानता कम करने के मद्देनजर सराहनीय है। देश और दुनिया के अधिकांश अर्थविशेषज्ञों ने अमीरों पर आयकर बढ़ाने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि भारत में कर की सबसे ऊंची दर अब भी अमरीका और चीन सहित कई देशों से कम है और दुनियाभर में अति धनाढ्य लोगों से अतिरिक्त कर वसूला जा रहा है। चीन और दक्षिण अफ्रीका में व्यक्तिगत कर की सर्वाधिक दर 45 फीसदी और अमरीका में 50.3 फीसदी है। निश्चित रूप से वर्ष 2019-20 के बजट में अमीरों पर कर बढ़ाने की घोषणा से देश के अति धनाढ्यों को ज्यादा कर देना पड़ेगा। स्टॉक एक्सचेजों में सूचीबद्ध कंपनियों में 2017-18 में 366 कार्याधिकारियों की कमाई पांच करोड़ रुपए से अधिक थी, जबकि 588 कार्याधिकारियों की आय दो करोड़ रुपए से पांच करोड़ रुपए के बीच थी। निश्चित रूप से आर्थिक असमानता को कम करने के लिए अमीरों पर कर अच्छे वैश्विक चलन के मुताबिक है। उच्च आय अर्जित करने वाले भी इसे समझते हैं और भारत के कायापलट के लिए जरूरी राजस्व में योगदान के लिए वे इस अतिरिक्त कर के लिए तत्पर भी होंगे। निश्चित रूप से समय के साथ आर्थिक आंकड़े सुनिश्चित करेंगे कि इससे धनी व गरीब दोनों लाभान्वित होंगे। हम आशा करें कि अब सरकार वर्ष 2019-20 के बजट के बाद धनकुबेरों पर कर बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू करेगी।

ऐसा होने पर ही आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक कल्याण के विभिन्न कदमों से वर्ष 2020 में भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की पावर्टी इंडेक्स रिपोर्ट में तेजी से गरीबी कम करने वाले देशों की सूची में ऊंचाई प्राप्त कर सकेगा, साथ ही ऑक्सफैम और डिवेलपमेंट फाइनांस इंटरनेशनल द्वारा तैयार किए जाने वाले आर्थिक असमानता के वैश्विक सूचकांक में भारत कुछ पायदान ऊपर पहुंचते हुए आर्थिक असमानता में कमी लाने में भी सफल हो सकेगा। इसके साथ-साथ विकास के लाभों से वंचित देश के करोड़ों लोगों को अधिक आर्थिक-सामाजिक खुशियां मिल सकेंगी।

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