दोनों भौंहों के बीच है आज्ञा चक्र

इसका स्थान दोनों भौंहों के बीच में है। शरीर का नियंत्रक चित्त इसी चक्र के भीतर निवास करता है। ईश्वरीय आज्ञाएं तथा प्रकृति प्रदत्त प्रेरणाएं इसी को मिलती हैं। फिर यह तदनुसार शरीर-रक्षा के लिए इंद्रियों को आज्ञा देता है। पैर में चुभे काटों की अनुभूति पर जीवात्मा चित्त को संकेत देती है। इसकी चेतनता से संपूर्ण शरीर पर उत्तम प्रभुत्व प्राप्त होता है। यह दीर्घायु प्रदान करने में बहुत सहायक है। मनुष्य का चित्त तंत्र की भाषा में आज्ञा चक्र है। तंत्र सिद्धियां प्राप्त करने हेतु साधकजन विभिन्न क्रियाओं एवं साधनाओं द्वारा इन षट्चक्रों का भेदन करने के लिए प्रमुख उपाय ‘कुंडलिनी जागरण’ को अपनाते हैं…

-गतांक से आगे…

अनाहत चक्र : इस चक्र का स्थान हृदय में है। हृदय से इसका विशेष संबंध है। शरीर में व्याप्त वायु तत्त्व अनाहत कहलाता है। श्वसन-क्रिया, गंध-बोध, अंग-संचालन और श्रम आदि में यही तत्त्व क्रियाशील होता है। ध्वनि-श्रवण, उच्चारण, वक्तृता, चीत्कार और कलांति-निवारण में यह विशेष रूप से सहायक है। इसकी चेतनता से हृदय को बड़ा बल मिलता है।

शून्य चक्र : आकाश तत्त्व के रूप में शरीर को स्थिति देने वाला यही शून्य चक्र है।

आज्ञा चक्र : इसका स्थान दोनों भौंहों के बीच में है। शरीर का नियंत्रक चित्त इसी चक्र के भीतर निवास करता है। ईश्वरीय आज्ञाएं तथा प्रकृति प्रदत्त प्रेरणाएं इसी को मिलती हैं। फिर यह तदनुसार शरीर-रक्षा के लिए इंद्रियों को आज्ञा देता है। पैर में चुभे काटों की अनुभूति पर जीवात्मा चित्त को संकेत देती है। इसकी चेतनता से संपूर्ण शरीर पर उत्तम प्रभुत्व प्राप्त होता है। यह दीर्घायु प्रदान करने में बहुत सहायक है। मनुष्य का चित्त तंत्र की भाषा में आज्ञा चक्र है। तंत्र सिद्धियां प्राप्त करने हेतु साधकजन विभिन्न क्रियाओं एवं साधनाओं द्वारा इन षट्चक्रों का भेदन करने के लिए प्रमुख उपाय ‘कुंडलिनी जागरण’ को अपनाते हैं। कुंडलिनी जाग्रत होने पर विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया होती है। तब साधक सांसारिक अनुभूतियों से परे यहां से सर्वथा अछूते किसी लोक में (सूक्ष्म रूप में आत्मा द्वारा) पहुंच जाता है। उस समय व्यक्ति का पूर्ण शरीर समाधिस्थ अवस्था में रहता है-सर्वथा अनुभूतिहीन। योगीजन इच्छानुसार स्वयं को फिर ब्रह्मलोक से वापस लाकर शरीर में प्रतिष्ठित कर लेते हैं अर्थात वे अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा कहीं भी जाकर लौट आते हैं। तंत्र की चरम सिद्धि इसी में मानी जाती है। वस्तुतः तंत्र मन को निर्मल, निर्विकार और शक्ति-संपन्न करके षट्चक्र भेदन में समर्थ बनाता है। इस दशा में भौतिक सिद्धियां और चमत्कार साधक को स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं। अनेक योगी शून्य चक्र को विशुद्ध चक्र मानते हैं। इस चक्र का स्थान कंठ में है। यह धूम्र वर्ण का, सोलह दल वाला और गोलाकार है। यह छगलांड नामक शिवलिंग तथा शाकिनी देवी का स्थान है। जो योगी इस लिंग का ध्यान करते हैं, उन्हें संपूर्ण रहस्यों सहित चारों वेदों का ज्ञान हो जाता है।   

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