आत्म पुराण

इसलिए वेद वेत्ता विद्वानों ने वैराग्य को ही संन्यास ग्रहण करने का समय बतलाया है। इस प्रकार की वैराग्य भावना गर्भ काल में कष्टों का विचार करने से, मरणकाल का ज्ञान हो जाने से अथवा योगाभ्यास से उत्पन्न हो सकती है। अथवा उपनिषदों में जो अनेक प्रकार की साधनाएं बतलाई हैं वे भी वैराग्य की उत्पत्ति का कारण हो सकती है। शंका – हे भगवन! उपनिषदों में बतलाई गई उन उपासनाओं से मुक्ति ही प्राप्त क्यों नहीं  हो जाती?

समाधान – हे शिष्य! वे उपासनाएं विपरीत ज्ञान के अभ्यास रूप में होती है, इसलिए उनके द्वारा साक्षात मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसे उपासना के समय उस अद्वितीय ब्रह्म के लिए, जो नाम, रूप, क्रिया, स्थान, गुण इन पांच विषयों से सर्वथा रहित है यह विचार किया जाता है कि उस पर ब्रह्म का नाम ‘उत्’ है, उसका रूप सुवर्ण की तरह है, ऊर्ध्व लोकों का पालन करना उसका काम है, आदित्य मंडल उसका स्थान है और सर्वश्रेष्ठता उसका गुण है। इस प्रकार उस निर्गुण ब्रह्म में नाम, गुण आदि का आरोपण करके ही उपासना की जाती है। इस कारण वे उपासना विपरीत ज्ञान रूप अभ्यास से युक्त होती है।

हे शिष्य! वे उपासनाएं भी अनेक प्रकार की होती हैं। उपनिषदों में भी कहीं तो साक्षात ब्रह्म की उपासना बतलाई है, कहीं उस ब्रह्म की विभूतियों की उपासना का निर्देश है। उन विभूतियों में से भी कोई तो कारण रूप होती हैं, कोई अधिदैव रूप होती हैं। जैसे हिण्यगर्भ, विराट, आदित्य आदि कारण रूप विभूतियों की ही उपासना करने को कहा गया है। कोई विभूतियां कार्य रूप तथा व्यष्टि रूप होती है। जैसे मन, प्राण, वाक आदि को ही ब्रह्म रूप मानकर उपासना करने को कहा गया है और किसी स्थान पर तो प्रणव आदि मंत्रों और उनके रूप अर्थों को तादात्म्य मानकर उपासना का विधान बनाया गया है।  ऐसी उपासनाएं भी दो प्रकार की होती हैं, एक में तो प्रणव आदि मंत्र को प्रधान और उसके ब्रह्म रूप अर्थ को गौण माना गया है और दूसरी में प्रणवादिक मंत्रों को तो गौण और ब्रह्म रूप अर्थ को प्रधान माना गया है। उदाहरण के लिए अथर्व शिर, योगशिखा, पूर्वतपनीय, उत्तरतपनीय, मांडूक्य, आत्मबोध, अमृतनाद, अमृतबिंदु इत्यादि उपनिषदों में तो प्रणव आदि मंत्रों को प्रधान मानकर उपासना बतलाई है, पर प्रश्न, मंडक, बृहदारण्यक, छांदोग्य, कठवल्ली इत्यादि उपनिषदों में ब्रह्मरूप अर्थ को प्रधान मानकर उपासना करने का निर्देश दिया गया है। फिर रुद्राध्याय, मंडल ब्राह्मण और पुरुष सूक्त से तीन स्तुति, रहस्यनाम तथा मंत्र, इन तीनों सहित ब्रह्म की उपासना करने को कहा है। इस प्रकार चारों वेदों के जितने उपनिषद हैं, उनमें कई प्रकार की उपासना बतलाई गई है। इसलिए वे सब उपासनाएं वैराग्य भावना प्राप्त करने के लिए ही है।

शंका-हे भगवन अपनी आत्मा को ब्रह्मरूप में समझाने के उद्देश्य से जो उपनिषद प्रवृत्त हुए हैं, उनमें अनेक प्रकार की उपासनों का कथन करना असंगत है? समाधान-हे शिष्य! वे उपनिषद यद्यपि निर्गुण ब्रह्म का ही वर्णन करते हैं, पर सब मनुष्य निर्गुण ब्रह्म को समझ सकने में समर्थ नहीं होते। उन मंद बुद्धि वालों पर कृपा करके उस ब्रह्म का वर्णन अनेक प्रकार से किया है।

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