‘एक भारत, एक चुनाव’ लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने के लिए बहुत जोर लगा रहे हैं। सरकारी एजेंसियां एक मजबूत प्रधानमंत्री की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई इच्छा पूरी करने के लिए एक-दूसरे से होड़ में हैं। परंतु लोग इस विचार के दीर्घकालिक लाभों और हानियों को न तो समझे हैं और न ही इन पर चर्चा की है। विचार देश के निकट भविष्य के लिए व्यावहारिक और लाभप्रद लगता है, परंतु यह मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों को तोड़ता है…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने के लिए बहुत जोर लगा रहे हैं। सरकारी एजेंसियां एक मजबूत प्रधानमंत्री की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई इच्छा पूरी करने के लिए एक-दूसरे से होड़ में हैं। परंतु लोग इस विचार के दीर्घकालिक लाभों और हानियों को न तो समझे हैं और न ही इन पर चर्चा की है। विचार देश के निकट भविष्य के लिए व्यावहारिक और लाभप्रद लगता है, परंतु यह मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों को तोड़ता है। इसमें संदेह है कि ‘एक भारत, एक चुनाव’ दीर्घ अवधि में देश के काम आएगा।

एक साथ चुनाव करवाना नया विचार नहीं है। भारत के पहले चार आम चुनाव इसी प्रकार हुए थे। यह प्रथा वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी ने बदल दी थी। वर्ष 1995 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष एलके आडवाणी ने इस विचार को फिर प्रमुखता में लाने का प्रयास किया था। उन्होंने कहा था कि चुनावों का अलग-अलग होना न लोकतंत्र के स्वास्थ्य और न ही प्रशासन के लिए ‘‘सही रहा है।’’ वर्ष 2010 में उन्होंने चुनाव एक साथ कराने का एकबार फिर प्रयास किया। इस बार उन्होंने तय-अवधि वाली विधायिकाओं के लाभ का खुल्लमखुल्ला प्रचार किया। ‘‘हमारे संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश पैटर्न चुना और निर्वाचित विधायिका का कार्यकाल घटाने के लिए कार्यपालिका को अधिकार दिए,’’ उन्होंने लिखा कि उनके प्रस्ताव का अर्थ ‘‘सरकार गिराने के संसद के अधिकार को छीनना नहीं, अपितु संसद भंग करने के सरकार के हक को वापस लाना था।’’

ताजा प्रयास में मोदी व अन्यों ने कई और तर्क भी प्रस्तुत किए हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं ‘‘भारत का मतदाता अब बहुत परिपक्व है और लोकसभा व विधानसभा चुनावों के लिए भिन्न निर्णय लेने में सक्षम है।’’ ये चुनाव एक साथ करवाने से ‘‘खर्च घटेगा, देश को कालेधन से छुटकारा मिलेगा, और हमें देश को आगे ले जाने के लिए पूरे पांच वर्ष मिलेंगे।’’ 2016 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सुर में सुर मिलाया था कि ‘‘साल भर चुनाव होने के कारण आचार संहिता से सरकार की गतिविधियां शिथिल हो जाती हैं।’’ नीति आयोग ने भी 36 पेज की रिपोर्ट तैयार की। वह इन तर्कों को सहारा देती है और यह कुछ अन्य तर्क भी जोड़ती है। नीति आयोग का कहना है कि लगातार चुनाव सामान्य सार्वजनिक जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं; इनके लिए भारी संख्या में सरकारी व सुरक्षा कर्मचारियों की आवश्यकता होती है; और ‘‘जाति, धर्म, व सांप्रदायिक मसले स्थायी बने रहते हैं।’’

नीति आयोग अपनी सहमति देने वाली पहली सरकारी एजेंसी नहीं है। एक स्थायी संसदीय समिति ने ऐसा 2016 में किया था। इसने एक साथ चुनाव करवाने के पक्ष में विधि आयोग की 1999 की एक सिफारिश को बढ़ावा दिया था। जुलाई 2016 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी चेतावनियों से भरपूर ठेठ नौकरशाही वाली हरी झंडी दिखाई। ‘‘हम तैयार हैं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘बशर्ते आम सहमति हो, राजनीतिक पार्टियां एकमत हों और संविधान में संशोधन भी हो।’’ हालांकि बहुत से विपक्षी दलों — कांग्रेस, तृणमूल, एनसीपी, सीपीआई, आदि — द्वारा संपूर्ण विचार के विषय में पहले ही संदेह जताया जा चुका था।

स्पष्ट है मोदी एक साथ चुनाव करवाने की जल्दी में हैं, क्योंकि उन्हें जीत की उम्मीद है। आडवाणी की भी 1995 और 2010 में समान दिलचस्पी थी। उन्हें पता था भाजपा आगामी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। विडंबना से, इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव अलग-अलग करवाने के निर्णय का समान मंतव्य था। वह जानती थीं कि उनका सितारा बुलंद हो रहा था और लोकसभा चुनावों को राज्य विधानसभा चुनावों के साथ करवाने का इंतजार नहीं करना चाहती थीं। राज्यों के कुछ नेता लोकप्रियता हासिल कर रहे थे और इंदिरा गांधी को आभास हो गया था कि वह इससे पार नहीं पा सकतीं।

ऐसी सियासी मुनाफाखोरी देश के लिए सही नहीं। इंदिरा गांधी ने जब महसूस किया कि लोकसभा चुनाव राज्यों से अलग आयोजित करने चाहिए, इसकी एक बहुत अच्छी वजह थी। भारत की विशालता और विविधता के चलते यह स्वाभाविक था कि राज्यों के मुद्दों, नेताओं, और पार्टियां का महत्त्व और प्रमुखता बढ़े। यह तथ्य लगातार स्पष्ट हो चुका है। एक के बाद एक राज्यों में स्थानीय उत्तरदायित्व लोगों की सर्वाधिक निरंतर मांग रही है। राज्य चुनावों का महत्त्व क्षीण करना — जो राष्ट्रीय दलों और मुद्दों को साथ रखने से होना निश्चित है — भारत के संघवाद के लिए ठीक नहीं हो सकता।

संघवाद का महत्त्व

हम भारतीयों ने वास्तविक संघवाद का मूल्य कभी ठीक से समझा ही नहीं। हम राज्य सरकारों को राज्य के लोगों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच के मुद्दे के रूप में नहीं देखते। हम राज्य के लोगों पर भरोसा नहीं करते कि वे जानते हैं उनके लिए बेहतर क्या है। और हम उनके प्रतिनिधियों पर भी विश्वास नहीं करते। इसके बदले हम उन पर शासन करने बाहर से गवर्नर भेज देते हैं। और हम तथाकथित मजबूत केंद्र के जरिए राज्य सरकारों को नियंत्रित करते हैं। परंतु केंद्र सरकार या देश के प्रधानमंत्री का राज्य के चुनाव में लिप्त होने का तुक ही क्या है? सच्चाई यह है कि राज्य चुनावों को अधिक महत्त्व देकर हम जमीन पर शासन में सुधार ला पाएंगे।

इसके अतिरिक्त, यह मूल संसदीय सिद्धांत तोड़े बिना कि सरकारें किसी भी समय गिराई जा सकती हैं, एक साथ चुनाव करवाना कैसे संभव है? यही वह संसदीय प्रणाली का मुख्य सिद्धांत है, जो सरकारों को उत्तरदायी बनाए रखता है। ‘‘उत्तरदायी’’ बनाम ‘‘स्थिर’’ सरकारों पर संविधान सभा में अंबेडकर के उल्लेख को याद करें। उन्होंने कहा था दोनों का होना असंभव है। चुनावों का समय निर्धारित करने से, उत्तरदायित्व को ज्यादा तरजीह दिए बिना, भारत में शर्तिया तौर पर पांच साल तक चलने वाली सरकारें होंगी। ऐसे में पहले से ही जारी कमजोर शासन व भ्रष्टाचार और बढ़ जाएगा।

नीति आयोग और अन्यों ने इस सिद्धांत से बचने के रास्ते सुझाए हैं। एक प्रस्ताव यह है कि अविश्वास प्रस्ताव में अगले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का बनना तय हो। परंतु राजनीतिक शरारतों के चलते सरकारों को गिराने के दौरान हमने देखा है कि कोई गारंटी नहीं होती कि समझौता हो पाएगा। या तो कोई सरकार नहीं बन पाएगी या अल्पमत की सरकार बनेगी। एक अन्य प्रस्ताव वर्ष 2011 के एक ब्रिटिश कानून की नकल का है। इसमें सरकार गिराने के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। यह भी अलोकतांत्रिक है, जो सौदेबाजी व भ्रष्टाचार की स्थिति और बिगाड़ देगा।

इस प्रकार के प्रस्ताव एक साथ चुनाव होने में एक और प्रमुख समस्या को दर्शाते हैं। वह यह कि एक साथ चुनाव स्थायी रूप से नहीं हो सकते। यही नहीं, एक चुनाव से केवल कुछ चुनावों की आवृति ही कम होगी। अन्य सभी चुनाव — स्थानीय, परिषद, राज्यसभा, राष्ट्रपति, आदि — वैसे ही होंगे जैसे वर्तमान में होते हैं।

मूल बात यह कि चुनाव प्रधानता वाले एक देश में चुनावों की संख्या कम करने का प्रयास अजीब बात है। क्या भारत के लोकतंत्र से बढ़कर भी कुछ अधिक आवश्यक है?

अकसर चुनाव करवाते रहना हमारी ताकत होनी चाहिए। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों से अलग रखने की व्यवस्था के अभाव में हमने इसे अपनी कमजोरी बना लिया है। अगर हर राज्य अपनी सरकार चुने और केंद्र अपने काम से काम रखे, दोनों सरकारें तरक्की करेंगी। भारत को यह दिशा अपनानी चाहिए।

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

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