आधी विधवाओं का पूरा सच

Aug 14th, 2019 12:05 am

राजेंद्र राजन

साहित्यकार

बेहिसाब कश्मीरी मुस्लिम युवाओं का गायब हो जाना दिग्भ्रमित होकर मिलिटेंट बन जाना, जेहादी बन जाना चिंता का विषय है। पुलिस या सुरक्षों बलों द्वारा शक के आधार पर उनका अपहरण आदि एक ऐसी बड़ी त्रासदी है, जो ऐसे युवाओं की आधा विधवाओं, बच्चों, परिवार के अन्य सदस्यों को आाहिस्ता-आहिस्ता धीमी मौत की तरफ धकेल रही है। एक सर्वे के अनुसार कश्मीर में 8 से 10 हजार लोग कहां चले गए, कोई पता नहीं। आतंकवादियों के पुलिस या सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने का तो रिकार्ड होता है। पंजाब में आतंकवाद के वक्त जो युवक गायब हो गए थे या पुलिस में एलीमिनेट कर दिए गए थे उसके विरुद्ध हाईकोर्ट में सालों साल केस चलते रहे…

धारा 370 की समाप्ति के बाद देश भर में जो नया विमर्श रचा जा रहा है, उसके नेपथ्य में कश्मीर की उन हजारों विधवाओं की यंत्रणा दब गई है जो हाफ विडोज़ का दंश झेल रही हैं। उनके मिसिंग हसबैंड्स यानी लापता पति कभी नहीं लौटते। यह एक ऐसा विद्रूप व भयावह सच है जिस पर मीडिया और समाज ने चुप्पी ओढ़ रखी है। आज कश्मीर आतंकवाद, भय व असुरक्षा के जिस साये में सांस ले रहा है उसने घाटी के दीगर महत्त्वपूर्ण मु्द्दों को गौण या विस्मृत कर दिया है। आतंकवाद का पर्याय बन चुके कश्मीर में हजारों आधी विधवाएं अपनी पहचान के संक्रमणकाल से गुजर रही हैं। वे अंतहीन यातना में जी रही हैं। बेहिसाब कश्मीरी मुस्लिम युवाओं का गायब हो जाना दिग्भ्रमित होकर मिलिटेंट बन जाना, जेहादी बन जाना चिंता का विषय है। पुलिस या सुरक्षों बलों द्वारा शक के आधार पर उनका अपहरण आदि एक ऐसी बड़ी त्रासदी है, जो ऐसे युवाओं की आधा विधवाओं, बच्चों, परिवार के अन्य सदस्यों को आाहिस्ता-आहिस्ता धीमी मौत की तरफ धकेल रही है।

एक सर्वे के अनुसार कश्मीर में 8 से 10 हजार लोग कहां चले गए, कोई पता नहीं। आतंकवादियों के पुलिस या सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने का तो रिकार्ड होता है। पंजाब में आतंकवाद के वक्त जो युवक गायब हो गए थे या पुलिस में एलीमिनेट कर दिए गए थे उसके विरुद्ध हाईकोर्ट में सालों साल केस चलते रहे। अनगिनत पुलिसकर्मियों को जेल हुई। लेकिन कश्मीर ह्यूमन राइट्स का जिस प्रकार उल्लंघन हो रहा है वह चौंकाने वाला है। कोई अपील या दलील नहीं। ऐसे गायब हो चुके युवकों की पत्नियों को आधा विधवा कहा जाता है।

प्रवीण मोरछले की 85 मिनट की फीचर फिल्म ‘दि विडो ऑफ साइलैंस कश्मीर’ की उन विधवाओं के दुःख व पीड़ा को रखती है जो विकट परिस्थितियों के बीच संघर्षशील रहकर सरकार व प्रशासन से लड़ती व भिड़ती हैं। फिल्म का कथानक आसिया नामक आधी विधवा के संत्रास के इर्द-गिर्द रखा गया है जो मीलों लंबा सफर तय कर पुलवामा में रजिस्ट्रार के दफ्तर के चक्कर काट-काट कर टूट जाती है। पति को मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ताकि पति के नाम की जमीन अपनी बेटी नूरजहां के नाम कर सके। विधवा को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं प्राप्त कर सके। गरिमा व सम्मान से जी सकें। लेकिन रजिस्ट्रार एक कुटिल, भ्रष्ट और चरित्रहीन अधिकारी है जो आसिया से शारीरिक संबंध बनाने की मांग करता है। एक रोज जब वह अस्पताल में आसिया से जबरन अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है तो वह उसे अपनी बाहों में खींचने का प्रयास करता है। यह बलात्कार के करीब की स्थिति है। लेकिन आसिया रजिस्ट्रार को जोरदार थप्पड़ रसीद कर उसे स्वयं से अलग कर लेती है। आसिया की जिंदगी को नरक बनाने में रजिस्ट्रार उससे क्रूर बदला लेता है। उसके पति का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की बजाय आसिया का ही डैथ सर्टिफिकेट जारी कर देता है। इससे उसकी नर्स की नौकरी छिन जाती है और बैंक खाता भी ब्लॉक हो जाता है। अब उसे यह साबित करना है कि वह जीवित है।

‘द विडो ऑफ साइलैंस कश्मीर’ ने एक ही वर्ष में दुनिया भर में अनेक फिल्म समारोहों में ढेर सारे पुरस्कार हासिल किए। कनाडा, केलिफोर्निया, बेल्जियम, यूके, भारत आदि अनेक देशों में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के खिताब से नवाजा गया। भारत के भीतर भले ही नहीं, विश्व भर में फिल्म दर्शकों या अन्य लोगों को कश्मीर में गत कई दशकों से चल रहे आतंकवाद से उपजने वाली सामाजिक कहानियों ने अवश्य द्रवित किया है। कश्मीर में ‘मिसिंग हसबैंड्स’ का थाने में कोई रिकार्ड नहीं है। पत्नी आधी विधवा, सात साल का लंबा इंतजार। फिर सरकार ऐसे पतियों को मृत मान लेती है। लेकिन सरकारी जबड़ों से दस्तावेज निकाल लेना आधी विधवाओं के लिए एक बड़ी चुनौती और संकट है, जिसकी ओर मोदी सरकार का ध्यान जाना जरूरी है। ऐसी पीडि़त महिलाओं को न्याय दिलाना भी सरकार व समाज का कर्त्तव्य है। कश्मीर में माएं भी आधी माएं कहलाती हैं। यह आतंकवाद की उपज है।

लंदन में गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी कश्मीर में 38 जगहों पर 2156 ऐसी कब्रें हैं जिनकी पहचान व मृतकों की आइडेंटिटी के बारे में किसी को भी कोई जानकारी नहीं है। धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में फिल्मों की शूटिंग शुरू होगी। सिनेमा हॉल खुलेंगे, शहर और गांव शराब के ठेकों से भी शायद गुलजार होंगे। मगर गत 30 सालों में 42000 लोगों के कत्लेआम ने समाज के चेहरे पर जो विकार पैदा किए हैं, उन्हें कैसे दूर किया जा सकेगा?

कश्मीर की महिलाओं को राज्य से बाहर भी शादी करने पर प्रॉपर्टी में हक मिलेगा, सुनने में कितना सुखद लगता है। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर की यह टिप्पणी कि अब हरियाणवी लड़के कश्मीर से बहुएं ला सकेंगे, कितना हास्यास्पद लगता है। क्या कश्मीर में जवान लड़कियां हरियाणा जैसे उस प्रांत में सेटल होने के लिए छटपटा रही होंगी जो खाप पंचायतों के दमन, क्रूरता, कन्या भ्रूण हत्या के लिए देश व दुनिया में बदनाम है। हिंदुत्व के एजेंडे को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भाजपा सरकार को कश्मीर की महिलाओं, विधवाओं, अनाथ बच्चों के पुनर्वास पर विशेष ध्यान देना होगा। तीन तलाक के बाद कश्मीर की आधी विधवाओं का दिल जीतना भी केंद्र सरकार के लिए जरूरी है।

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