संवैधानिक ब्रेकडाउन कबूल नहीं

Jul 20th, 2019 12:04 am

कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला और स्पीकर केआर रमेश कुमार दोनों ही संवैधानिक  हस्तियां हैं। उनके अधिकार और सीमाएं परिभाषित हैं। राज्यपाल ने स्पीकर को संदेश भेजा कि सदन में विश्वास मत पर फैसला आज ही (गुरुवार) होना चाहिए। स्पीकर ने सदन में राज्यपाल का संदेश भी पढ़ा, लेकिन उसके बावजूद विधानसभा की कार्यवाही शुक्रवार 11 बजे तक स्थगित कर दी गई। राज्यपाल के संदेश का जवाब भी भेजा गया कि बहुमत परीक्षण आज नहीं हो सकता। अंततः राज्यपाल को अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश देना पड़ा कि शुक्रवार दोपहर 1.30 बजे तक मुख्यमंत्री सदन में अपना बहुमत साबित करें। जब आप यह आलेख पढ़ रहे होंगे, तब तक बहुत कुछ तय हो चुका होगा कि कर्नाटक की सत्ता किन हाथों में होगी और बागी विधायकों का भविष्य क्या होगा। बेशक सदन के भीतर स्पीकर के अपने विशेषाधिकार हैं, लेकिन राज्य में राज्यपाल ही ‘संवैधानिक प्रमुख’ होते हैं। संविधान में स्पष्ट उल्लेख हैं कि राष्ट्रपति और राज्यपाल ‘प्रथम पुरुष’ हैं और सरकारें उनके नाम, आधार पर ही चलती हैं। कर्नाटक विधानसभा में विश्वास मत पर जो भी फैसला हो, लेकिन संवैधानिक टकराव और अवज्ञा के इस उदाहरण का विश्लेषण किया जाना अनिवार्य है। इन स्थितियों में राज्यपाल के सामने कुछ विकल्प हो सकते हैं। वह राष्ट्रपति और केंद्र सरकार को रपट भेज सकते हैं। वह अनुच्छेद 356 के तहत कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं। राज्यपाल राज्य सरकार को बर्खास्त भी कर सकता है। बेशक संवैधानिक पद पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल या राज्य के संदर्भ में स्पीकर कोई भी आसीन हो, लेकिन ‘संवैधानिक ब्रेकडाउन’ स्वीकार्य नहीं है। हम एक लोकतंत्र में रहते हैं, लिहाजा जनता को नजरअंदाज नहीं कर सकते। प्रशासन ठप नहीं होना चाहिए। कर्नाटक में क्षुद्र राजनीति के अलावा कुछ भी नहीं हो रहा है। कर्नाटक में सब कुछ ध्वस्त है। राज्यपाल ने अपने पत्र में 20 विक्षुब्ध विधायकों का जिक्र किया है। परोक्ष रूप से उनका मानना है कि मुख्यमंत्री के पक्ष में बहुमत नहीं है, लिहाजा विश्वास मत परीक्षण यथाशीघ्र होना चाहिए। नैतिक आधार पर कर्नाटक में यह सरकार होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि उसे स्वाभाविक और लोकतांत्रिक जनादेश नहीं मिला था। जद-एस के 35-37 विधायकों के आधार पर सरकार नहीं बनाई जा सकती। बहरहाल गठबंधन के इस दौर में कांग्रेस-जद (एस) का नापाक जुगाड़ जरूर हो सकता है, लेकिन बुनियादी दलील यह है कि कोई भी शख्स संवैधानिक आड़ में एकाधिकारवादी, वर्चस्ववादी नहीं हो सकता। प्रत्येक संवैधानिक पद को संविधान की व्याख्या के मुताबिक निर्णय लेने होते हैं। यह संवैधानिक बाध्यता भी है। इस संदर्भ में स्पीकर भी निरंकुश नहीं हो सकते। सवाल है कि स्पीकर से कौन पूछेगा कि विधायकों के इस्तीफों का प्रकरण उन्होंने इतना लंबा क्यों खींचा है? दरअसल यह पूरी लड़ाई राजनीतिक है, लिहाजा विचारधारा के बजाय सियासत से ही निपटेगी। विधायकों ने बगावत की है, तो किसी वैचारिक मुद्दे पर नहीं, बल्कि मंत्री पद हासिल करने के लिए की है। प्रहार वहीं किया जाना चाहिए। यदि विधायकों को ‘अयोग्य’ करार दिया गया, तो फिर वे नई सरकार में मंत्री नहीं बन पाएंगे। संविधान की 10वीं अनुसूची में उल्लेख है कि जो प्रतिनिधि किसी पार्टी विशेष के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतता है, तो उस विधायक को पार्टी से धोखा नहीं करना चाहिए। दरअसल यह मतदाताओं और जनादेश से भी धोखा होगा। चूंकि ‘एक देश, एक चुनाव’ की चर्चा चल रही है, तो ऐसा कानून भी बनना चाहिए कि एक निश्चित अवधि तक पार्टी से दलबदल करना संवैधानिक अपराध होगा। ऐसे जन-प्रतिनिधि को कमाबेश छह साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया जाए। इन दिनों दलबदल लगातार हो रहा है और ज्यादातर प्रतिनिधि भाजपा में शामिल हो रहे हैं। क्या यह धनबल और बाहुबल के कारण ही है? बेशक सत्ता का आकर्षण और मोह किसी को भी अपनी ओर खींच सकता है, लेकिन अब राजनीतिक लालच ज्यादा दिख रहा है। वैचारिक राजनीति समाप्तप्रायः है। प्रतिनिधियों को पैसा और ताकत चाहिए, लिहाजा दलबदल भी जारी है। इसके मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी को सबसे पहले सोचना चाहिए, क्योंकि वह ही शुचिता के प्रथम सूत्रधार हैं।

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