श्री गोरख महापुराण

मछेंद्रनाथ के शब्द सुन हनुमान जी को बड़ा ही गुस्सा आया और ऊंची उड़ान भर एक तरफ को गए और विकट रूप धारण किया, जिससे मछेंद्रनाथ को कोई भेद ही न मालूम हो। उन्होंने मछेंद्रनाथ के ऊपर सात पर्वत फेंके जिन्हें बादलों के समान गरजते हुए जोरों से आते देखा, परंतु मछेंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति द्वारा यह अधर में ही रोक दिए…

इस तेजस्वी बालक को देखकर सरस्वती की आंखों से भी नीर बहने लगे। उसने याचना की दृष्टि से योगीराज की ओर देखा। योगीराज बोले, माता! तुम्हारे भाग्य में विधाता ने पुत्र लिखा ही नहीं है तभी तो मेरा किया धरा आपके लिए व्यर्थ हो गया। परोसी हुई थाली सामने से उठ गई। आपको अपने कर्मों का भोग जो भोगना है। अब आप संतोष करो और ईश्वर समझ मन को समझाओ कि भाग्य में संतान सुख लिखा ही नहीं है। अब आप प्रेम से प्रभु गुण गाओ जिससे कि पिछले पाप धुल जाएं, फिर पुत्र सद्गति का जरिया भी नहीं है। इस प्रकार योगीराज ने सरस्वती को धीरज बंधाया और गोरखनाथ को अपने संग ले जाकर नाथ संप्रदाय में दाखिल कर दिया।जगन्नाथ धाम की यात्रा कर मछेंद्रनाथ रामेश्वरम जा पहुंचे। हनुमान जी स्नान कर वहां बैठने ही वाले थे कि तभी बारिश होने लगी। बारिश होने के कारण हनुमान जी अपने लिए पहाड़ खोदकर स्थान बनाने लगे। यह अद्भुत कार्य देखकर मछेंद्रनाथ को बड़ा आश्चर्य हुआ। मछेंद्रनाथ ने हनुमान जी से कहा, इतने जोर की वर्षा में पहाड़ खोदकर जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, तेरा यह घर कब तक तैयार होगा? जिस तरह मूर्ख लोग आग लगने पर कुंआ खोदा करते हैं उसी तरह इतनी तेज बारिश में तू घर बनाना चाहता है। मछेंद्रनाथ के ऐसे वचन सुनकर हनुमान जी बोले, तू इतना चतुर कब पैदा हुआ और तू है कौन? मछेंद्रनाथ बोले, यती हूं और मेरा नाम मछेंद्रनाथ है। हनुमान जी बोले, यती के मायने क्या है? यह भी जानता है। मछेंद्रनाथ बोले, मेरे प्रताप के कारण ही लोग मुझे यती कहते हैं। मछेंद्रनाथ का उत्तर सुन हनुमान जी बोले, आज तक एक हनुमान ही यती कहलाता था, तू दूसरा यती कब से पैदा हुआ? खैर अब ध्यान से सुन मैं काफी अरसे तक हनुमान के पड़ोस में रहता था, जिससे उनकी कथा का थोड़ा सा चिन्ह बड़े ही प्रयत्नों से मिला है जो मैं तुझे दिखाता हूं। या तो तू उसकी काट कर, नहीं तो यती कहलाना छोड़ देना। हनुमान जी के ऐसे वचन सुनकर मछेंद्रनाथ बोले, आप मुझे कौन सी कला दिखाओगे, दिखाओ। उसका काट नाथ गुरु करेंगे। मछेंद्रनाथ के शब्द सुन हनुमान जी को बड़ा ही गुस्सा आया और ऊंची उड़ान भर एक तरफ को गए और विकट रूप धारण किया, जिससे मछेंद्रनाथ को कोई भेद ही न मालूम हो। उन्होंने मछेंद्रनाथ के ऊपर सात पर्वत फेंके जिन्हें बादलों के समान गरजते हुए जोरों से आते देखा, परंतु मछेंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति द्वारा यह अधर में ही रोक दिए। तब हनुमान जी का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने एक बहुत ही बड़ा पर्वत उखाड़कर योगी के सिर पर फेंका। तब मछेंद्रनाथ ने सागर का जल ले और वायु आकर्षण मंत्र पढ़ हनुमान जी के ऊपर छिड़का, जिससे हनुमान जी वहीं के वहीं अटक गए और उनके उड़ने की शक्ति रुक गई। यह करिश्मा देख हनुमान जी पहले जैसे ही हो गए। फिर मछेंद्रनाथ के निकट आ धन्य-धन्य कह बोले, मछेंद्रनाथ! तुम्हारी विद्या शक्ति को शाबास है। हनुमानजी के पिता वायु देव ने कहा, हनुमान मेरा तेरा जोर इनके सम्मुख न चलेगा। मछेंद्रनाथ की मंत्र शक्ति महान है। तुम्हारी शक्ति तो भगवान राम हैं, पर मछेंद्र ने तो सारे देवी-देवताओं को अपने बस में कर लिया है। अंत में मछेंद्र के चरणों में वायु और हनुमानजी दोनों नतमस्तक हो अपने ऊपर कृपा का हाथ रखने की विनती की। तब दोनों ही अति प्रसन्न हो बोले, हम दोनों पिता पुत्र तुम्हारी सहायता को सदा तत्पर रहेंगे और मैं पूरे यति होने का वरदान देता हूं।

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