दुर्घटनाओं का सरलीकरण

हिमाचल के परिवहन मंत्री ने सड़क दुर्घटनाओं का सरलीकरण करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि प्रदेश के नब्बे फीसदी हादसे मानवीय चूक से होते हैं। हो सकता है कि मंत्री महोदय विभिन्न जांचों के निष्कर्ष पर अपनी सहमति जताते हुए दुर्घटनाओं के लिए सरकारी जिम्मेदारी को हल्का कर लें, लेकिन साढ़े चार साल में करीब साढ़े बारह हजार सड़क हादसों का होना अपने आप में चिंता का विषय है। मरने वालों में सबसे अधिक युवा अगर बाइक सवार होते हैं या शराब के कारण लोग मरते हैं, तो कहीं सड़क पर जिम्मेदार प्रबंधन की कमी है या आबकारी नीति तय करते हुए मानवीय सुरक्षा के सिद्धांत याद नहीं किए जाते। शायद बाइक सवारों पर पैनी नजर रखने के लिए ट्रैफिक नियम हैं तथा उन्हें बहकने से रोकने के लिए मुकम्मल पुलिस की व्यवस्था सरकार को करनी होती है। जांच तो यह भी बताती है कि ट्रैफिक पुलिस के अधिकतम सैल्यूट वीआईपी गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं और कहीं ऐसे महानुभाव ट्रैफिक जाम में फंस जाएं तो एसपी स्तर के अधिकारी भी बदल दिए जाते हैं। हमने कभी यह नहीं सुना कि किसी बस दुर्घटना के लिए पुलिस महकमे पर गाज गिरी हो, लेकिन वीआईपी परेशानियों में तल्लीनता से सतर्क रहते, पुलिस कर्मियों को नाहक सजा दी जाती है। परिवहन मंत्री हिमाचल की कोई एक सड़क चुनकर यह साबित करें कि वहां दुर्घटना नहीं हो सकती। गलत इंजीनियरिंग और गुणवत्ता के अभाव में हर सड़क पर मौत मंडरा रही है। यहां केवल जांच के हवाले से दुर्घटनाओं का मुआयना करेंगे, तो शायद ही गड्ढे, कठिन रास्ते, तंग मोड़ या पहाड़ की चढ़ाई नजर आएगी। केवल ड्राइवर को अति गति में देखना अगर जांच है, तो इसका अध्ययन क्यों नहीं कि पहाड़ पर कितनी लंबी और किस प्रकार की बसें चलाई जाएं। खुद एचआरटीसी ने जो लो फ्लोर बसें सड़क पर उतारी हैं, क्या इसके लिए मंत्री जी अधिकृत हैं या इस फैसले को पवित्र मान लें। क्या पर्यटक शहरों से निकलती वोल्वो बसों की लंबाई का अनुमान परिवहन विभाग को है और क्यों नहीं परिवहन नीति यह स्पष्ट कर पा रही है कि सड़क पर सुविधा व सुरक्षा में कितना अंतर है। सड़कों पर मल्टी एक्सल वाहनों का दौड़ना और माल ढुलाई के मापदंडों का करीब-करीब न होना कितना खतरनाक है, इसे सीमेंट या सेब की ढुलाई में क्यों न देखें। निजी बसों के टाइम टेबल की लड़ाई जब सड़कों पर होगी, तो कुछ दोष विभाग को अपनी रूट-परमिट प्रक्रिया में खोज लेने चाहिएं। सड़कों पर बिखरी वर्कशॉप या बड़े पैमाने पर वाहन पार्किंग के कारण जो दिक्कतें यातायात को सामान्य बनाए रखने में आती हैं, उनका निवारण भी तो चाहिए। विडंबना यह भी कि पूरे हिमाचल में प्रमुख सड़कों के चौराहे आज तक विकसित नहीं हुए और न ही ट्रैफिक सिग्नल की जरूरत पूरी की गई। ट्रांसपोर्ट नगरों की घोषणाएं झूठ की सफेदी में मिट गईं, तो यातायात के विकल्प भी मुंगेरी लाल की आंखों के हसीन सपने बने रहे। प्रभारी मंत्री को सड़क दुर्घटनाओं को जांच के निष्कर्षों के साथ-साथ परिवहन सुरक्षा के अध्ययन में समझना होगा। परिवहन सुरक्षा किसी वाहन चालक की गलती ढूंढ कर पूरी करनी है, तो भी ट्रैफिक नियंत्रण के प्रबंधन को अधोसंरचना, नियमन, पुलिस पैट्रोलिंग और नए विकल्पों के समाधान में तराशना होगा। अगर हाई-वे पर पुलिस पैट्रोलिंग के बजाय शराब का ठेका आकर्षित करेगा, तो खतरों के खिलाफ आबकारी नीति को दुरुस्त कीजिए। टैक्सियों या निजी बसों की दौड़ को नियंत्रित करने का साहस दिखाइए। ब्लैक स्पॉट गिनने के बजाय इन्हें चुन-चुन कर ठीक कराएं। हमें नब्बे फीसदी चालकों के सिर पर वाहन दुर्घटनाओं का ठीकरा फोड़ने से पहले यह भी सोचना होगा कि लाहुल में फंसे मंत्री को तो सरकारी हेलिकाप्टर ले आएगा, लेकिन साधारण आदमी की जिंदगी के सवाल ढोते न जाने कितने ड्राइवरों को भौगोलिक व मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। सड़कों पर बढ़ते वाहन दबाव के बीच परिवहन विभाग का अध्ययन, नवाचार व सार्वजनिक परिवहन के नए विकल्प दिखाई नहीं देंगे, तो अगले चार सालों के बाद दुर्घटनाओं के आंकडे़ और भी वीभत्स होंगे।

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