बाल सफेद होने का मतलब

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

बाल सफेद होने का अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है। पहले ये ही सफेद बाल व्यक्तित्व की पहचान थे। बाल सफेद होने पर आदमी को समझदार, शिष्ट तथा गरिमामय माना जाता था। राजा दशरथ ने एक बार कान के पास एक सफेद बाल देखा, तो उन्होंने राजपाट छोड़कर संन्यास की तैयारी कर ली थी। सफेद बालों की ही देन थी कि लोग संन्याश्रम एवं वानप्रस्थाश्रम में चले जाया करते थे। लंगोट लगा लेते थे। अब मामला ही उल्टा है। सारे वे काम सफेद बालों के बाद होने लगे हैं, जो काले बालों में किए जाते थे। पचास वर्ष की उम्र में भी बाल सफेद हों, तो लोग इसे खान-पान अथवा तेलादि का विकार मानकर शिष्टता धारण करने को ही तैयार नहीं है। उल्टे मेहंदी लगा लेंगे, सैलून में डाई करा लेंगे तथा अन्य कई प्रकार के लोशन लगाकर सफेदी को छिपा लेंगे। ज्यादा समझाओ कि भाई बाल सफेद हो गए, अब तो धैर्य धरो, तो कहेंगे कि बाल सफेद हो गए तो क्या, दिल तो अभी काला है। यह सही है कि जब तक दिल काला रहेगा, बाल सफेद होने का कोई अर्थ नहीं रहेगा। पहले के लोग ही मन से साफ होते थे और बाल सफेद होने के बाद तो और भी पावन-पाक हो जाया करते थे। अब देखिए सफेद बालों की आड़ में काले कारनामे किए जाते हैं। घर में मुखिया के बाल ज्यों ही सफेद होने लगे कि वह संजीदगी ओढ़ कर साधु का आचरण करने लगता था। मोहल्ले के लोग ‘ताऊ’, ‘बाबा’ अथवा ‘बुड्ढा’ मानकर सम्मान दिया करते थे। उसकी बात को तवज्जो दी जाती थी। न्याय करने में ऐसे लोग पहल किया करते थे। उनकी न्यायप्रियता प्रसिद्ध होती थी। अब देखिए सारी बेईमानियां इनकी आड़ में करने का प्रयास किया जाता है। अब सफेद बालों वाले आदमी से ‘ताऊ’ अथवा ‘बाबा’ कहकर देखिए, उससे पहले उसकी पत्नी आप से झगड़ लेगी, तुरंत बाजार जाकर बाल काला करने की दवा ले आएंगी तथा पेंट सिर पर मलना शुरू कर देंगी। वह नहीं चाहती कि उन पर असमय ही बुढ़ापा थोपा जाए। शरीर से बूढ़े हुए लोग मन से जवान रहने के कारण सफेद बालों की विशिष्टता को नकार रहे हैं।

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