हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश

By: Jul 7th, 2019 12:05 am

किस्त – एक

हिमाचल का नैसर्गिक सौंदर्य बरबस ही हरेक को अपनी ओर आकर्षित करता है। साथ ही यह सृजन, विशेषकर साहित्य रचना को अवलंबन उपलब्ध कराता रहा है। यही कारण है कि इस नैसर्गिक सौंदर्य की छांव में प्रचुर साहित्य का सृजन वर्षों से हो रहा है। लेखकों का बाहर से यहां आकर साहित्य सृजन करना वर्षों की लंबी कहानी है। हिमाचल की धरती को साहित्य सृजन के लिए उर्वर भूमि माना जाता रहा है। ‘हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश’ कितनी है, इस विषय पर हमने विभिन्न साहित्यकारों के विचारों को जानने की कोशिश की। पेश है इस विषय पर विचारों की पहली कड़ी…

उत्कृष्ट साहित्य सृजन में राजसी बाधाएं

डा. विनोद प्रकाश गुप्ता

हिमाचली जीवन में साहित्यिक गुंजाइश जैसे विषय पर विमर्श हिमाचल के परिवेश में सामूहिक साहित्यिक उपलब्धियों की विवेचना की परिणति से ही संभव है। कविता, गजल, कथा, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, एकांकी और अनेकानेक लेखन विधाओं के समुचित आकलन के दृष्टिगत आज हिमाचली साहित्य किस मुकाम पर है, इसे जानना ही साहित्यिक गुंजाइश से रूबरू होना होगा। मैं कोई स्थापित साहित्यकार नहीं, पर गत वर्ष साहित्य की नाव में सवार होने की निष्पक्ष उत्कंठा ने मुझे अपनी संस्था नवल प्रयास के माध्यम से साहित्य आयोजनों की ओर प्रेरित किया। ये आयोजन राज्य के स्तर पर और गांव के स्तर पर भी आयोजित किए गए जिसमें दूसरी संस्थाओं (हरनोट जी के हिमाचल मंच) ने भी साथ दिया। इन आयोजनों के द्वारा एक बात निश्चित रूप से सामने आई कि जिला, तहसील एवं गांव के स्तर पर अनवरत लेखन हो रहा है, काफी स्तरीय लेखन भी हो रहा है और लेखन की सभी विधाओं में अपार संभावनाएं उपलब्ध हैं। जरूरत है इन लेखकों को सामाजिक, साहित्यिक सरोकारों से जोड़ने की जो ओछी राजनीति से प्रेरित न हो। दूसरी ओर इस बात का आकलन भी महत्त्वपूर्ण है कि हमारे साहित्यकार एवं कवि प्रदेश व देश के साहित्यिक सोपान में कहां और कितनी पैठ रखते हैं। जहां तक बात फेसबुक पर प्रचार-प्रसार की है, सब साहित्यकार और उनके कोर ग्रुप के साथी अपने ढिंढोरे स्वयं पीटने में लगे हैं। पर वास्तविक साहित्यिक पहचान राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कितने कवि, कथाकार बना पाए, ये सोचने का विषय है। फेसबुक एवं उनकी वास्तविक उपलब्धियों, साहित्यिक पहचान में बहुत अंतर है। बहुत कम कवि, कथाकार राष्ट्रीय स्तर के लेखकों में अपना स्थान सुनिश्चित कर पाए हैं। प्रथम श्रेणी के कवियों, कथाकारों में गिने-चुने हिमाचली लेखकों का जिक्र होता है, वह भी उस पायदान पर नहीं जिस पर होना अपेक्षित है। इसका मुख्य कारण है साहित्यकारों की जबरदस्त गुटबाजी, एक-दूसरे के लेखन पर भद्दे आक्षेप, दूसरों के लेखन को सिरे से खारिज कर देना, जिससे पुराने तो क्या, नए उभरते लेखकों को भी अवसर नहीं मिलते। हिमाचल में साहित्यिक गतिविधियां भाषा विभाग एवं कला भाषा अकादमी के सशक्त पंजे में फंसी हुई हैं। भाषा विभाग की निदेशक, सचिव या प्रधान सचिव का किसी भी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना निश्चित है, चाहे उसका साहित्य से दूर-दूर तक का रिश्ता न हो। जिला स्तर पर जिलाधीश सब मर्ज की दवा हैं ही। अब तो अकादमी भी वर्ग विशेष के राजनीतिक आकाओं की सेवा में लगी है। इसके साथ ही निजी संस्थाओं द्वारा साहित्यिक कार्यक्रमों का अकाल पड़ा हुआ है और जहां कोई संस्था आयोजन करना चाहे, उसकी राह में ऐसे रोडे़ अटकाए जाते हैं कि संस्था साहित्यिक आयोजन करने से ही तौबा कर ले। छोटे प्रदेश में राजनीति का स्तर भी बहुत ही छोटा होता है, मुंह लगे लेखक बात-बात में मुख्यमंत्री तक का हस्तक्षेप करवा डालते हैं। इसलिए साहित्य का संचार, प्रसार व प्रचार तथा उत्कृष्ट साहित्य सृजित हो ही नहीं पाता है। मेरी संस्था ने शिमला, दिल्ली, मुंबई एवं कोलकाता में कई साहित्यिक आयोजन किए हैं और मैं दावे से कह सकता हूं कि हिमाचल में साहित्य के क्षेत्र में और प्रदेशों के मुकाबले बहुत कम प्रयास हो रहे हैं। उचित प्रयास अगर किए जाएं तो साहित्यिक जीवन में अनेकानेक गुंजाइशें हैं। बस जरूरत है साहित्यिक सरोकारों को जनजीवन से जोड़ने और सच्ची निष्ठा से साहित्य सेवा के उचित माध्यमों के तलाश की।

साहित्य की अपार संभावनाएं रखता है प्रदेश

रूपेश्वरी शर्मा

हिमाचल प्रदेश स्वतंत्रता से पूर्व भी साहित्यिक क्षेत्र में अछूता नहीं था। अनेक मनीषियों ने विविध साहित्य रचा, चाहे उसकी आवश्यकता आजादी के लिए थी अथवा आम जन-जीवन के लिए। भले ही हमारी भौगोलिक परिस्थितियां विकट रही हों, परंतु ऐसा नहीं था कि यहां कवियों, लेखकों, संगीतकारों का अभाव रहा हो। सभी क्षेत्रों में नाम कमाने वाले लोग यहां अपनी विशेष पहचान बना गए हैं जिनमें चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी तो आधुनिक कहानी के जन्मदाता माने जाते हैं। यशपाल जी की रचनाओं की भी साहित्य जगत में अपनी धमक है। इधर आज का हिमाचल एक विकसित प्रदेश है जहां अनेक सुविधाएं हैं। जब व्यक्ति जीवन-यापन की अनेक दुर्गम परिस्थितियों से उबरता है और उसके समक्ष जीवन की चुनौतियां कम होती हैं अथवा सुगम होती हैं तो ललित कलाएं, साहित्य उसे अपनी ओर आकर्षित करता है। ऐसे में वह अपनी ज्ञान-पिपासा शांति के लिए साहित्य की ओर आकर्षित होता है। संचार साधन, मीडिया, बाहरी लोगों का यहां आवागमन, ये सभी साहित्यिक आदान-प्रदान में सहायक सिद्ध हुए हैं। प्रदेश में साहित्यिकारों की कोई कमी नहीं है जो कि ईमानदारी से साहित्य रचने में लगे हैं। आज के समय में हालांकि बच्चों का किताबों के प्रति आकर्षण घटा है, पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे ज्ञान अर्जन नहीं कर रहे हैं। इंटरनेट के विविध साधनों द्वारा वे ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। इसके लिए साहित्य सृजन तो निरंतर होता ही रहना चाहिए जो कि हो रहा है और पाठकों तक अनेक साधनों द्वारा पहुंच रहा है। हां, इतना अवश्य है कि इसके लिए हमें युवा पीढ़ी को साहित्यिक अभिरुचि बढ़ाने के लिए सभी प्रकार की गतिविधियों से जोड़ना पड़ेगा। हिमाचल प्रदेश के कठिन भौगोलिक वातावरण में साहित्य के विकास की अपार संभावनाएं दृष्टिगोचर होती हैं। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई हो या देश भक्ति की लहर, पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और यशपाल जैसी विभूतियों ने जो लिखा, वह आज भी प्रासंगिक है। प्रदेश से बाहर के राज्यों से लेखक व कवि यहां डेरा डालकर इन अनुपम वादियों में अपनी अनुभूतियों, अनुभवों व अपनी सोच को परिष्कृत करने के लिए आते रहे हैं। राहुल सांस्कृतायन, अज्ञेय, नागार्जुन, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा आदि लेखकों ने अपनी लेखनी में रंग भरने के लिए इस देवभूमि के आशीर्वाद से अपनी सोच को चार चांद लगाए हैं। यह देवभूमि आदिकाल से ही ऋषि-मुनियों की तपस्थली अथवा रचना-स्थली रही है जहां अनेक ग्रंथों की रचनाएं की गईं। आज भी यहां साहित्य सृजन के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध है। हिमाचल के जीवन में साहित्य की अपार संभावनाएं लक्षित होती हैं। इसके लिए कतिपय प्रेरणादायक प्रयासों की आवश्यकता है, जिसमें चिंतक और मीडिया कर्मी योगदान कर सकते हैं।

हिमाचली जीवन में बेहतरीन साहित्यिक गुंजाइश

अशोक दर्द

साहित्य जीवन से इतर नहीं हो सकता। जीवन की सौंधी खुशबू को साहित्य ही सहेजता है और पीढि़यों को हस्तांतरित करता है। इसलिए बिना साहित्य के सरस जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। साहित्यकार एक संवेदनशील सूक्ष्म अन्वेषी होता है। समाज में घटित-विघटित सभी संगतियों-विसंगतियों पर गहन अन्वेषण करता हुआ अपनी पैनी दृष्टि से चिंतन-मनन करता हुआ देखता-परखता है और फिर जो उसे जीवन के लिए अनुकूल एवं उपयोगी लगता है, उसे अपनी लेखनी से शब्दों में बांधकर भावी पीढि़यों को सौंप देता है। उसकी मेधा से मथकर निकला हुआ उजाला भावी पीढि़यों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है। उनका पथ आलोकित करता है। हरेक क्षेत्र के रचनाकार का अपना भूगोल होता है। उसकी रचनात्मकता पर उसके परिवेश का गहरा प्रभाव होता है। हिमाचली परिप्रेक्ष्य में भी ये सब देखा जा सकता है। हिमाचल की रचनात्मकता में हिमाचली जीवन के सरोकार सदैव दृष्टिगोचर होते हैं। इस पर्वतीय अंचल में फलता-फूलता साहित्य इस गुंजाइश को तसदीक करता है। लोककथाएं, लोकगाथाएं, लोकगीत, कविताएं, कहानियां हों या कोई अन्य साहित्यिक विधा, सदैव जीवन के सरोकारों को प्रतिबिंबित करती हैं। यह साहित्य ही है जो हमारे संस्कारों एवं संस्कृति को परिमार्जित करते हुए जीवंतता प्रदान कर रहा है। समाज की चेतना बदलने अथवा रूढि़यों से लड़ने, अपसंस्कृति से जूझने का माद्दा साहित्य में बखूबी है। साहित्य लोकमानस की भीतरी परतों में घुसकर उसे आंदोलित भी करता है और प्रभावित भी। राष्ट्रीय संदर्भ हों या हिमाचली, एक साहित्यकार के भीतर सत्ता में व्याप्त त्रुटियों व विसंगतियों के विरुद्ध खड़ा होने का साहस होना चाहिए, क्योंकि साहित्य ही सत्ता को व्यवस्था में सुधार के लिए प्रेरित कर सकता है। हरेक युग में बेहतर से बेहतरीन की संभावना अवश्य रहती है। हिमाचली जीवन में भी इस बेहतरीन साहित्यिक गुंजाइश की संभावना सदैव रहेगी। इस दिशा में अभी और कलम की धार को तेज करने की तथा साहित्य में और समाज सापेक्षता की गुंजाइश रहेगी। सुखद क्षेत्र से बाहर आकर रचा साहित्य जब जीवन के गीत गुनगुनाएगा, तब निःसंदेह साहित्य रचनाकर्म का उद्देश्य स्वतः पूरा हो जाएगा।

हिमाचल के साहित्य आकाश में बड़ी उड़ान   

अनंत आलोक

कालीदास के महाकाव्य कुमारसंभव का आरंभ ही हिमालय से होता है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘किन्नर देश’ में हिमाचल के वर्तमान किन्नौर ही नहीं, अपितु उस समय के लगभग पूरे हिमाचल की अपनी यात्रा के संस्मरण संकलित किए हैं। उन्होंने हिमाचल के हर जिला, हर तहसील का भ्रमण किया था। प्रसिद्ध लेखक और जर्नलिस्ट खुशवंत सिंह का अधिकतर लेखन हिमाचल में हुआ। इतना ही नहीं, हिमाचल ने हिंदी साहित्य को ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी के कथाकार पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी, क्रांतिकारी लेखक यशपाल, कहानीकार निर्मल वर्मा, यहां तक कि अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड का जन्म भी हिमाचल के कसौली में हुआ था। हिमाचल की माटी, यहां की नदियां, झीलें, तालाब और निर्मल अविरल झर-झर झरते झरने न केवल देश के विभिन्न भागों के लेखकों व कवियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, बल्कि यहां पर जन्मे सीधे-सादे भोले-भाले गबरुओं को स्वतः ही लेखक-कवि बना देते हैं। वर्तमान में हिमाचल के अनेकों लेखकों, कहानीकारों, कवियों ने देश में खास मुकाम हासिल किया है। आज भी देश-विदेश के लेखकों, कवियों की पसंदीदा सैरगाह हिमाचल ही है। मुझे लुधियाना के प्रसिद्ध गजलगो जिनकी शमूलियत लगातार देश से बाहर होने वाले मुशायरों में भी रहती है, याद आ रहे हैं जो साल में दो दफा हिमाचल सिर्फ  और सिर्फ  लेखन के लिए छुट्टी लेकर आते हैं और कई दिनों तक यहां रह कर लेखन करते हैं। उनकी पसंदीदा जगह सिरमौर का रेणुका जी और चंबा का डल्हौजी है जहां झील के किनारे बैठ कर वे खूब गजलें लिखते हैं। एक दफा मुझे भी उनकी गजलें सुनने का मौका हासिल हुआ। इसके अतिरिक्त हिमाचल में साल भर कोई न कोई साहित्यिक आयोजन यहां की सरकारी और निजी संस्थाओं के अतिरिक्त हिमाचल से बाहर के लेखकों, संस्थाओं द्वारा भी आयोजित किए जाते हैं जिनमें प्रमुख रूप से ‘व्यंग्य यात्रा’ का आयोजन प्रतिवर्ष अलग-अलग स्थानों पर हो रहा है। आज हिमाचल में साहित्य की संभावनाएं और अधिक विस्तार पा रही हैं। खुशी की बात है कि यहां का युवा वर्ग निरंतर सृजन पथ की ओर उन्मुख है। मेरे अवलोकन का आधार फेसबुक या इंटरनेट नहीं अपितु समाचार पत्रों के साहित्यिक परिशिष्ट, देश-प्रदेश की पत्र-पत्रिकाएं एवं प्रकाशित पुस्तकें हैं्र। पिछले कुछ सालों से जो निरंतर सृजन पथ पर अविरल अग्रसर हैं, उनमें कविता के क्षेत्र में पवन चौहान, मनोज चौहान, राजीव त्रिगर्ती, माम राज शर्मा, दिलीप वासिष्ठ, डा. जय चंद, डा. प्रियंका वैद्य, शैली किरण के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी कहानी में युवाओं में फिर से पवन चौहान को शामिल करते हुए मनोज कुमार और संदीप शर्मा का नाम लिया जा सकता है। बाल साहित्य में युवाओं की बात करें तो पवन चौहान के अतिरिक्त कोई निरंतरता नजर नहीं आती, हालांकि डा. अदिति गुलेरी ने बाल साहित्य में रिसर्च की है जो बेहद खुशी की बात है और उनके आलेख बाल साहित्य पर निरंतर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि हिमाचली जीवन के साहित्याकाश में इन सब के अतिरिक्त और भी बहुत से रचनाकर उड़ान पर हैं जो निश्चय ही ऊंचे और ऊंचे जाएंगे।

प्रदेश की विविधता साहित्य के लिए धरातल

शरत शर्मा

हिमाचल प्रदेश के पूर्ण राज्य की विधिवत घोषणा 25 जनवरी 1971 को होने के उपरांत हिमाचल में बारह जिलों के आने से हिमाचल का जनजीवन विविधता पूर्ण होने के साथ-साथ विविध जन जातियों, विविध बोलियों, विविध संस्कृतियों, विविध लोकाचार, विविध लोकगीतों, विविध लोक संवाद बोली आदि के साथ राजभाषा एवं अंतरराष्ट्रीय भाषा सहित अपने स्वरूप का आकार लेते हुए दिनों-दिन समृद्ध तथा संपन्न होते हुए आज हमारे समक्ष बहुआयामी आकार लेकर खड़ा है। हिमाचल प्रदेश के अस्तित्व में आने से पूर्व इसके बहुत से भू-भाग को हिमालय के नाम से जाना जाता था। हिमाचल प्रदेश में जीवनयापन कर रहे लोगों के पास जीवन को जीने और उसे आगे बढ़ाने की अद्भुत शैली है। यहां के लोगों का जीवन संगठित व स्वचालित है। यह कैसे संभव हुआ, इसके ऊपर गौर करने की आवश्यकता है। कोई भी समाज तभी ऐसा हो सकता है जब उसके पास साहित्य की वाचिक और लिखित समृद्ध परंपरा विद्यमान होती है। हिमाचल प्रदेश के जनपद के पास यह परंपरा सदियों से रही है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी और यशपाल को हिमाचली मानते हुए यह कह सकते हैं कि हिमाचल प्रदेश का हिंदी साहित्य का प्रस्थान बिंदु है। उनके साहित्य लेखन से हिमाचल का हिंदी साहित्य समृद्ध और संपन्न होते हुए आगे बढ़ रहा है। जिस शीर्षक के अंतर्गत यह विवेचन किया जा रहा है, उसके आयाम बहुमुखी हैं। जितनी परतें खोलने में समर्थ होंगे, उतनी ही दृष्टियों से परिचय होता जाएगा। सबसे प्रमुख बात यह है कि जो साहित्य लेखन हिमाचल में किया जा रहा है, उसमें हिमाचली जीवन के सरोकार प्रतिबिंबित होते हैं या नहीं। इसके एवज में यह प्रामाणिक है कि यहां रचे जा रहे साहित्य में हिमाचल का जीवन सरोकार प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। अगली बात यह है कि हिमाचली जीवन से संबंधित साहित्य की परख साहित्य के प्रतिमानों के साथ होनी चाहिए या नहीं। यह बड़े गर्व के साथ कहा जा सकता है कि हिमाचल में प्रतिभाशाली हिमाचली लेखकों द्वारा किए जा रहे लेखन का भारत के भिन्न-भिन्न भागों में नोटिस लिया जा रहा है और उनके द्वारा रचे जा रहे साहित्य की स्थापना की जा रही है। आखिर में यह कह सकते हैं कि भारतवर्ष में इतना साहित्य लिखा अथवा रचा जा रहा है तो हिमाचल प्रदेश में हिमाचल के लेखकों द्वारा लिखे जा रहे साहित्य की गुंजाइश-संभावना बची है या नहीं, हिमाचल प्रदेश में घटित हो रहे जीवन के विभिन्न धरातलों को प्रतिबिंबित करने के लिए हिमाचल के लेखकों को खूब बखूबी लिखते हुए न केवल बढ़ना है, बल्कि  हिंदी साहित्य को समृद्ध करते हुए बहुआयामी भी बनाना है।

साहित्य में जीवित रहेंगे मौलू राम

राजेंद्र पालमपुरी, स्वतंत्र लेखक

कुल्लू जनपद के इस परिवार में जिंदा नहीं रहती थी संतानें, इसलिए कहलूर (बिलासपुर) से जिला कुल्लू की लग घाटी के दूरस्थ गांव शांघड़ में स्थापित हुए वंशज ऊहापोह और निराशा में रहते थे। देवता के गूर से अपनी विवशता के चलते यह पूछे जाने पर कि वंश में पैदा होने वाली संतानों को वक्त-बेवक्त और बेवजह अकाल मौत का ग्रास बनने से कैसे रोका जाए तो जवाब सुनने के बाद पारिवारिक सदस्यों ने वैसा ही किया जैसा उन्हें बताया गया था। 19 नवंबर सन् 1927 को श्री बुध राम ठाकुर के घर जन्मे सुपुत्र को किसी दूसरे की गोद में दिए जाने के बाद, इनके अभिभावकों द्वारा सिर्फ  एक रुपया मोल देकर खरीदे जाने के बाद ही नाम पड़ा मूलू राम ठाकुर यानि मोल देकर खरीदा गया बच्चा। अंग्रेजी के अध्यापक डा. मंधोक ने नाम को अंग्रेजी भाषा के साथ जोड़ते हुए मौलू राम कर दिया और इस प्रकार मूलू राम से नाम हो गया मौलू राम ठाकुर। है न साहित्यिक पुरोधा जनाब मौलू राम ठाकुर के नाम की रोचक, साहित्यिक और आस्थावान यात्रा? सन् 1948 में पंजाब यूनिवर्सिटी से दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करना भी कोई आसान न रहा मौलू राम के लिए। अपने पिता जी बुध राम ठाकुर की देखरेख में अपने घर शांघड़ से प्रतिदिन 6 किलोमीटर पैदल चलकर अपनी पाठशाला भुट्ठी पहुंचना होता था मौलू राम ठाकुर को। रास्ता खतरनाक और मौत को दावत देता था। कुलांथ पीठ के एक पिछड़े गांव के मौलू राम ने अपनी साहित्यिक यात्रा का श्रेय अपने गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल ढालपुर, जिला कुल्लू को दिया। उन्होंने बीते सालों में हिमाल नचिकेत दास द्वारा बनाई गई एक डाक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म ‘जीरो से हंड्रड’ तक में दिए गए साक्षात्कार में कहा है कि ‘रावलपिंडी से ट्रांसफर होकर आए प्रोफेसर अर्जुन सिंह जो कि खुद साहित्यिक व्यक्तित्व के मालिक थे, की बदौलत ही वे साहित्यकार बने। वक्त के साथ मौलू राम ठाकुर के चार लेख जिनमें 1. फागुण की बरसात, 2. विजय दशमी (कुल्लू दशहरा पर आधारित), 3. रानी झांसी पर आधारित और उस वक्त क्योंकि भारत पाकिस्तान बंटवारा हो रहा था तो उस पर लिखा लेख कि 4. कश्मीर पाकिस्तान को दिया जाना चाहिए या नहीं, बेहद मकबूल हुआ। राजनीतिक विज्ञान में एमए, ऑनर्ज हिंदी, चीनी और तिब्बती भाषा में डिप्लोमा (स्वर्ण पदक विजेता) किए हुए मौलू राम जी आर्ट कल्चर एंड भाषा अकादमी हिमाचल प्रदेश व स्टेट संग्रहालय शिमला के सचिव और क्यूरेटर जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर भी रहे। राज्य भाषा संस्थान में वरिष्ठ प्रवक्ता, जिला भाषा अधिकारी और हिमाचल प्रदेश सरकार में भाषा कला एवं संस्कृति विभाग के उपनिदेशक, हिप्र लोक प्रशासन संस्थान के फैकल्टी सदस्य, प्रदेश विश्वविद्यालय के युवा उत्सवों के निर्णायक, अखिल भारतीय हिंदी राज्यों के राजसभा समिति के सदस्य, राज्य स्तरीय नृत्य एवं नाट्य प्रतियोगिताओं के निर्णायक जैसी भूमिकाओं के भी विशिष्ट अंग रहे जनाब मौलू राम ठाकुर। केवल लेखकीय ही नहीं बल्कि संपादन क्षेत्र में भी इनका कोई सानी नहीं माना जा सकता। किंतु खेद है कि मौलू राम ठाकुर अपने जीवन की 91 सीढि़यां चढ़कर 29 जून को स्वर्ग सिधार गए। उन्हें मैं नमन करता हूं, वे साहित्य में हमेशा जिंदा रहेंगे।

‘आर्टिकल-15’ एक सामयिक फिल्म

एसआर हरनोट, साहित्यकार

यह फिल्म उस समय आई है जब जातिगत असमानताएं और शोषण की घटनाएं पहले से ज्यादा बढ़ी हैं। विचारणीय प्रश्न है कि हम 5-जी में पहुंच रहे हैं, पहले से कहीं ज्यादा पढ़ा-लिखा समाज है, लेकिन अफसोस होता है हमारी सवर्ण सोच वहीं खड़ी है जहां वह बरसों पूर्व खड़ी थी। कितनी विडंबना है कि इन्हीं वंचितों के कारण आप संपन्न हैं, देव कार्यों से लेकर सभी जीने के साधन इन्हीं की बदौलत आपके पास पहुंचते और उपलब्ध होते हैं। सोचिए जो जनेउ जैसा धागा आपको सर्वोच्च बनाता है, जिस घर में आप रहते हैं, जिन मंदिरों में आपके देवता वास करते हैं, जिन जूतों के बिना आप एक कदम भी नहीं चल सकते, उन्हें ये वंचित लोग ही बनाते रहे हैं। उनमें उन्हीं के अछूत हाथ लगे होते हैं। यहां तक कि जिस देवता की प्रतिमा को वे देखभर नहीं सकते, उसके निर्माण में भी वे ही वंचित हाथ लगे होते हैं, लेकिन आपने अपनी सवर्ण सोच की तरह इसके लिए भी तरह-तरह के हास्यास्पद तरीके ईजाद किए हैं…हवन करो, गंगाजल और गोमूत्र लाकर छिड़क दो, बतौर सजा बकरा देवता को चढ़ा दो और देवता से लेकर आपके साथ सब-कुछ पवित्र….फिर आप इस तरह, इन पाखंडों के बलबूते अपने समाज में सर्वोच्च, शिरोमणि। अपने ही समाज को तोड़ने का बढि़या तरीका है आपके पास….यदि ऐसा है तो इन वंचितों, दलितों को आप सताते, परेशान क्यों करते हो, बड़ा दिल रखो, गोमूत्र, गंगाजल और हवन से जब पत्थर का देवता पवित्र हो जाता है तो आप इन लोगों पर भी छिड़क दो, सदा-सदा का झंझट समाप्त, सभी पवित्र और देश में सभी बराबर। पर आप ऐसा नहीं करेंगे…ये बोफोर्स और राफेल की तरह के धर्म और संस्कृति की ‘पाण’ दिए हथियार जो आपके पास है…सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इस पर सत्ता जैसी सबसे खतरनाक ‘पावर जात’। ये ‘पावर जात’ आज के समय का बहुत बड़ा सच है जो हर जगह मौजूद हो गई है…सड़क से संसद तक, यहां तक कि पत्रकारिता और साहित्य भी इससे अछूते नहीं। आर्टिकल-15 आज के समाज का कड़वा सच है। इसलिए जो विरोध कर रहे हैं, फतवे दे रहे हैं, वे क्या कभी अपने होने या अपनी सोच या करतूतों पर भी शर्मिंदा हुए होंगे…इस तरह आप न केवल संविधान के विरुद्ध फतवा दे रहे हैं, बल्कि यही सब देशद्रोह भी है। पर आप फिर गंगाजली सोच को लेकर किसी भी सड़क या थिएटर के बाहर चीख सकते हैं क्योंकि आप को विश्वास है वह ‘पावर जात’ हर जगह आपके ऊपर आशीर्वाद बनाए हुए है। लेकिन वह समय कब आएगा जब देश के अपने वंचित बिना दहशत के न केवल जी सकेंगे, बल्कि सीधे अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध सीधे सवाल भी पूछ सकेंगे। क्या वह समय कभी आएगा जब आपकी सोच हर पापी और अन्यायी को दहशत में रखेगी कि जो देश अहित में काम करेगा वह ‘ठोक दिया जाएगा’। इसके लिए देशहित की परिभाषा वह नहीं होनी चाहिए जो बल्ला, लाठी और जूता लेकर चार लोग बता दे रहे होते हैं और पल भर में वे सत्ता के हीरो घोषित कर दिए जाते हैं। शीर्ष से जब तक प्रतिबद्धता और ईमानदारी से इन सवर्ण और असंवैधानिक सोच के लोगों को कड़ा संदेश नहीं जाएगा, कोई भी सलोगन सार्थक नहीं हो पाएगा। इसमें पुलिस अफसर का किरदार निभाने वाले आयुष्मान खुराना की तरह हर महकमे और हर जगह सच्चे और ईमानदार अफसर भरे पड़े हैं, पर जब तक ‘पावर जात’ उन्हें अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करती रहेगी, वे कुछ नहीं कर पाएंगे।

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