परिवहन नीति के इंतजार में पिसता हिमाचल

By: Jul 8th, 2019 12:06 am

साल में तीन हजार हादसों में 1200 लोगों की मौत के बाद हिमाचल में परिवहन पॉलिसी के कोई मायने नहीं । 2014 में इसकी परिकल्पना हुई थी, लेकिन दुर्घटनाओं पर लगाम नहीं लग पाई। हिमाचल की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी और हादसों से निपटने को क्या प्लान बना रहा विभाग, बता रहे हैं…                     

 टेकचंद वर्मा

हिमाचल प्रदेश की परिवहन नीति वर्ष 2014 में बनाई गई थी। इसमें सड़क हादसों को रोकने से लेकर प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में परिवहन सेवाओं का सुदृढ़ीकरण करने के लिए कदम उठाए गए हैं।  सड़क सुरक्षा के साथ-साथ इस नीति में महिला सुरक्षा और उनके लिए रियायतें, यात्रियों के लिए बस  स्टैंड्स में आवश्यक सामान उपलब्ध करवान बस क्यू शेल्टर्स शामिल हैं। इसके अलावा जल परिवहन को कारगर बनाने के साथ परिवहन कर्मचारियों को बेहतर सुविधाएं, उनकी निगरानी एवं मूल्यांकन पर विशेष तवज्जों देने का प्रावधान किया गया है। यही नहीं, परिवहन नीति में रोजगार के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसके जरिए प्रदेश के युवाओं को रोजगार से भी जोड़ने का प्रावधान है। रूटों को रेशनलाइजेशन करने की भी परिवहन नीति में योजना तैयार की गई है।  हालांकि नीति बनने के बाद इसे और कारगर व बेहतर बनाने के लिए सिफारिशें तो आती रही हैं, लेकिन उन पर गहनता से अध्ययन एवं कार्य नहीं किया गया है।

चालकों के लिए जल्द लगाई जाएगी वर्कशॉप

परिवहन विभाग राज्य में चालकों का यातायात नियमों का पाठ पढने के लिए वर्कशॉप आयोजित करेगा। इन वर्कशॉपों में टैक्सी चालकों के अलावा बड़े वाहन चलाने वाले चालकों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि राज्य में सड़क हादसों पर अकुंश लगाया जा सकें।

गांवों में बेहतर परिवहन सेवा देने का प्रयास

गांवों की परिवहन सेवा बेहतर करने के साथ हर व्यक्ति अपने घर तक आसानी से पहुंच सके, इसके लिए नई परिवहन नीति में प्रावधान है। ग्रामीण इलाकों में परिवहन सेवाएं संचालित करने के लिए निजी क्षेत्रों को भी प्रोत्साहित किया गया है।

महिला यात्रियों के लिए विशेष सुविधा

हिमाचल प्रदेश की परिवहन नीति में महिला यात्रियों पर विशेष सुविधाएं दी गई है। उनके लिए भी अलग से बसें या अन्य सेवाएं शुरू की गई हैं। इसका मकसद महिलाओं को सुरक्षित यात्रा प्रदान करना है।

रात्रिकालीन बस सेवा का प्रावधान

शहरों में रात्रिकालीन सेवा शुरू करने पर भी नई नीति में प्रावधान किया गया है। इसके जरिए प्रदेश के यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधा मुहैया कराना है, ताकि कोई भी यात्री कभी भी अपने गंतव्य तक पहुंच सके।

घाटे वाले रूट पर सबसिडी

एचआरटीसी के जो रूट घाटे पर चल रहे हैं, उन रूटों के लिए सरकार की ओर से सबसिडी का प्रावधान है, ताकि किसी भी रूट पर एचआरटीसी की बसें बंद करने की जरूरत न पड़े। प्रदेश के हर नागरिक को आसानी से परिवहन सेवा उपलब्ध हो सके, यह भी नीति में प्रावधान है।

हादसे रोकने को सड़क सुरक्षा प्राथमिकता में

परिवहन नीति में सबसे बड़ी प्राथमिकता सड़क सुरक्षा है। इसमें बस हादसों और अन्य सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अहम कदम सुझाए गए हैं। इसके तहत ब्लैक स्पॉट से लेकर खतरनाक सड़कों के सुधार पर जोर देना शामिल है। परिवहन सेवाओं के मजबूतीकरण के लिए नई बसें लाने के लिए भी प्रावधान है, ताकि हादसों की संख्या कम हो सके।

छात्रों को किया जाएगा जागरूक 

रोड सेफ्टी कैंपेन के तहत प्रदेश भर के स्कूली छात्रों को जागरूक करने के लिए स्कूलों में लेक्चर का आयोजन किया जाएगा। स्कूलों में 9वीं, 12वीं तक की कक्षाओं के लिए हर माह रोड सेफ्टी को लेकर लेक्चर आयोजित किया जाएगा। इसके लिए सभी स्कूलों में ट्रेनर तैयार किए जाएंगे। नियमों की अवहेलना सहित जागरूकता संबंधित जागरूकता का पाठ पढ़ाया जाएगा। इसके अलावा अब जल्द ही बसों के भीतर व बाहर अधिकारियों के नंबर अंकित किए जा रहे हैं, ताकि जनता चालक की किसी भी तरह की लापरवाही की शिकायत आसानी से कर सके और उस पर तुरंत प्रभाव से सख्त कार्रवाई अमल में लाई जा सके।

अवैध पार्किंग पर प्रशासन हुआ सख्त 

राज्य में हादसों के बाद सड़कों में हो रही अवैध पार्किंग को लेकर सरकार सख्त हो गई है। सड़कों से अवैध पार्किंग को हटाए जाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि प्रदेश की  सड़कों पर बढ़ रहे दबाव को कम किया जा सके। 

रद्दी बनकर रह जाती है जांच फाइल

हिमाचल प्रदेश में हर दुर्घटना के बाद जांच बिठाई जाती है। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य सरकार बड़े हादसों में मुख्य कारणों पर आवश्यकता के तहत संशोधन कर देती है। मगर शेष जांच रिपोर्ट रद्दी के ढेर में तबदील हो रही है। राज्य में हादसे के बाद अधिकांश जांच में विभाग के अधिकारी शामिल रहते हैं। बड़े हादसों की न्यायिक जांच करवाई जाती है। हादसों की रिपोर्ट तैयार कर यह राज्य सरकार को सौंपी जाती है,  जिस पर सरकार आवश्यकता के अनुसार संशोधन करती है। मगर सरकार ने भी माना है कि अधिकतर जांच की रिपोर्ट आने के बाद उस पर नतीजे तक नहीं पहुंचा जाता है। राज्य में यही बड़ी वजह है कि हादसों के बाद भी उनसे सबक नहीं लिया जा रहा है, जिससे राज्य में हर वर्ष हादसों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। 

जांच समिति में विशेषज्ञों की कमी

राज्य में हादसों के बाद गठित जांच कमेटी में विशेषज्ञों की कमी रही है। ऐसे में राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि प्रदेश में होने वाले हादसों की जांच अब थर्ड पार्टी से करवाई जाएगी, ताकि दुर्घटनाओं के वास्तविक कारण सामने आ सके और उन कमियों को पूरा करके हादसों पर अंकुश लगाया जा सकें, लेकिन आए दिन हो रहे हादसों को देखते हुए प्रशासन को जल्द इस ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि हादसों पर लगाम लगाई जा सके

लापरवाही पर दर्ज हो रही है एफआईआर, ददाहू में बस रूट रद्द

हिमाचल प्रदेश की परिवहन नीति में सड़क हादसों पर एफआईआर दर्ज करवाने का प्रावधान किया गया है। ददाहू में स्कूल बस हादसे की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद आपरेटर का रूट परमिट कैंसल कर दिया गया था। वहीं, लापरवाही पर एफआईआर दर्ज की गई थी।

ड्राइविगं लाइसेंस बनाने की प्रकिया होगी जटिल

 अब थर्ड पार्टी लेगी टैस्ट

 तीन जगह टेस्ट ट्रैक बनाने पर भी विचार

 हिमाचल में हादसों के बाद प्रशासन सख्त हो गया है। राज्य में अधिकतर हादसों में चालक की लापरवाही सामने आने के बाद अब लाइसेंस बनाने की प्रकियां को जटिल किया जा रहा है, ताकि हादसों पर अकुंश लगाया जा सके। अब लाइसेंस थर्ड पार्टी की देखरेख में टेंस्ट प्रकिया पूरी होने के बाद ही जारी किए जाएंगे,  वही परिवहन विभाग ने ड्राइविगं स्कूलों में हाजिरी सहित प्रशिक्षण पर भी सख्त निर्देश जारी किया गया है। इसमें विभाग ने निर्देश जारी किए हैं कि सभी ड्राइविग स्कूलों में हाजिरी सुनिश्चित की जाए। इसके लिए स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा गया है। स्कूलों से प्रशिक्षण लेने के बाद जब आवेदक ड्राइविंग टेस्ट देने आएगा तो थर्ड पार्टी ही उसका टेस्ट लेगी। हालांकि पूर्व में ड्राइविग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया को सरल किया गया था। मगर हादसों के बाद परिवहन विभाग इसको लेकर सख्त हो गया है। अब जहां नियमों में सुधार किया जा रहा है। वही लाइसेंस बनाने व टेस्ट लेने के लिए आधुनिक तकनीकों के प्रयोग का फैसला लिया गया है। इसको लेकर भी विभाग ने कवायद आरंभ कर दी है। जिसमें टेस्ट टै्रक बनाने की योजना मुख्य है। इसके लिए विभाग ने जगह देख ली है। राज्य के तीन स्थानों पर टेस्ट टै्रक बनाने की योजना चल रही है। इस योजना के सिरे चढ़ते ही आवेदकों को आधुनिक तकनीक में टेस्ट देना होगा। जिसमें आवेदकों को ड्राइविगं के साथ-साथ ट्रैफिक के नियमों से संबंधित कड़े टेस्ट से गुजरना होगा।

पांच विभागों का रोड सेफ्टी सैल

हिमाचल प्रदेश में सड़क हादसों को रोकने के लिए पांच विभागों का रोड सेफ्टी सैल बनेगा। राज्य सरकार ने मत्रिमंडल की बैठक में इस सैल के गठन के लिए मंजूरी प्रदान कर दी है। पुलिस, शिक्षा, लोक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य तथा परिवहन विभागों के अधिकारी इसमें शामिल किए जाएंगे। शुरुआती दौर में इन विभागों के अफसरों को रोड सेफ्टी सैल में डेपुटेशन पर तैनात किया जाएगा। अहम है कि शिक्षा तथा स्वास्थ्य विभाग के उपनिदेशक रैंक के अफसर इसमें में शामिल होंगे। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग का अधिशाषी अभियंता तथा पुलिस विभाग का डीएसपी शामिल किया जाएगा। परिवहन विभाग के संयुक्त निदेशक रैंक के अफसर को सैल का हिस्सा बनाया जाएगा। इसके तहत पांचों विभाग मिलकर सड़क हादसों को रोकने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करेंगे।  इस सैल की निगरानी में ही राज्य में रोड सेफ्टी अभियान चलेगा। अभियान के दौरान जनता को रोड सेफ्टी कल्चर अपनाने के लिए जागरूक किया जाएगा। इसमें जनता को जागरूक करने के लिए रेडियों, कैलेंडर, नुक्कड-नाटक,होर्डिग व बच्चों के लिए विभिन्न तरह की विवाद प्रतियोगिताए ओयाजित कर जागरूक किया जाएगा। ये प्रतियोगिताएं ब्लॉक स्तर से आरंभ होगी, ताकि स्कूली बच्चों के साथ-साथ आम जन मानस को रोड सेफ्टी के प्रति जागरूक किया जा सकें । 

प्रदेश में 10 हजार किलोमीटर सड़कें कच्ची

हिमाचल देश का अग्रणी पहाड़ी राज्य है। यहां पर लगातार सड़कों का जाल बिछ रहा है, लेकिन 10 हजार 07 किलोमीटर लंबी सड़कें अभी तक कच्ची हैं। इनमें से अधिकांश लिंक रोड हैं और ऐसे मार्ग अकसर दुर्घटना का कारण बनते हैं। प्रदेश में सड़कों की कुल लंबाई 36,789 किलोमीटर की है। इसमें लोक निर्माण विभाग के पास, जो नेशनल हाई-वे दिए गए हैं, उनकी लंबाई 1244 किलोमीटर की है। नेशनल हाई-वे अथॉरिटी के पास 773 किलोमीटर सड़कें हैं। राज्य में मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड की बात करें तो यहां पर 4277 किलोमीटर के ऐसे मार्ग हैं, जो कि जिला मुख्यालयों को जोड़ते हैं।  ग्रामीण सड़कों की कुल लंबाई 636 किलोमीटर की बताई जाती है। इसके अलावा पंचायतों ने भी कई मार्ग बना रखे हैं,  जिनकी संख्या 500 से ज्यादा बताई जाती है। 26772 किलोमीटर सड़कों पर मेटलिंग और टायरिंग हो चुकी है। लोक निर्माण विभाग के पास इस समय 2142 पुल दर्ज हैं, जो प्रदेश की सड़कों को आपस में जोड़ते हैं। प्रदेश में बढ़ रहे हादसे को रोकने के लिए सरकार को कड़े कदम उठाना चाहिए, ताकि हिमाचल में होने वाले  हादसों पर रोक लगाई जा सके। इसके लिए सबसे पहले सड़कों की दशा को सुधारना पडे़गा ।

हादसे रोकने के लिए एचआरटीसी का प्लान

हिमाचल में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एचआरटीसी ने प्लान तैयार किया है। राज्य में होने वाले अधिकांश हादसों में कहीं न कहीं चालकों की लापरवाही सामने आने से एचआरटीसी चालकों की काउंसिलिंग कर रहा है, जिसमें चालकों को यातायात नियमों का पाठ पढ़ाया जा रहा है ताकि चालकों की लापरवाही से होने वाले हादसों पर अंकुश लगाया जा सके। एचआरटीसी काउंसिल के द्वारा चालकों को बसों में ओवरलोडिंग पर पूर्णतः अंकुश लगाने, मार्ग में यातायात अवरुद्ध यानी अवैध पार्किंग के दौरान क्या-क्या सावधानियां बरती जाएं और राज्य की कच्ची सड़कों पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किन-किन सावधानियों को बरतना चाहिए इस बाबत चालकों को जागरूक किया जा रहा है। सामाजिक क्षेत्र में दायित्व निर्वहन करने के दावे करने वाली एचआरटीसी शायद ही कोई ऐसा वर्ष रहा होगा, जब घाटे का राग अलापते न थकी हो। एचआरटीसी का कुल घाटा 512 करोड़ बताया जाता है, जबकि सालाना घाटे की दर 43 करोड़ के लगभग बताई गई है। निगम के 920 रूट घाटे में बताए गए हैं। 520 के लगभग बसें जीरो बुक वैल्यू की हैं। बसों में सफाई व्यवस्था रामभरोसे रहती है। निगम घाटे के मार्गों का राग तो अलापता है, मगर जानकारी मिली है कि इन मार्गों पर खटारा बसें चलाई जाती है,  जो जीरो बुक वैल्यू की होती है। यानी उम्र के साथ-साथ अपना खर्च भी पूरा कर चुकी होती है। यह दीगर बात है कि तेल की खपत की दृष्टि से इन इलाकों का सफर निगम को खर्चीला दिखता है।  निगम की रोजाना की आय 60-70 लाख रुपए है, जबकि निगम को रोजाना 20 लाख के घाटे का सामना करना पड़ रहा है।

गोस्वामी रिपोर्ट की धज्जियां उड़ी

परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त बनाने के लिए गोस्वामी रिपोर्ट तैयार करवाई गई थी। इसमें सड़कों की व्यवस्था से लेकर पर्यावरण व्यवस्था में सुधार की सिफारिशें थी। ओवरलोडिंग, तेज रफ्तार, ड्राइवर की सीट के पास मिरर, बसों में स्टीरियो  पर पाबंदी जैसी सिफारिशे थी, मगर लागू नहीं हो सकी।

 एचआरटीसी का घाटा नहीं हो रहा कम

एचआरटीसी की वित्तीय सहायता में हर वर्ष बढ़ोतरी की जा रही है। मगर निगम का घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा। निगम की ऑक्यूपेंसी दर 60 फीसदी बताई जाती है। अंतरराज्यीय मार्गों पर निगम गाढ़ी कमाई करता है। मगर जवाबदेही के अभाव में निगम हर बार लोगों की पीठ पर बोझ लादता है।

 90 फीसदी ड्राइवरों की लापरवाही

राज्य में हर वर्ष 3 हजार के करीब सड़क हादसे पेश आ रहे हैं जिनमें करीब 900-1200 लोग काल का ग्रास बन रहे हैं। अध्ययन के तहत राज्य में होने वाले हादसे 90 फीसदी तक ड्राइवरों की लापरवाही के चलते पेश आ रहे हैं।

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