प्रदूषण के खिलाफ

पहाड़ की हवाओं ने अपनी खुशबू छीन ली, तो परिवेश ने गंध में रहते हुए अपनी ही लाली लील दी। प्रदूषण मानवीय भूल को प्रायश्चित करने का सबब दे रहा है और अगर अब सचेत न हुए, तो वक्त की चेतावनी और सख्त हो जाएगी। ऐसे में हिमाचल के सात शहरों ने प्रदूषण से लड़ने का जो खाका खींचा है, उसके साथ प्रशासनिक, वैज्ञानिक तथा प्रबंधन के तौर तरीके नत्थी हैं, लेकिन सामाजिक आंदोलन की रूपरेखा में ही इसकी सफलता के पैमाने तय होंगे। सुंदरनगर को छोड़कर बाकी सभी शहर हिमाचल की औद्योगिक प्रगति का दस्तावेज ओढ़े हैं, और इस तरह प्रगति के सुराख ऐसे माहौल की दास्तान की तरह देखे जाएंगे। सात शहरों की गलती का संज्ञान लेना और दुरुस्ती का इंतजाम करके एक सुखद पहल हो रही है, फिर भी कमोबेश ऐसे ही कारणों की जद में हिमाचल के अन्य कई शहर, कस्बे और गांव आ रहे हैं। सड़कों के किनारे वाहनों के वर्कशाप जिस तरह कई तरह के जहरीले तत्त्व फैला रहे हैं, उसका असर साथ लगते खेतों की उजड़ती फसल में देखा जा सकता है। खड्डों के किनारे प्रवासी बस्तियों के कारण गंदे नाले बढ़ते जा रहे हैं। कमोबेश हर शहर का कूड़ा कचरा प्रबंधन कई तरह के प्रदूषण का स्रोत बनता जा रहा है। आश्चर्य यह कि इस विषय में घोषणाओं के बावजूद नगर निकायों के सामर्थ्य से कूड़े-कचरे का प्रबंधन बाहर होता जा रहा है। शिमला-सोलन जैसे अति विकसित शहरों के लिए अश्विन खड्ड अब मात्र प्रदूषण का हिसाब-किताब है। प्राकृतिक जल स्रोतों और निकासी पर अतिक्रमणकारी इरादों ने पैठ जमाई तो अब कई शहरों ने अपने दामन में गंदगी का आलम ओढ़ लिया है। प्रदूषण के हिसाब से हवाओं में आवश्यकता से अधिक वाहनों ने जहर भरना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन भी अभी मुकम्म्ल नहीं है, नतीजतन इस दिशा में सक्रियता से कदम उठाने पड़ेंगे। औद्योगिक प्रदूषण से जो कालिख छह शहरों में बिखरी है या सीमेंट प्लांट के दायरों में उठते गुब्बार ने पर्यावरण पर जिस तरह कब्जा जमाया है, उसके निशान बढ़ रहे हैं। प्रदूषण के जख्म केवल सात शहरों में ही नहीं रिस रहे, बल्कि नागरिक गतिविधियों ने इस दिशा में हर गली और कस्बे को बदनाम करना शुरू कर दिया है। कहने को हिमाचल पोलिथीन मुक्त है, लेकिन प्रदेश के सीमांत व ग्रामीण क्षेत्रों में हर तरह की सामग्री उपलब्ध है। सब्जी मंडियों से दूध की आपूर्ति तक इस्तेमाल हो रहे पोलिथीन का कोई विकल्प सामने नहीं आया है, तो सीवरेज प्रणाली भी हिमाचल में पूरी तरह सक्षम नहीं हुई, ताकि परिवेश के संरक्षण में जनभागीदारी बढ़े। हैरानी यह कि नगर निकायों की वित्तीय स्थिति न माकूल कर्मचारी संख्या नियुक्त कर पा रही है और न ही प्रदूषण के खिलाफ व्यवस्थागत इंतजाम कर पा रही है। ऐसे में नागरिक समाज अगर डोर-टू-डोर कूड़ा एकत्रीकरण को भी पचास रुपए तक देने में टलता हो, तो बड़ी से बड़ी योजनाएं भी हमें नहीं बचा पाएंगी। शहरों में डंपिंग साइट्स को अगर भविष्य के सामुदायिक मैदानों के रूप में विकसित करने की योजनाएं बनाएं, गीले कचरे या बेकार में फेंकी जा रही खाद्य सामग्री को गोसदनों से जोड़ें तथा प्लास्टिक सामग्री को सड़क निर्माण में खपाएं, तो प्रदूषण के खिलाफ एक दीवार खड़ी की जा सकती है।

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