खुले में छोड़ी गउओं को मिला आशियाना

शिमला—प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए अब खुले में आवारा छोड़ी पहाड़ी गायों को भी आशियाना मिल रहा है। खास बात यह है कि ऊपरी शिमला के  दस फार्मर्स ने अभी तक आवारा छोड़ी पहाड़ी गायों को अडॉप्ट कर लिया है। यानी कि खुले में छोड़ी पहाड़ी गाय को आशियाना भी मिल गया है, वहीं उनके गौ मूत्र से नेचुरल फार्मिंग अमल मेें लाई जाएगी। विभाग से मिली जानकारी के अनुसार चौपाल क्षेत्र से अकेले दस पहाड़ी गायों को फार्मर्स ने प्राकृतिक खेती के लिए घर में बांध दिया है। बताया जा रहा है कि बाकी फार्मर्स भी सड़कों पर घूमने वाली पहाड़ी गायों की तलाश कर रहे हंै। रोहड़ू, रामपुर, ठियोग में इक्का दुक्का किसानों द्वारा खुले में घूम रही गाय को बांधने की जानकारी है। गौर हो कि कृषि विभाग उन सभी फार्मर्स का रिकॉर्ड जमा कर रहा है, जिन्होंने अपने घरों में सड़कों से लाई हुई गायों को बांध रखा है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगर प्राकृतिक खेती के लिए फार्मर्ज इसी तरह खुले में छोड़ी गाय को अडॉप्ट कर लेते हैं, तो इससे प्रदेशभर में खुले में छोड़ी गउओं को रहने के लिए जगह व हर सुविधा मिल सकेगी। बता दें कि जिन फार्मर्ज के पास पहाड़ी गाय नहीं है, वहां पर प्राकृतिक खेती करने को देशी नस्ल की गाय लेने के लिए गुजरात व राजस्थान किसान रवाना हो गए हैं। खास बात यह है कि  देशी गाय की खरीद के लिए विभाग द्वारा पच्चास प्रतिशत की सब्सिडी फार्मर्ज को बहुत भायी है। यही वजह है कि देशी नस्ल की गाय खरीदने के लिए प्रदेश के 150 किसानों ने अप्लाई कर दिया है। वहीं कृषि विभाग ने इन किसानों को गाय लेने के पच्चास प्रतिशत तक की सब्सिडी देना भी शुरू कर दिया है। जानकारी मिली है कि देशी गाय खरीदने के लिए किसान प्राकृतिक खेती अपनाने के साथ अपनी रजिस्ट्रेशन भी विभाग में करवा रहे हैं। बता दें कि कृषि विभाग उन्हीं किसानों के आवेदन को देशी गाय की खरीद के लिए मान्य कर रहे हैं, जो प्राकृतिक खेती के साथ जुड़ चुके हैं और एक साल से ज्यादा समय से इस खेती को अपना रहे हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार 2669 फार्मर्ज ऐसे हो गए हैं, जो इस खेती के साथ जुड़े तो हैं, वहीं एक साल से प्राकृतिक खेती में सफलता के कई आयाम भी छू चुके हैं। बता दें कि प्राकृतिक खेती के लिए पांच नस्ल की देशी गाय विभाग ने मान्य व लाभदायक बताई हैं। इसमें थारपारकर, साहिवाल, रैंड सिंधी, गीर व पहाड़ी गाय शामिल है।

गाय का गोबर सोने की खान

गाय के गोबर को तो सोने की खान माना गया है, क्योंकि इसमें करोड़ो जीवाणुओं का वास होता है, जो भूमि की उर्वरा शक्ति को लगातार बनाए रखते हैं। प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञ बताते हैं कि गाय का गोबर भूमि की उर्वरा शक्ति को लगातार बनाए रखता है। देशी गाय के गोबर में विषाणु नाशक तत्व होते हैं। भारतीय नस्ल की गउओं में इन लाभकारी जीवाणुओं की संख्या विदेशी नस्लों की तुलना में कई सौ गुणा अधिक  होती है। प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञ का कहना है कि बाह्य आयात एंव विभिन्न कृषि रसायन अधारित वर्तमान कृषि से किसान की वर्तमान दुर्दशा को हम देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि इससे किसान की खेती लागत बड़ी, उत्पादन घटा, किसान ऋणी बनता गया और धीरे-धीरे खेती छोड़कर शहर की तरफ चलता गया।

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