बेरोजगारी में स्वरोजगार अच्छा विकल्प

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

भारत में अधिकांश युवाओं में रोजगार का भाव सीधे नौकरी के भाव से जाकर जुड़ता है। हमारी शिक्षा, पढ़ाई करने के पीछे एक ही मनोवैज्ञानिक अवधारणा नौकरी पाने तक सीमित हो गई। हमें अपनी युवा पीढ़ी को इस पुरानी नौकरी वाली मानसिकता से बाहर लाना ही होगा। उन्हें नौकरी के अतिरिक्त भी हजारों, लाखों रोजगार, स्वरोगार के क्षेत्र हैं, के बारे विचार करना चाहिए…

रोजगार शब्द मूलतः रोजी-रोटी से जुड़ा है।  बेरोजगारी की समस्या केवल भारत की समस्या नहीं है। अपितु यह एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। इस समस्या का हम यदि गहराई से अध्ययन करें तो हमें इसके पीछे मूल में बहुत सारे कारण पता चलते हैं। यदि हम सरसरी तौर पर सर्वप्रथम बेरोजगारी के पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों को देखें तो हमें पता चलेगा कि कुछ लोग किसी रुचि, अभिरुचि, पसंद अथवा नापसंद के आधार पर अपने व्यवसाय, रोजगार पेशे का चयन करते हैं कि मैं यह ही क्षेत्र अपनाना चाहता हूं, मेरा मनपसंद अमुक क्षेत्र नहीं मिल जाता,  मैं तब तक प्रतीक्षा करूंगा। इसे हम स्वैच्छिक बेरोजगारी भी कह सकते हैं, ऐसा सिलसिला कई बार मनपसंद का व्यवसाय तलाश करते-करते व्यक्ति को लंबे समय तक बेरोजगार बनाए रखने, उसके भीतर की विविधात्मक क्षमताओं का उचित दोहन न करवाने के कारण कई प्रकार की मानसिक विकृतियों को जन्म देता है और कुंठाएं उत्पन्न होती हैं। भारत में अधिकांश युवाओं में रोजगार का भाव सीधे नौकरी के भाव से जाकर जुड़ता है। वे इसे निजी व्यवसाय से संबद्ध करके देखने की जहमत नहीं उठाते हैं और यदि मैं गलत नहीं हूं, तो इस तरह की मानसिकता के पीछे उनका मुझे अधिक कसूर नहीं लगता।

लार्ड मैकाले की शिक्षा का असर अभी तक हमारा पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहा। उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सस्ते वेतनधारी सफेद कमीजपोश युवकों की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने अंगे्रजी सिखा कर अपने स्वार्थ की पूर्ति कर ली। भले भारत के लिए सफेद कॉलर जॉब्स उपयुक्त नहीं थी। यहां पर 70 प्रतिशत जनता कृषि आधारित उद्योगों, उद्यमों में काम कर अपना जीवनयापन करती थी। उन्हें इसके लिए ब्लू कॉलर जॉब वाली शिक्षा की जरूरत थी, जिससे वे अपना स्वरोजगार अपनाकर अथवा नौकरी भी करनी है तो ब्लू कॉलर वाली मेहनतकशी की नौकरी की ओर मुड़ते, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नीति नियंताओं का शिक्षा के इस रूप की ओर ध्यान ही नहीं गया कि हम भी जापान सरीखी शिक्षा द्वारा अपने बच्चों के भीतर एक नए इनोवेटिव या इन्टरपैन्योर बनने बारे सोच पैदा करवाते। हमारी शिक्षा, पढ़ाई करने के पीछे एक ही मनोवैज्ञानिक अवधारणा नौकरी पाने तक सीमित हो गई। हमें अपनी युवा पीढ़ी को इस पुरानी नौकरी वाली मानसिकता से बाहर लाना ही होगा। उन्हें नौकरी के अतिरिक्त भी हजारों, लाखों रोजगार, स्वरोगार के क्षेत्र हैं, के बारे विचार करना चाहिए। चीन, जापान सरीखे देशों ने अपने सारे उद्योगों को वर्गीकृत करके कुछ छोटी वस्तुओं को कुटीर, घरेलू उद्योगों में परिवर्तित कर दिया है। वहां श्रम की लागत कम मिले, मगर, उत्पादन निरंतर होता है और गुणात्मक है। इसलिए इन देशों की वस्तुओं ने विश्व बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया है। इनसे प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए भारत सरकार को भी चाहिए कि वह अपने गृह कुटीर उद्योगों के सदियों पुराने ढांचे को इन विदेशी वस्तुओं की आमद से ध्वस्त न होने दे। यहीं वे सेक्टर हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। भारी उद्योगों की अपनी भूमिका है, मगर देश में व्यापक खुशहाली गृह कुटीर उद्योगों के ढांचे को ध्वस्त करके तो हरगिज नहीं लाई जा सकती। अतः इन्हें प्रोत्साहित भी करना होगा और मॉनिटर भी अन्यथा मनरेगा की तरह इसमें भी धांधली न शुरू हो जाए। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के एक-एक मामले की ईमानदारी से जांच परख जरूरी है। इसके अतिरिक्त ऐसे बहुत से तात्कालिक कारण हैं, जो बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाले हैं। उनमें मुख्य है सरकार में आने के लिए मतदाता के सामने लोक लुभावने वादे, जिनमें बिजली, पानी, अनाज मुफ्त, कपड़ा वर्दी, किताबें घर, गैस शौचालय मुफ्त। यह फ्री की संस्कृति हमारे देश को बर्बाद करने की एक सोची-समझी साजिश लगती है, जिससे न केवल नेताओं उनके दलों को, अपितु जनता को देशहित में नकार देना चाहिए। हमारा सर्वप्रथम लक्ष्य राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने की ओर होना चाहिए। इसके लिए लोगों को मेहनतकश होना जरूरी है।

निजी व्यवसाय का क्षेत्र इतना विस्तृत है, जिसमें थोड़े से प्रोत्साहन द्वारा और मार्गदर्शन से युवाओं में बजाय नौकरी प्राप्ति की लाइन में लगने के दूसरे चार लोगों को रोजगार देने की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है। निजी व्यवसाय नौसिखिया व्यक्ति नहीं चला सकता। उसके भीतर सब्र, योग्यता, अभिरुचि व्यवसाय विशेष के प्रति तथा शिक्षण प्रशिक्षण, वैज्ञानिक सोच का होना जरूरी है। वरन बिना अनुभव के व्यापार भी दुर्घटना जैसा ही अनुभव देता है।  सामाजिक कारणों में एक रुझान लोगों में देखने को मिल जाता है। बीस हजार की नौकरी करने वाले को लोग अपनी बेटी की शादी करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन यह भी देखा है कि माह में पचास हजार या अधिक निजी व्यवसायी को वे अपनी बेटी देना नहीं चाहते। यह मानसिकता बदली जानी चाहिए। निजी व्यवसायी स्वतंत्र होता है।

वह अपनी रुचि और क्षमतानुसार अपनी आय को बढ़ा सकता है और समाज में प्रतिष्ठा पा सकता है। एक नौकरीपेशा आदमी की अधिकांश यही स्थिति को देखकर समझा जा सकता है कि उसमें और निजी व्यवसाय में क्या अंतर है। ऊपर से नेताओं का ट्रांसफार का दबाव अलग से। इस तरह से हम युवाओं मनोवैज्ञानिक ढंग से नौकरी और व्यवसाय के बीच के तुलनात्मक लाभ और हानियों की व्याख्या कर उनके भीतर स्वरोजगार को अपनाने के लिए कई लोग नैट वर्किंग का धंधा कर अपना करियर बना रहे हैं। प्रश्न केवल यह है कि युवाओं को दसवीं के तत्काल बाद ही अपना लक्ष्य तय कर स्वरोजगार की ओर चलना है अथवा नौकरी की तलाश में सालों इंतजार करना है। फैसला उनके हाथ है।

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