मोदी और निष्क्रिय सांसद

राज्यसभा में आठ महत्त्वपूर्ण बिल लटके हैं। उनमें तीन तलाक वाला बिल भी है। यह स्थिति इसलिए है, क्योंकि अब भी भाजपा-एनडीए उच्च सदन में अल्पमत में हैं। जो क्षेत्रीय दल भाजपा को समर्थन देकर बहुमत का आंकड़ा तय कर सकते हैं, वे हर मुद्दे, हर बिल पर सत्तारूढ़ पक्ष के पाले में नहीं हैं। यदि राज्यसभा में कोई संविधान संशोधन बिल पारित होने के लिए सामने आता है और सदन में सांसदों की हाजिरी भी पूरी न हो, तो उस स्थिति में बिल का गिरना तय है। उसके अलावा, सरकार की जो किरकिरी होगी, वह बेहद अपमानजनक होगी। सत्ता पक्ष की ताकत में भी सेंध लगेगी। लिहाजा आठ बिलों की नियति समझ में आती है। उसी आधार पर प्रधानमंत्री मोदी की चिंता भी समझी जा सकती है। बेशक लोकसभा में एनआईए संशोधन बिल एकतरफा तरीके से पारित हो गया, लेकिन तब भाजपा-एनडीए के 278 सांसद ही सदन में थे, जबकि पूरी संख्या 353 सांसदों की है। इन स्थितियों ने प्रधानमंत्री मोदी को चिंतित और नाराज किया है, लिहाजा उन्होंने सांसदों को ही नहीं, मंत्रियों की भी क्लास ली है। सांसदों और मंत्रियों की संसद के भीतर गैर हाजिरी एक सामान्य प्रवृत्ति है। प्रधानमंत्री इस पक्ष में नहीं हैं। वह ऐसी राजनीतिक और संसदीय संस्कृति को बिलकुल बदल देना चाहते हैं। उनके सामने दो उदाहरण हैं। एक, जब लोकसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तीन तलाक का बिल पेश कर अपनी बात रख रहे थे, तो उस दौरान भाजपा के ही 125 सांसद गैर हाजिर थे। दूसरा उदाहरण बीती 15 जुलाई का है, जब सत्ता पक्ष के सबसे आगे के दो बेंच बिलकुल खाली थे। सामान्यतः ये सीटें मंत्रियों के लिए आरक्षित हैं। उन बेंचों के पीछे कुर्सियों पर भी तीन और दो सांसद ही मौजूद थे। विपक्ष के बेंचों की बात छोड़ दें। मंगलवार को भाजपा संसदीय दल की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री का यह मुद्दा उठाना स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि जो मंत्री रोस्टर ड्यूटी के दौरान सदन में हाजिर नहीं रहते, उनके नाम उसी शाम में उन्हें दिए जाएं। उन्हें सभी को ठीक करना भी आता है। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि मंत्रियों और सांसदों की सदन में मौजूदगी और सक्रियता पर वह और पार्टी लगातार नजर रखे हुए हैं। प्रधानमंत्री का यह संकेत भी महत्त्वपूर्ण है कि मंत्री बने रहने या भविष्य में मंत्री बनने के लिए भी सदन में हाजिरी और सक्रियता ही प्रमुख मानदंड होंगे। प्रधानमंत्री की यह चिंता स्वाभाविक है कि यदि सरकार और संसद सत्र की शुरुआत में ही गैर हाजिरी की आदत पड़ गई, तो वह खुद सांसद और पार्टी के लिए नुकसानदेह होगी। प्रधानमंत्री मोदी ने सांसदों-मंत्रियों को नसीहत दी है कि वे सियासत कम करें और समाज-सेवा ज्यादा करें। वे नए-नए विचार सोचें और उन्हें अमल में लाएं। प्रधानमंत्री ने 2025 तक भारत को टीबी और कुष्ठ रोग मुक्त करने का लक्ष्य भी रखा है। जनता सिर्फ काम ही याद रखती है, लिहाजा लोगों के बीच निरंतर जाएं और उन्हें विकास की योजनाओं का खुलासा करें। दरअसल सांसद और मंत्री बुनियादी तौर पर सरकारी जनसेवक ही हैं। उन्हें सरकारी कोष से वेतन मिलता है और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन भी मिलती रहती है। इसके अलावा, उनके परिवार को जीवन भर चिकित्सा सुविधाएं निःशुल्क मिलती हैं और रेल यात्रा भी मुफ्त होती है। कई और सुविधाएं भी हासिल हैं। उन्हें ‘अतिविशिष्ट’ का अघोषित दर्जा हासिल होता है। यदि वे संसद में अपनी रोस्टर ड्यूटी का भी पालन नहीं कर सकते, तो वे जनसेवक लापरवाह हैं। अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह उनका भी दायित्व तय होना चाहिए। यदि सरकारी दफ्तरों में हाजिरी के लिए बायोमीट्रिक्स की व्यवस्था है, तो उसे संसद में भी लागू क्यों नहीं किया जा सकता? बेशक वे ‘अतिविशिष्ट’ हैं, लेकिन कानून के दायरे में तो हैं? प्रधानमंत्री मोदी ने बेहतर और कड़ी पहल की है, लेकिन उसे लागू किया जाना चाहिए।

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