जलवायु परिवर्तन पर मंथन शुरू

शिमला में पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की कार्यशाला

शिमला – प्रदेश में निरंतर बढ़ रहे जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक गंभीर चिंतन में जुट गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण पर संकट गहराने लगा है। इसी के मद्देनजर पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मंगलवार से शिमला में तीन दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया है। कार्यशाला में पहुंचे वैज्ञानिक जहां पर्यावरण संरक्षण व जलवायु परिवर्तन पर अपने सुझाव देंगे, वहीं इस पर नियंत्रण पाने के लिए एक-दूसरे से गहन विचार-विमर्श करेंगे। इस अवसर पर विज्ञान, पर्यावरण एवं प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक डीसी राणा ने कहा कि प्रदेश में ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नदी-नालों में जल स्तर तो बढ़ रहा है, लेकिन भविष्य में इनके पिघलने से पानी की कमी हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए लोगों को अभी से तैयार रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि बारिश का पानी स्टोर करना होगा। प्रदेश में पिछले 18 सालों में करीब 20 मीटर ग्लेशियर कम हुए हैं, जो कि चिंता का विषय है। विभाग स्नो हार्वेस्टिंग पर भी काम कर रहा है, ताकि ग्लेशियर बच सकें। बता दें कि जल संकट और जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरे देश में मंथन किया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में भी लगातार ग्लेशियर पिघलने और लैंडस्लाइड जैसी समस्याओ से जूझ रहा है। इस कारण जलवायु परिवर्तन है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी जलवायु परिवर्तन का बहुत बुरा असर पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे जलवायु परिवर्तन पर पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने शिमला में विभिन्न विभागों के साथ आयोजन किया, जिसमें कई वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन पर अपने विचार साझा किए हैं। कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के नुकसान और उससे निपटने के लिए क्या किया जाए, इसको लेकर सुझाव भी दिए गए।

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