‘चंदामामा’ के घर जरूर जाएंगे

अंतरिक्ष में एक और ऐतिहासिक छलांग के लिए कुछ प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अब चंदामामा सिर्फ काल्पनिक कथाओं और फिल्मी गीतों तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि हमारा मिशन चांद की सतह तक पहुंचेगा, वहां की दुनिया खंगालेगा, कई खुलासे भी करेगा और शोधकार्यों की पुष्टि भी करेगा कि चांद पर मानव जीवन कब तक संभव है। लक्ष्य तो यह है कि 2021 में अंतरिक्ष यात्रियों को ही चांद पर भेजा जाए। फिलहाल मानवीय मिशन नहीं, बल्कि रोबोटीय प्रयोग होगा। ‘चंद्रयान-2’ पूरी तरह राष्ट्रीय और स्वदेशी मिशन है। इसमें ऑर्बिटर चंद्रयान-1 वाला ही है, लेकिन रूसी स्पेस एजेंसी ‘रॉसकॉसमॉस’ से करार टूट जाने के बाद इसरो ने लैंडर और रोवर खुद ही बनाए हैं। अद्वितीय सफलता…। हमारे इस मिशन पर करीब 978 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है। यह अमरीका, रूस और चीन के चंद्रमा मिशनों की तुलना में काफी सस्ता है। 15 जुलाई की आधी रात में जब भारत सो रहा था, तब श्रीहरिकोटा से 2.51 बजे चंद्रयान-2 ने करीब 3.84 लाख किलोमीटर का सफर शुरू करना था। सबसे शक्तिशाली (बाहुबली), करीब 6.41 लाख किलोग्राम वजन के रॉकेट, जीएसएलवी मार्क-111 के जरिए चंदामामा के घर तक के सफर का आगाज किया जाना था, लेकिन कुछ तकनीकी खामियों ने ब्रेक लगा दिए, लिहाजा प्रक्षेपण रोकना पड़ा। अब जल्द ही नई तारीख का ऐलान किया जाएगा, लेकिन हमारे शोधार्थी वैज्ञानिकों के हौसले अब भी बुलंद हैं। मिशन की बुनियाद यथावत है। मिशन के लिए हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, कार्मिकों को सलाम और ढेरों बधाइयां…। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनना था। बहरहाल चंद्रयान-2 इसरो के माथे सम्मान तथा गौरव का एक और तिलक साबित होगा। अब वह दिन दूर नहीं, जब अमरीका, रूस, चीन के बाद भारत चांद पर पहुंचने वाला चौथा देश होगा। अमरीका और रूस वांछित परिणाम न पाने के कारण अपने चंद्र मिशन लगभग बंद कर चुके हैं, लेकिन चीन और भारत अब भी संभावनाओं को तलाशने में जुटे हैं। चंद्रयान-2 को लगभग 53 दिनों के सफर के बाद 6-7 सितंबर को चांद की सतह पर पहुंचना था। हम जब यह सफलता अर्जित करेंगे, तो पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही होगी। भारत का मिशन ‘अभूतपूर्व’ इस संदर्भ में कहा जा सकता है, क्योंकि वह चांद के दक्षिण धु्रव पर उतरेगा। वहां का तापमान बेहद कम होता है और लगभग अंधेरा ही होता है। दक्षिण धु्रव पर विशाल गड्ढे काफी संख्या में हैं। अभी तक के अभियान या तो चंद्रमा के उत्तरी धु्रव अथवा भूमध्य रेखा पर उतरते रहे हैं। चंद्रयान-1 की सफलता के बाद यह मिशन चांद के दक्षिण धु्रव में भेजा गया है, क्योंकि चांद पर अभी कई तरह के शोध किए जाने शेष हैं। पिछले मिशन ने चांद पर पानी के कणों की खोज की थी, तो पूरी दुनिया ने भारत की वाहवाही की थी। अब पानी की प्रचुर मात्रा के साथ-साथ मिट्टी, वहां की चट्टानों, खनिजों के नमूने भेजे जाएंगे। उनके शोध तय करेंगे कि चांद पर मानव जीवन कितना जल्दी संभव होगा। चांद पर 10 लाख मीट्रिक टन हीलियम भी बताया जाता है। वह भारत के लिए ‘कुबेर का खजाना’ साबित हो सकता है, क्योंकि उसकी कीमत कई लाख करोड़ रुपए आंकी जा रही है। यह भी दावा किया जा रहा है कि हीलियम के जरिए दुनिया की 500 सालों की ऊर्जा-जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। बहरहाल हम मिशन पर ही फोकस करें, तो यह हमारी अद्वितीय उपलब्धि होगी। इसरो ने प्रक्षेपण से कुछ देर पहले ही तकनीकी खराबी को देख लिया, लिहाजा हम एक बड़े विध्वंस से बच गए। वैज्ञानिक तौर पर भी दुनिया में किरकिरी होती। चूंकि नासा का उपक्रम भी चांद पर भेजा जा रहा था। यदि कोई दुर्घटना हो जाती, तो भारत और इसरो की विश्वसनीयता भी खंडित होती। फिलहाल इस प्रक्षेपण को स्थगित किया गया है, जिसकी घोषणा इसरो ने आधिकारिक तौर पर की है। बहरहाल देश और दुनिया नई तारीख और नए वक्त की प्रतीक्षा करेंगे कि कब हमारा रोबोटीय प्रयोग चंदामामा के घर तक पहुंचता है। चंदामामा के घर जाना तो तय है।

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