रंग बदलती क्रांतियां

Jul 11th, 2019 12:03 am

सुरेश सेठ

साहित्यकार

एक हिंदोस्तान उनका है और एक हमारा। उस हिंदोस्तान में भव्य अट्टालिकाएं हैं। बहुमूल्य बहु-मंजिली इमारतें हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं और दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते अरबपतियों की संख्या है। हमारे हिंदोस्तान को सत्ता के प्राचीर पर बैठे मुट्ठीभर लोग बताते हैं कि यह उनकी कृपा से लगभग पौन सदी पहले आजाद हुआ था। आजादी का अर्थ था- कायाकल्प, परिवर्तन और रंग बदलती क्रांतियां। रंग हरा हुआ, तो कहा तेरे खेतों की हरियाली लौटाई, सफेद क्रांति दूध-अंडे की क्रांति थी, जो डेयरी फार्मों से उठी थी। इसके बाद नीली क्रांति का रंग पोखरों से उछला और हमें कहा गया ‘यहां मछलियां पाल-बेच अपना जीवन सफल करो।’ यह रंग है रंगों का क्या? ये भाषणों के पंखों पर तैरते हुए उभरते हैं, फिर मंद पड़ कर मिट जाते हैं। बाकी रह जाते हैं ऊसर होते खेत, धरती के नीचे धंसता जल स्तर और डेयरी फार्मों के उखड़े हुए ढांचे और उखड़े हुए पोखर। अब उनके परेशान हाल क्रांति दूत अपनी क्रांतियों का मातम मनाते हुए निरंतर फंदा ले जीवनलीला समाप्त करते नजर आते हैं। सरकारी आंकड़े इन मौतों की खोज-खबर लेने निकलते हैं, तो कहते हैं ‘अपच से मर गया, नशे से मरा, मुकदमेबाजी में मरा।’ लेकिन कोई नहीं बताता यह अपच अधिक खाने की वजह से नहीं, बल्कि घटिया और सस्ता मुफ्त राशन निगलने की वजह से था। मुकदमे अपना हक पाने के लिए थे, जिनकी सुनवाई बरसों से टल रही थी और नशे का अंधकार उन्होंने तब गले लगाया, जब रोजी-रोटी और छत मिलने का एहसान भी इस पौन सदी में उन्हें न हुआ। ये आदमी ऐसी जिंदगी हजम न कर सका और अपच से मर गया। अब इनकी लापता लाशें अपनी पहचान मांगती हैं। अपने बाकी बचे परिवार के लिए इस कल्याणकारी राष्ट्र से मुआवजा मांगती हैं। वह मुआवजा जो उनके लिए वोट बटोरने के लिए घोषित होता है, लेकिन कभी मिलता नहीं, क्योंकि जिन्होंने इसे बांटना है, वह दूसरे भारत में रहते हैं। आयातित गाडि़यों वाला भारत, डिस्को क्लबों वाला भारत, फैशन शो वाला भारत और उस साहित्य और संस्कृति की गरिमा बखानता भारत, जो कभी उनके पुरखों ने लिखा था या वह संस्कृति जो उनकी वंशावली ने सजाई थी। इस भारत से हमारे भारत तक जिसे ‘आम आदमी का भारत’ कहा जाता है, उन्होंने जुमलों का पुल बना रखा है। यह नेता कभी रिटायर नहीं होते। यहां रिटायर महसूस करता है, तो वह झुर्रियों से भरा चेहरा लिए असमय बूढ़ा हो गया नौजवान, जिसके बरसों रोजगार दफ्तरों के बाहर एडि़यां रगड़ते गुजर गए और उसका बेरोजगारी भत्ता तक राजनीतिक दलों का वह चुनाव एजेंडा बन गया, जिसकी नियति केवल घोषणा एक रही। उसके या सामाजिक सुरक्षा के किसी और लच्छेदार सपने को साकार करने के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष बनाने के नाम पर यहां सरचार्ज लगते हैं, लेकिन वह राजस्व सरकार का खाली खजाना लील जाता है, जिसकी गठरी में इतने चोर लगे रहते हैं कि खाली रहना ही उसका भाग्य बन जाता है। उनका भारत चमकदार भारत है, जहां देश उदय हो गया, आर्थिक विकास दर कुलांचे भरकर दौड़ भागी और जाकर भव्य प्रासादों के प्रांगण में बैठ गई। एक महान नेता ने फरमाया कि देश दस प्रतिशत आर्थिक विकास दर प्राप्त करेगा और स्वतय स्फूर्त हो जाएगा। देखो, अंतरराष्ट्रीय सूचाकांक भी कहते हैं कि यहां व्यापार करने की सुविधा बढ़ गई और विदेश निवेशकों में देश की साख बड़ी है, लेकिन यह साख केवल निवेश करने के मौखिक समझौतों तक सीमित रहती है। कभी धरती पर नहीं उतरती। उधर, आसमान से वादों की परियां नृत्य करती हैं। देश से काले धन और भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नोटबंदी का आर्थिक प्रहार बनती हैं, जो बैंकों के खाते में जमा हो कर काले से सफेद हो गया, वहां क्या उपलब्धियां नहीं। नेता फिर बोले देश डिजिटल युद्ध लड़ेगा, भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए और तब रिकार्ड स्तर पर खेले गए जन-धन खाते खाली होकर बैंकिंग व्यवस्था पर बोझ बन जाते हैं। पिछले विकास अभियान का क्या नतीजा निकला? यह उन लोगों को कोई नहीं बताता, जिनके मनरेगा कार्ड पर जाली मध्यजन अपनी दिहाड़ी उगाह गया। क्या उन्हें अभी भी वह अनुपस्थित मत बने रहना है, जो उनकी जगह कोई चुनावी दलाल वोटिंग मशीन पर अंगुली रख दे गया। हम इन अंगुलियों के पीछे लंबे हाथों और लंबी जुबान की तलाश करते हैं, लेकिन वह नहीं मिलती,  क्योंकि वे किसी नई चुनाव रैली में व्यस्त हैं।

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