तेरी जंग और मेरी जंग

सुरेश सेठ

साहित्यकार

लगभग पौन सदी बीत गई। तब रात को बारह बजे लाल किले से एक आवाज गूंजी थी। मेरे देशवासियो! नया दिन शुरू हो गया। इस दिन की नई सवेर में भारत आंखें खोलते हुए अपनी गरीबी, बेकारी और पिछड़ेपन के अंधेरे को विदा करेगा। सबके लिए एक नए सूरज का उदय होगा। दासता का अंधेरा फिर कभी लौट कर न आए, आइए सब मिलकर ऐसा वचन करें। भाषण हो गया। देखते ही देखते आजादी के इतने साल बीत गए। हर स्वाधीनता दिवस पर फिर झंडा फहराता है। फिर एक भाषण होता है। ओज और तेज से भरा हुआ। यह भाषण वचनों और सपनों की तश्तरी पर सजा कर पेश किया जाता है। वर्ष बीत जाता है, फिर एक नया भाषण होता है। एक और फूल तश्तरी, कुछ और सपनों और वचनों के सजे ताशमहल। मत पूछिए कि पिछली तश्तरी और उस पर सजे सपनों और वचनों के फूलों का क्या हुआ? क्या हिमाकत है साहब। यहां मुर्दा सपनों और अधूरे वचनों का इतना बड़ा भंडार गृह है कि कुछ लोगों को इसमें जमा होता एक और यह ताशमहल खंडहर लगने लगता है। आप क्यों चिहुंके। भौं चढ़ा कर पूछा। अरे भई, यह ताशमहल क्या है? ताजमहल तो सुना है। जवाब साफ है हुजूर। बादशाह या आज के उसके गद्दीधारी बनाएं, तो ताजमहल। जब तक उस जगह गरीब पहुंचता है, तो उसका बन जाता है- ताशमहल। अब एक जंग उनकी है और एक जंग हम जैसे करोड़ों लोगों की। उनकी जंग में भाषण की नौटंकी, जुमलों की बरसात है, वादों का सैलाब है। आम आदमी के लिए मृगमरीचिका बिछाने की प्रतियोगिता है। यह प्रतियोगिता तब शुरू होती है, जब पांच साल के बाद चुनावों की घोषणा होती है। लोकतंत्र के नाम पर वंशवाद की परंपरा शुरू हो चुकी है। जैसे कोई आदमखोर शेर एक बार आदमी का खून मुंह लग जाने के बाद फिर जानवर मार कर खाना पसंद नहीं करता। इसी तरह एक नेता कुर्सी मिल जाने के बाद फिर समाज सेवा तो क्या, जनता की समस्याओं की पहचान तक करना पसंद नहीं करता। अंग्रेज उपन्यासकार थामस हार्डी होते तो एक नया ‘मिस्टर जैकिल और मिस्टर हाइड’ नॉवल लिख डालते। किराए की भीड़ जुटाई रैलियों में नेता का स्वर रुआंसा हो जाता है कि जैसे जनता के दुख दर्द, इनकी भूख, बेकारी और बीमारी से उनका सीना फट रहा है और अपने अंतःपुर में वह नेतागिरी का यही मूलमंत्र दोहराता है, जिसमें पंजाबी की लोक उक्ति मुखर होती रहती है कि ‘रोंदी यारा नूं, लै-लै नां भरावां दे।’ अर्थात याद तो अपने प्रेमी आ रहे हैं, लेकिन रोते हुए जन-परिवार को भरमाने के लिए वह अपने भाइयों के बिछड़ जाने का गम बखान कर रही है। बेटा जवान हो गया। भाई से लेकर भतीजा तक किसी काम का नहीं। अब इन सब को भी किसी न किसी मलाईदार कुर्सी पर जमाना है। आप इसे भाई-भतीजावाद कहते हैं, तो कहते रहें। हमें तो यही सिखाया गया है कि दान-धर्म करना है, तो अपने घर से शुरू करो। बेटा भी आपकी कृपा से खाने-कमाने लग गया है। कोई भी धंधा कर ले, कोई कानून का रखवाला, कोई टैक्स उगाहने वाला छापामार उसकी हवा की ओर भी देख नहीं सकता। अब भला आपको क्या तकलीफ?

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