बचपन के शौक ने दिखा दी मंजिल

Jul 10th, 2019 12:05 am

मेला राम शर्मा हिमाचल प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से डेढ़ साल पहले उपनिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के दौरान भी उन्होंने अनेक वीडियो एलबम का निर्देशन किया। उन्होंने ‘दिव्य हिमाचल’ से बातचीत के दौरान कहा कि उन्हें बचपन से ही फोटोग्राफी और  वीडियोग्राफी का शौक रहा है। उन्होंने हिमालय के कई क्षेत्रों में प्रकृति की बहुत फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की है और तीन वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश भाषा कला संस्कृति द्वारा गेयटी थियेटर में इनके छाया चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई वह प्रदर्शनी हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी फोटो प्रदर्शनी थी क्योंकि उसमें मेला राम द्वारा लिए गए लगभग डेढ़ सौ फोटोग्राफ  लगाए गए और प्रदर्शनी के दौरान लगभग आधा दर्जन फोटोग्राफ 11 फुट लंबे और पांच फु ट चौड़े लगाए गए थे यह फोटो प्रदर्शनी अपने आप में प्रदेश की सबसे बड़ी फोटो प्रदर्शनी थी। जहां तक फिल्म निर्माण का प्रश्न है तो उन्होंने सूचना जनसंपर्क विभाग में 38 वर्ष की सेवा काल के दौरान ऑडियो और वीडियो एलबम का अवैतनिक निर्देशन किया सेवानिवृत्ति के दौरान मेला राम, ने डेढ़ वर्षों के दौरान लगभग छह वृत्त चित्र बनाए हैं। सबसे पहले मेला राम को सिरमौर जिला के रेणुका डैम विस्थापितों पर ‘इन द ट्विलाइट जॉन’ डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाई इस डाक्यूमेंटरी फिल्म को अक्तूबर 2018 में शिमला के गेयटी थियेटर में हिमालयन वेलोसिटी द्वारा आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिमाचल की सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ उसके पश्चात एक डाक्यूमेंटरी फिल्म  ‘रेणुका जी तीर्थ’ पर बनाई जिसे रेणुका विकास बोर्ड द्वारा गत वर्ष रेणुका मेले के दौरान हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के समक्ष दिखाया गया । उसके पश्चात उन्होंने जिला में महिला समूह द्वारा चलाए जा रहे पत्तल उद्योगों पर एक डाक्यूमेंटरी बनाई और साथ में सिरमौर जिला में आत्मा परियोजना के अंतर्गत सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती पर जिला प्रशासन के लिए एक डाक्यूमेंटरी फिल्म तैयार करके दी उसके पश्चात गत वर्ष दीपावली के ठीक एक माह पश्चात सिरमौर जिला के रेणुका और सिलाई क्षेत्रों में आयोजित होने वाली ‘बूढ़ी दिवाली’ पर डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाई ।

 इस फिल्म को कला समृद्धि अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव मुंबई भेजा जहां इसे 25 से 27 जून, 2019 तक हुए फिल्मोत्सव में प्रदर्शन के लिए चुना गया। उनका कहना है कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्म को मुंबई के कला समृद्धि अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव में दिखाने के लिए चुना गया है उसके पश्चात उन्होंने स्वयं उस फिल्मोत्सव में जाने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था की उनके द्वारा बनाई गई बूढ़ी दिवाली फिल्म को माया नगरी मुंबई के इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में किसी प्रकार का पुरस्कार मिलेगा । उन्होंने कहा कि इस फिल्मोत्सव के अवार्ड सेरेमनी के दौरान उन्हें उस समय हैरानी हुई जब आयोजकों ने मंच से उनकी इस फिल्म को स्पेशल जूरी अवार्ड प्रदान करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनके लिए यह सचमुच में वे पल अत्यंत रोमांचक और बेहद खुशी से भरपूर थे। उन्होंने कहा कि सिरमौर जिला के दूरदराज रेणुका और शिलाई के कुछ गांव में ‘बूढ़ी दिवाली’ की जगह नई दिवाली मनाने का फैसला लिया था और उनके लिए यह चिंता का विषय था कि उस क्षेत्र के लोग आधुनिक आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं को तिलांजलि देकर अपनी पुश्तैनी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। उन्हें लगा कि यदि यही सिलसिला चलता रहा तो आने वाली पीढि़यां न केवल अपनी लोक संस्कृति से विमुख होंगी परंतु अपने क्षेत्र विशेष की पहचान भी खो देगी क्योंकि किसी भी क्षेत्र की पहचान वहां की लोक परंपराओं और लोक संस्कृति से होती है और हमारी समृद्ध संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन होगा तो नई पीढ़ी भी अपनी संस्कृति से जून पाएगी। उन्होंने विलुप्त हो रही ‘बूढ़ी दिवाली’ परंपरा पर डाक्यूमेंटरी फिल्म बनाने का निर्णय लिया । उन्होंने कहा कि वहां की इस प्राचीन परंपरा की ‘बूढ़ी दिवाली’ को देखने के लिए हिमाचल ही नहीं अपितु पड़ोसी राज्य उत्तराखंड से भी सैकड़ों लोग इस गांव में पहुंचते हैं।  इस चार दिवसीय महोत्सव के दौरान उन्होंने ‘बूढ़ी दीवाली’ पर्व के हर पहलू को डाक्यूमेंटरी फिल्म में दिखाने का प्रयास किया है जिसमें विभिन्न प्रकार के लोक नृत्य लोकनाट्य स्वांग के इलावा ‘बूढ़ी दिवाली’ के दौरान मेहमानों और रिश्तेदारों की आवभगत के लिए बनाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के लोक व्यंजनों को भी वृत्तचित्र में शामिल किया गया है।                       -दीपिका शर्मा, शिमला

मुलाकात :फोटोग्राफी में भी अद्भुत कार्य किया जा सकता है…

बूढ़ी दिवाली तक के सफ र में आप कितने संतुष्ट हैं?

अभी तक लगभग एक दर्जन डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई , परंतु मेरी रेणुका डैम विस्थापितों पर फिल्म ‘इन द ट्विलाइट जॉन’ को गत वर्ष शिमला में अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव में हिमाचल की सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी फिल्म का पुरस्कार मिला और अब ‘बूढ़ी दिवाली’ को मुंबई के कला समृद्धि अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल जूरी अवार्ड मिला इससे संतुष्ट ही नहीं हूं, काफ ी प्रोत्साहित भी हूं।

फिल्मांकन की दृष्टि से हिमाचल अभी कितना अछूता है?

हिमाचल में फिल्म निर्माण का कार्य अधिक नहीं हो रहा है और जो लोग इस काम में लगे हैं वे दिल्ली और मुंबई तक सीमित हैं। हिमाचल में युवाओं को फिल्म निर्माण के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ताकि अधिक से अधिक युवा इस व्यवसाय से जुड़ सकें।

हिमाचल को सारे विश्व के सामने पेश करना हो  तो किन विषयों का फिल्मांकन करना होगा?

हिमाचल की समृद्धि कला और संस्कृति की अनेक विधाओं में फिल्म आंगन की अपार संभावनाएं हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके अलावा हिमाचल का अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य भी दुनियाभर के सैलानियों को आकर्षित करता है और यदि हिमाचल की प्रकृति पर फिल्मांकन किया जाए तो इसे दुनिया भर में अच्छा स्थान मिल सकता है।

फोटोग्राफी को बतौर कला प्रोफेशन के रूप में कहां भिन्न-भिन्न देखते हो?

फोटोग्राफी अपने आप में एक कलात्मक व्यवसाय है हिमाचल में भी मीडिया सरकारी कार्यालयों और व्यक्तिगत व्यवसाय में अच्छा स्कोप है बस जरूरत है, तो कड़ी मेहनत और गहन लग्न की।

क्या हिमाचली युवाओं के लिए यह बेहतर प्रोफेशन हो सकता है?

युवाओं के लिए फोटोग्राफी एक बहुत अच्छा प्रोफेशन है,क्योंकि जिसके पास थोड़ी रचनात्मक सोच हो वह फोटोग्राफी में अद्भुत कार्य कर सकता है और विशेषकर मीडिया में तो फोटोग्राफी का बहुत ज्यादा स्कोप है, परंतु हिमाचल में युवाओं को फोटोग्राफी की ट्रेनिंग के लिए अधिक नहीं हुआ है। यदि सरकार इस विषय में ध्यान दें तो अन्य व्यावसायिक कोर्सों की भांति फोटोग्राफी  में भी युवाओं को ट्रेनिंग देकर प्रोत्साहित किया जा सकता है।

हिमाचल पर बनी किन डाक्यूमेंटरी फिल्मों को आप उत्कृष्ट मानते हैं?

वैसे तो हिमाचल में काफी अच्छी फिल्में बन रही हैं, परंतु देवकन्या ठाकुर द्वारा बनाई गई ‘नो वूमेंस लैंड और बिहाइंड द बार’ काफी अच्छी फिल्में बनी हैं और साथ में राजेंद्र राजन द्वारा बनाई गई ‘खात्री’ फिल्म भी मेरे हिसाब से अच्छी बनी है।

आपकी दृष्टि में ऐसे कौन-कौन हिमाचली हैं जो फिल्म निर्माण में काफी काम कर रहे हैं?

हिमाचल में अभी फिल्म निर्माण के व्यवसाय से अधिक लोग नहीं जुड़ पाए हैं, परंतु मेरी दृष्टि में विवेक, मोहन , राजेंद्र राजन देवकन्या, संजीव रतन, अजय सकलानी, अनिल कायस्थ, पवन शर्मा, बालकृष्ण शर्मा और सिद्धार्थ चौहान आदि ऐसे नाम हैं, जो इस काम में कुछ न कुछ अवश्य अच्छा कर रहे हैं।

हिमाचल में फिल्म शूटिंग के लिए कौन से क्षेत्र ज्यादा आकर्षित करते हैं ?

अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के कारण समूचा हिमाचल प्रदेश अपने आप में एक फिल्म स्टूडियो है। कुल्लू मनाली में कई दशकों से फिल्म शूटिंग हो रही है, परंतु हिमाचल प्रदेश के चंबा, खजियार, धर्मशाला व मंडी जिला के पहाड़ी क्षेत्रों और सिरमौर जिला के रेणुका हरिपुरधार और चूड़धार आदि में नैसर्गिक सौंदर्य के कारण फिल्म शूटिंग की अपार संभावनाएं हैं इसके अलावा लाहुल-स्पीति और किन्नौर का कोल्ड डिजर्ट दुनिया भर में अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के लिए मशहूर है।

फिल्म या डाक्यूमेंटरी निर्माण में हिमाचल की फिल्म नीति को कैसे देखते हैं ?

हिमाचल सरकार द्वारा अभी कुछ ही महीने पहले फिल्म नीति बनाई गई है। राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की यह बहुत सकारात्मक और दूरदर्शी सोच है, उम्मीद है कि यह फिल्म नीति हिमाचल प्रदेश के फिल्म निर्माताओं और नौजवानों के लिए कारगर सिद्ध होगी। प्रदेश ही नहीं अपितु देश-विदेश के फिल्म निर्माताओं के लिए भी राज्य के भीतर एक अच्छा माहौल तैयार करने में सार्थक सिद्ध होगी।

क्या हिमाचली लोक कलाकार को उसका हक मिल रहा है ?

इस दुनिया में कोई किसी का हक नहीं मार सकता यदि आपके अंदर ईमानदारी, लगन और कड़ी मेहनत से काम करने का मादा है तो दुनिया की कोई ताकत आपसे आपका हक नहीं छीन सकती।

बतौर फोटोग्राफर आपको हिमाचल की विकास यात्रा में क्या कुछ खोने का अंदेशा है?

बतौर फोटोग्राफर जीवन में हमेशा सकारात्मक सोच से काम किया है और हमेशा नाम और दाम दोनों पाए हैं, इसलिए कुछ खोने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

ऐसा कोई फोटो जो आप ही ले पाए या कोई अनुभव जो आपके लिए प्रेरणा बन गया?

मेरे छाया चित्रों की जब शिमला के गेयटी थियेटर में प्रदर्शनी लगी तो मेरे अनेक छायाचित्र पर काफी चर्चा हुई परंतु शिमला के रिज मैदान पर हिमाचल निर्माता डा. परमार के स्टेच्यू में शाम के समय उनकी टांगों के नीचे से निकलती ढलते सूरज की किरणों का फोटोग्राफ  मैंने लिया तो उस पर हिमाचल के प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीनिवास जोशी द्वारा ‘द ट्रिब्यून ’ में लिखे गए आर्टिकल पर बहुत चर्चा हुई यह छायाचित्र वास्तव में मेरे लिए प्रेरणा बन गया

आगामी कोई प्रोजेक्ट या सपना जिसे कैमरे की आंख से देखते हैं?

मैं एक फिक्शन फिल्म पर काम कर रहा हूं, जिसमें बच्चों के मस्तिष्क पर टीवी और सोशल मीडिया के प्रभाव को दर्शाने का प्रयास कर रहा हूं। मुझे उम्मीद है कि यह फिल्म मेरे स्वप्न को साकार करेगी

जीवन में जो पाया उस में कहीं खोने- पाने का डर रहा या ऐसा कोई एहसास जो खोने-पाने से मिला?

मैंने प्रभु की कृपा से जीवन में जो कुछ भी पाया उस बारे में कभी सोचा भी नहीं था, क्योंकि मैं ऐसे पिछड़े क्षेत्र से हूं जहां हम लोग दसवीं कक्षा तक बिजली न होने के कारण दीये की रोशनी में पढ़ाई करते थे और लगभग पांच किलोमीटर नंगे पांव स्कूल जाया करते थे, लेकिन कड़ी मेहनत लगन निष्ठा ईमानदारी और सकारात्मक सोच से आगे बढ़े तो जीवन में कुछ भी खोने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

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