दृष्टि की समग्रता के मायने

Jul 28th, 2019 12:04 am

पुस्तक समीक्षा

लघुकथा साहित्य की चिरपरिचित पत्रिका ‘दृष्टि’ अपने प्रत्येक अंक की विशेषता के लिए सहज ही जानी जाती है। अपनी इसी विशेषता को बरकरार रखते हुए पत्रिका ने अपने वर्तमान अंक को एक और नया आयाम दिया है। इस बार  पत्रिका ने ‘समग्र’ के लघुकथा पर 1978 में प्रकाशित ऐतिहासिक विशेषांक को पुनः प्रकाशित करने का एक उम्दा प्रयास किया है। ‘दृष्टि’ का यह विशेष अंक अप्रैल के प्रारंभ में ही पाठकों तक पहुंचने लगा था और संभवतः अब तक सभी तक पहुंच चुका होगा। क्वालिटी और पत्रिका में शामिल सामग्री से कोई समझौता न करने की पूरी कोशिश दृष्टि समूह की हमेशा से ही रही है। यदि इस बार के ऐतिहासिक अंक की बात करें तो पूर्व अंकों की तरह यह भी बेहतरीन सारगर्भित आवरण और साज-सज्जा के साथ, पुस्तकें प्राप्त और साहित्यिक गतिविधियां जैसे सभी स्थायी स्तंभ भी शामिल किए गए हैं। अंक सहज ही अध्ययन के लिहाज से बहुत बढि़या बना है। अंक के मुख्य आकर्षणों की यदि बात की जाए तो इसमें सर्वप्रथम महावीर प्रसाद जैन के गहन-गंभीर लेख ‘हिंदी लघुकथा ः शिल्प और रचना विधान’ का नाम लिया जा सकता है। जगदीश कश्यप के विस्तृत आलेख ‘हिंदी लघुकथा ः ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में’ को लघुकथा के जीवन काल की पूर्ण यात्रा कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। ‘विश्व साहित्य और लघुकथाएं’ के अंतर्गत सात विदेशी भाषाओं और सात भारतीय प्रादेशिक भाषाओं की रचनाओं का हिंदी रूपांतरण ‘सारिका’ और ‘मिनी युग’ जैसी पत्रिकाओं के सौजन्य से प्रस्तुत किया जाना लघुकथा पाठकों के लिए एक उपहार जैसा लगता है। मोहन राजेश के लघुकथा विशेषांक पर एक विस्तृत आलेख ‘लघुकथा विशेषांक ः विश्लेषण और मूल्यांकन’ बहुत ही दिलचस्प है। वर्तमान में लघुकथा संकलनों की बढ़ती संख्या के परिपे्रक्ष्य में आज के नए रचनाकार के लिए यह लेख अवश्य ही उल्लेखनीय रहेगा। लघुकथा के संदर्भ में रमेश बतरा से गौरी नंदन सिंह द्वारा हुई बात मुख्यतः लघुकथा और कहानी के विभेद पर की गई प्रस्तुति सहज ही दिलचस्प लगी। मूल्यांकन शीर्षक के अंतर्गत तत्कालीन, उस समय के 10 उम्दा लघुकथाकारों के संक्षिप्त परिचय, टिप्पणी और सब की दो-दो लघुकथाओं के साथ की गई प्रस्तुति लाजवाब है। ये श्रेष्ठ लघुकथाकार हैं भगीरथ, कृष्ण  कमलेश, रमेश बत्रा, मोहन राजेश, जगदीश कश्यप, चित्रा मुद्गल, महावीर प्रसाद जैन, कमलेश भारतीय, सिमर सदोष और पृथ्वीराज अरोड़ा। सम्मिलित की गई सभी लघुकथाएं उनकी बेहतरीन रचनाओं में से हैं। इसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए इस खंड में 25 और लेखकों के संक्षिप्त परिचय के साथ सबकी एक-एक लघुकथा दी गई है। इसी खंड में ‘कुछ और सुखनवर’ के अंतर्गत 25 और लेखकों की एक-एक लघुकथा भी दी गई है। इस अंक में शामिल लघुकथाकारों में से लगभग 15-20 लघुकथाकार अपनी पूरी निष्ठा से आज भी निरंतर इस विधा के उत्थान में सहयोग करते आ रहे हैं। 

                                       -वीरेंद्र मेहता

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