गुग्गा नवमी

विक्रमी सम्वत के माह भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की नवमी को गुग्गा नवमी मनाई जाती है। गुग्गा नवमी इस वर्ष 25 अगस्त को मनाई जाएगी। गुग्गा नवमी के दिन नागों की पूजा करते हैं। मान्यता है कि गुग्गा देवता की पूजा करने से सांपों से रक्षा होती है। गुग्गा देवता को सांपों का देवता भी माना जाता है। गुग्गा देवता की पूजा श्रावण मास की पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन से आरंभ हो जाती है, यह पूजा-पाठ नौ दिनों तक यानी नवमी तक चलता है इसलिए इसे गुग्गा नवमी कहा जाता है।

गुग्गा जन्म कथा – गुग्गा नवमी के विषय में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार गुग्गा मारू देश का राजा था और उनकी मां बाछल, गुरु गोरखनाथ जी की परम भक्त थी। वीर गुग्गा जी गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य थे। उनका जन्म विक्रम सम्वत 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गांव में हुआ था। सिद्ध वीर गुग्गा देव का जन्म स्थान, जो दत्तखेड़ा ददरेवा राजस्थान के चुरू जिले में स्थित है, जहां पर सभी धर्मों के लोग माथा टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं।  मुस्लिम समाज के लोग जाहरपीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मन्नत मांगने और माथा टेकने आते हैं। यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

मध्यकालीन महापुरुष गुग्गा जी जाहरपीर हिंदू, मुस्लिम, सिख सभी संप्रदायों के लोकप्रिय देवता हंै। गुग्गा जाहरपीर का जन्म राजस्थान के ददरेवा चुरू शासक जेवरसिंह चौहान वंश के राजपूत की पत्नी बाछल की कोख से गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से भादों शुक्ल नवमी को हुआ था। राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर राजा थे।

(हरियाणा) सें हांसी, सतलुज राज्य गुग्गा का था। जयपुर से लगभग 250 किमी. दूर गुग्गा देवजी का जन्म स्थान पास के सादलपुर, दत्तखेड़ा (ददरेवा) में है। गुग्गा देव जी के घोड़े का आज भी अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके घोड़े की रकाब आज भी वहीं पर ज्यों का त्यों है। जन्म स्थान पर गुरु गोरखनाथ का आश्रम भी है और वहीं पर गुग्गा देव की घोड़े पर सवार मूर्ति भी स्थापित है। गुग्गा जी की शादी सुरियल से हुई थी। आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गुग्गा जी की पूजा की जाती है। हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गुग्गा जी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गुग्गा जी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी. की दूरी पर है। जहां एक हिंदू व एक मुस्लिम पुजारी सेवा में लगे रहते हैं।

गुग्गा नवमी पूजा- गुग्गा नवमी पर्व आठ दिन तक मनाया जाता है और नौवें दिन गुग्गा नवमी को गुग्गा मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है और प्रसाद के रूप रोट और चावल, आटा चढ़ाते हैं। भक्त लोग कथा का श्रवण करते हैं तथा नाग देता की पूजा अर्चना करते हैं। इस अवसर पर गुग्गा कथा को गाने वाली मंडलियां घर-घर जाकर गुग्गा का गुण गान करती हैं। पंजाब और हरियाणा समेत हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस पर्व को बहुत श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। गुग्गा नवमी की ऐसी मान्यता है पूजा स्थल की मिट्टी को घर पर रखने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है। लोगों की गुग्गा जी में अटूट श्रद्धा व आस्था है।

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