विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे…

आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं

स्वीकृर्ति निक्षेपः समपेक्षते न हि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति तद्वद् ब्रह्मविदोपदेशमननध्यान स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः।।

पृथ्वी में गड़े हुए धन को प्राप्त करने के लिए जैसे पहले किसी विश्वसनीय पुरुष के कथन की और फिर पृथ्वी को खोदने, कंकड़-पत्थर को हटाने तथा प्राप्त हुए धन को स्वीकार करने (अपना बनाने)की आवश्यकता होती है कोरी बातों से वह बाहर नहीं निकलता, उसी प्रकार समस्त मायिक प्रपंच से शून्य निर्मल आत्मतत्त्व भी ब्रह्मवित गुरु के उपदेश तथा उसके मनन और निदिध्यासन आदि से प्राप्त होता है। चौथी बातों से नहीं।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबंधविमुक्तये स्वैरेव यत्न : कर्त्तव्यो।

रोगादाविव पंडितैः।।

इसलिए रोग आदि के समान भव बंधन की निवृत्ति के लिए विद्वान को अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर स्वयं ही प्रयत्न करना चाहिए।

यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयांछास्त्रविंमतः।

सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः।। 

तूने आज जो प्रश्न किया है, शास्त्रों के मर्म को जानने वाले विद्वान उसको अत्यंत श्रेष्ठ मानते हैं। वह प्रायः सूत्ररूप है तो भी गंभीर अर्थ को स्वयं में समेटे हुए और मुमुक्षु जनों द्वारा जानने योग्य है उन्हें चाहिए कि वह इस पर मनन चिंतन करें।

शृणुष्वावहितो विद्वंयंमया समुदीर्यते। तदेतच्छुवणात्सद्यो भवबंधाद्विमोक्ष्यसे।।

हे विद्वान जो मैं कहता हूं उसे सावधान होकर सुन, क्योंकि उसको सुनने से तू शीघ्र ही भवबंधन से छूट जाएगा।

मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यंतमनित्यवस्तुषु ।

ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यास : प्रसक्ताखिलर्मिणां भृशम्।।

ततः श्रुतिस्तंमननं सतत्त्व ध्यानं चिरं नित्यनिरंतंर मुनेः। ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वानिहैव निर्वाणसुखं स्मृच्छति।।

मोक्ष का प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओं में अत्यंत वैराग्य होना कहा गया है, उसके बाद शम, दम, तितिक्षा और संपूर्ण आसक्तियुक्त कर्मों का सर्वथा त्याग करना है। फिर मुनि को श्रवण, मनन और चिरकाल तक नित्य निरंतर आत्म तत्त्व का ध्यान करना चाहिए, तभी वह विद्वान परम निर्विकल्पावस्था को प्राप्त होकर निर्वाण सुख को प्राप्त करता है।

यदबोद्धव्यं तवोदानीमात्मानात्मविवेचनम्।

तदुच्यते मया साम्यक श्रुत्वात्मन्यवधरय।।

तो इसके लिए जिस आत्मा और अनात्म वस्तुओं के विवेक के बारे में अब तुझे जानना चाहिए, वह मैं समझाता हूं, तु उसे भलीभांति सुनकर अपने चित्त में स्थिर कर। वेदांत ग्रंथों में तीन शरीरों का वर्णन मिलता है। जीवन की समग्र रूप से व्याख्या करने के लिए, शास्त्र प्रमाण और अनुभव के आधार पर स्थूल से अतिरिक्त सूक्ष्म और कारण इन शरीरों को स्वीकारना ही पड़ता है। आगे इन्हीं का सूक्ष्म विवेचन किया जा रहा है।

मज्जास्थिमेदः पलरक्तचर्म। त्वागाह्वयैर्धातुभिरेभिरविंतम।

पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकै रंगैरुपांगैरुपयुक्तमेतत।। अहं ममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः।

मज्जा, अस्थि, मेद, मांस रक्त, चर्म और त्वचा इन सात धातुओं से बने हुए चरण, जंघा, वक्ष स्थल, भुजा पीठ और मस्तक आदि अंगों और उपांगों से युक्त मैं और मेरा रूप प्रसिद्ध इस मोह के आश्रय रूप देह को विद्वान लोग स्थूल शरीर कहते हैं। 

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