प्राकृतिक खेती में तबदील हुआ आतमा प्रोजेक्ट

शिमला—शिमला जिला में अब आतमा प्रोजेक्ट के तहत जैविक खेती के लिए आने वाला बजट भी प्राकृतिक खेती में कनवर्ट हो गया है। यानी अब अगर जैविक खेती करने वाले किसानों को सरकार से आर्थिक मदद चाहिए होगी तो उन्हें प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ना होगा। केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद जिला में आतमा यानी कृषि प्रौद्यौगिकी प्रबंधन अभिकरण का सारा बजट अब जीरो बजट खेती में ही खर्च होगा। ऐसे में अब मौजूदा समय में ऑर्गेनिक खेती कर रहे किसानों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। फार्मर्स को जैविक खेती के लिए जो भी सहायता या उपकरण खरीदने होंगे, तो इसके लिए उन्हें अपना ही बजट खर्च करना होगा। बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार के इन निर्देशों के बाद शिमला के हजारों ऑर्गेनिक खेती करने वाले किसानों को बड़ा झटका लगा है। सूत्रों की मानें तो आतमा के तहत सबसिडी पर मिलने वाले उपकरण भी केवल प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को ही मिलेंगे। हालांकि जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए अब कलस्टर ग्रुप भी कृषि विभाग की सहायता करेंगे। यानी जिला में जैविक खेती कर रहे कलस्टर गु्रप को भी प्राकृतिक की ओर लाने की तैयारी में कृषि विभाग है। बताया जा रहा है कि आतमा के तहत जैविक खेती के लिए आने वाले बजट को भी प्राकृतिक खेती में ही अब खर्च किया जा रहा है। ऐसे में यह तो साफ है कि जिला के ज्यादा से ज्यादा किसानों को ऑर्गेनिक से प्राकृतिक की ओर लाने की पूरी योजना बना दी है। गौर हो कि प्राकृतिक खेती के निर्माता सुभाष पालेकर ने भी कहा था कि रासायनिक खेती से ज्यादा जैविक खेती भूमि की उपजाऊ मात्रा को कम करती है। ऐसे में अब जिला के किसानों को जैविक व रासायनिक से अब प्राकृतिक की ओर लाना बड़ी चुनौती बना हुआ है। गौर हो कि प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरंतर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत वर्ष में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गो पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रंथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं, जिन्हें हम गोपाल एवं हलधर के नाम से संबोधित करते हैं, अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से अत्याधिक लाभदायी था, जो कि प्राणी मात्र व वातावरण के लिए अत्यंत उपयोगी था, परंतु बदलते परिवेश में गोपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है, जिसके फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदार्थों के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है और वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में अब मानव जीवन को बचाने के लिए प्राकृतिक खेती का रास्ता ही कृषि विभाग बताता है। भले ही जैविक व रासायनिक खेती के दुष्प्र्रभाव का हवाला देते हुए कृषि विभाग सेंटर का पूरा बजट प्राकृतिक खेती में कनवर्ट कर रहे हैं।

प्राकृतिक खेती को हर किसान तक पहुंचाने की जरूरत

गौर हो कि अभी भी जिला के हर क्षेत्र में किसानों तक प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूक नहीं किया गया है। ऐसे में कृषि विभाग के अधिकारी खुद यह मानते हैं कि प्राकृतिक खेती को जन जन तक पहुंचाने के लिए अभी और प्रयास करने होंगे।

You might also like