बाहर व भीतर का फैलाव

भारत भूषण ‘शून्य’स्वतंत्र लेखक

बाहरी दुनिया की सभी क्रियाएं और घटनाएं हमारे भीतरी संसार का परावर्तन है। सच्चाई यह है कि बाहर और आंतरिक अलग-अलग नहीं। एक ही सिक्के के दो पहलू भर हैं जो कभी विलग हो नहीं सकते हैं। एक रूप के दो कोण या एक कोण की दो रेखाएं। मुश्किल यही है कि हमने संसार के भौतिक रूप को कुछ और जबकि भीतरी स्वरूप को कुछ और मान लेने को सच्चाई समझ रखा है। तथ्य यह है कि हमें जो बाहर दिखाई दे रहा है, वही भीतर का बाहरी फैलाव भी है। जो आंतरिक विचार प्रक्रिया की सूक्ष्मता है, वही बाहर का उद्गार भी है। शरीर के स्तर पर हम भौतिकी अवयव हैं और मानसिक स्तर पर भी विचार प्रक्रिया की भौतिकीय संरचना। इन दोनों को एकसाथ देखने और समझने का ख्याल जिस दिन घटित हो गया, तब बुद्धिमत्ता का सार्थक उदय होना भी तय हो गया समझो। दिक्कत यही है कि हमने तन को तकनीक पर आधारित जान रखा है और मन को किसी और दुनिया का अवतार। मन के धरातल पर तन का सिंहासन खड़ा है तो तन की नींव पर मन का हर आसन। हमारा मस्तिष्क किसी खास दुनिया से अवतरित नहीं हुआ। यह इसी शरीर का एक घटक है जो अपने विचारों से स्वयं को विलग कर कर्ता भाव की सृष्टि कर डालता है। यहीं से दुविधाओं का वह जाल आ पकड़ता है, जिसने हमारी सहज साधारणता को तहस-नहस कर डाला है। जीवन को किन्हीं खास घटकों में बांट और बांध देने से हम इसके सहज बहाव से वंचित हो जाते हैं। इसकी साधारण तरलता को विशेष आग्रहों के बर्तन में उंडेल देने की हमारी उच्छृंखलता को अतार्किक बल मिलना सुनिश्चित हो जाता है। यह स्थिति त्रासद भी होती है और विसंगति से भरी हुई भी। इस तथ्य को इसके खरे रूप जान लेना ही ‘बौद्ध’ होने की संभावना तक ले जाने का सरल ज्ञान-सा है शायद। हम इस ओर झांकने से जितना बचेंगे, उतना जीते जी मरेंगे। यही सच्चाई है। इसको पकड़ना या न छोड़ना हमारी बुद्धि का प्रसार है। हम कर लें तो ठीक, नहीं  तो जी के जंजाल में  È¢¤âð ÚUãð´UÐ

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