एनआईए के जरिए सवाल

Jul 17th, 2019 12:04 am

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) संशोधन बिल लोकसभा में मतविभाजन के बाद पारित कर दिया गया। हालांकि इसकी जरूरत नहीं थी। ओवैसी ने मांग की, तो गृहमंत्री अमित शाह ने भी मतविभाजन का आग्रह किया। दरअसल वह यह साफ कर देना चाहते थे कि कौन आतंकवाद के पाले में है और कौन आतंकवाद का विरोधी है। बिल के पक्ष में 278 वोट पड़े और संशोधन बिल के खिलाफ मात्र छह वोट आए। लोकसभा में भाजपा-एनडीए सांसदों की ताकत के मद्देनजर यह संख्या कम थी। बहरहाल गृहमंत्री ने दावा किया कि आतंकवाद को खत्म करने में एनआईए कानून का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके दुरुपयोग की आशंकाओं को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है। विपक्षियों को इस पर संदेह है। वे एनआईए की वैधता और तटस्थता पर सवाल कर रहे हैं। संसद के भीतर ओवैसी ने सवाल उठाया कि उन्हें डराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वह डरने वाले नहीं हैं। गृहमंत्री ने सटीक जवाब दिया कि कौन डरा रहा है? यदि खुद उनके जेहन में डर है, तो वह क्या कर सकते हैं। दरअसल एनआईए बिल को मुसलमानों के डर से जोड़ कर देखा जा रहा है, जबकि आतंकवाद के खिलाफ कारगर कार्रवाई के लिए एनआईए के अधिकार क्षेत्र के विस्तार की व्यवस्थाएं बिल में की गई हैं। उन पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन आतंकवाद संबंधी बिल पर भी संसद बंटी नजर आती है। आतंकवाद से जुड़े कानूनों की नियति ऐसी ही रही है। टाडा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बनवाया और उसे लागू किया था, लेकिन कांग्रेस के एक और प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव की सरकार के दौरान टाडा को हटा दिया गया। आखिर यह क्यों…? पोटा को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लागू कराया था, लेकिन 2004 में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान पोटा को समाप्त कर दिया गया। इसे भाजपा बनाम कांग्रेस की राजनीति करार दिया जा सकता है, लेकिन सवाल आतंकवाद से जुड़े कानून का है। गृहमंत्री ने विपक्ष को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि पोटा कानून को वोट बैंक बचाने के लिए निरस्त किया गया था। पोटा खत्म करने के बाद आतंकवादी गतिविधियां बढ़ीं। 2008 में 26/11 को मुंबई में बहुत बड़ा आतंकी हमला किया गया। उसके बाद मनमोहन सरकार ने 2009 में एनआईए का गठन किया, जिसका जनादेश तय किया गया कि एजेंसी आतंकवाद से जुड़े मामलों की भी जांच करेगी। मुद्दा अब उसके विस्तार का है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी का आरोप है कि मोदी सरकार एनआईए और आधार जैसे कानूनों में संशोधन करके भारत को ‘पुलिस स्टेट’ में बदलना चाहती है। एनआईए को पुलिस एजेंसी न बनाया जाए। गृहमंत्री अमित शाह का कहना था कि श्रीलंका में हमला हुआ, हमारे लोग मारे गए। बांग्लादेश में हमारे लोग मारे गए, लेकिन देश से बाहर जांच करने का अधिकार एजेंसी को नहीं है। ऐसे में ये संशोधन एनआईए को विदेश में जांच का अधिकार देंगे। बिल के मुताबिक, विदेश में भारतीयों पर या भारत के हितों के खिलाफ अपराध की जांच एनआईए कर सकेगी। विदेश में किसी अपराध के संबंध में मामला दर्ज कर सकेगी, केस कर सकेगी और नए अपराध भी उसकी जांच के दायरे में होंगे। विपक्षी इन पर सवाल उठा रहे हैं। परमाणु सुरक्षा, मानव तस्करी, जाली नोट, साइबर अपराधों को भी एनआईए के दायरे में लाया गया है। एनआईए देश की ऐसी एजेंसी है, जिसे 90 फीसदी मामलों में आरोपियों को दोषी साबित करने में सफलता हासिल हुई है। यदि वक्त के मुताबिक उसमें संशोधनों की दरकार है, तो संसद के भीतर गंभीर चर्चा की जानी चाहिए। उसे भी हिंदू-मुस्लिम में बांट देना दुर्भाग्यपूर्ण है। अभी राज्यसभा में इस बिल पर बहस होनी है तथा उसे पारित किया जाना शेष है। उस सदन में भाजपा-एनडीए का बहुमत नहीं है। फिर भी ऐसे मुद्दे पर राजनीतिक एकता होनी चाहिए, क्योंकि एनआईए में संशोधन राष्ट्रीय सरोकार है।

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