पंचायत के फ्रेम में खोट

भ्रष्टाचार के जिस पहलू में पंचायती राज पद्धति की शिनाख्त होने लगी है, वहां हिमाचल विधानसभा की चिंता को सही परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। कमोबेश कई विधायक सहमत दिखाई देते हैं कि देश के संसाधन ग्रामीण इलाकों में आकर बर्बाद हो रहे हैं या भारत के विकास की तस्वीर को पंचायत के फ्रेम में सुदृढ़ करना होगा। यहां सरकारी मशीनरी और कामकाज की मानिटरिंग को लेकर भी संदेह है और इस तरह पंचायत सचिव से जेई तक बिछी बिसात में जांच-परख की गुंजाइश बढ़ जाती है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश के आर्थिक संसाधन जिस तीव्रता तथा सहजता से ग्रामीण इलाकों में पहुंच रहे हैं, उस हिसाब से वित्तीय प्रबंधन और प्रक्रिया का पालन नहीं हो पाया। नतीजतन सीमेंट के मसाले में भ्रष्टाचार पक रहा है। आश्चर्य तो यह कि पंचायत क्षेत्र की जरूरतों को समझे बिना कुछ तात्कालिक महत्त्व के विकास में पैबंद ही जोड़े जा रहे हैं। इससे हम ग्राम की नई तस्वीर में पनपते राजनीतिक और प्रशासनिक खोट का मुआयना कर सकते हैं। पंचायतों को मिल रही वित्तीय, प्रशासनिक तथा अन्य शक्तियों के बीच न गांधी के आदर्श बचे और न ही गांव के अपने संसाधन मुकम्मल रहे। उदाहरण के लिए नवनिर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के बीच विकास का असंतुलन इस कद्र बढ़ गया है कि सामुदायिक जरूरतें ही पूरी नहीं हो रही हैं। कभी गांव की बिरासत में सामुदायिक भाईचारे के प्रतीक छोटे रास्तों, जल निकासी व संग्रहण से लेकर बावड़ी व कूहलों तक दिखाई देते थे। आज की जरूरतें अलग होते हुए भी विकास से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही हैं, नतीजतन ग्रामीण जिंदगी के आयाम परंपरागत तस्वीर को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जाहिर है ग्राम विकास के मानदंड स्पष्ट नहीं हैं, लिहाजा हर तरह की ग्रांट को बिना सोचे जाया किया जा  रहा है। दूरगामी योजनाओं का खाका अगर गांव की सोच में नहीं है, तो पंचायती राज केवल सियासी नर्सरी की तरह उपजाऊ माना जाएगा। बिना लक्ष्यों के विकास सिर्फ एक पेशकश, नजराना या अपने वोट का समझौता है, जबकि नागरिक सहमति और सरोकार से राष्ट्रीय संसाधनों की पैरवी होनी चाहिए। ग्रामीण संसाधनों का सही इस्तेमाल केवल निर्माण का मूल्यांकन नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के समक्ष खड़ा होने का सामर्थ्य तथा नागरिक समाज की तरक्की को हर अंजाम तक पहुंचाने का जरिया भी है। पंचायती क्षेत्रों की विकास संबंधी होड़ या तो राजनीति के जरिए धन तक पहुंचने की दौड़ है या इसके इस्तेमाल के प्रारूप में सियासी साम्राज्य को बुलंद करने की बंदरबांट है। दुर्भाग्यवश सारी प्रक्रिया केवल एक-दूसरे पर मेहरबानियां बरसातें हुए यह तय नहीं कर पा रही है कि आगे जाना कहां है। इस हमाम में सभी को देखें, तो निर्वस्त्र होते धन की लाज कैसे बचाएं। जनप्रतिनिधियों की आमद में ऐसी काबिलीयत नहीं कि हर साल के बजट का सदुपयोग हो या चुनावी पद्धति इतनी विकराल हो चुकी है कि चाहकर भी भ्रष्टाचारी तंत्र से बाहर निकला जा सके। जो भी हो रहा है, उसकी परिधि में चरित्र का डूबना और मकसद का हारना स्पष्ट है और यही चिंता विधानसभा के सत्र को एक विषय देती है। हम यह कैसे माप सकते हैं कि ग्रामीण विकास के अधिकांश खोट बिना किसी मिलीभगत के संभव हैं। हम यह भी कह नहीं सकते कि जनप्रतिनिधि अधिक दोषी या मौके पर मौजूद सरकारी मशीनरी पर ही सारा दोष नहीं मढ़ सकते। दोनों का परस्पर मिलन किस शर्त या समझौते पर होता है, यह देखने की जरूरत है। विकास को सियासी बहुमत से चलाएंगे, तो संसाधनों पर ऐसे ही अभिप्राय की कुंडली होगी। ग्रामीण विकास मंत्री अपनी ओर से बड़ी तस्वीर दिखा रहे हैं। नई जिम्मेदारियों के सदके अब पंचायत सचिव से जेई तक को जवाबदेह बनाने का वादा है, लेकिन इनकी असली बागडोर तो उस हस्ती के पास पहले से ही है, जो बार-बार इन्हें स्थानांतरित करता रहता है। ऐसे में ग्रामीण सुशासन केवल एक पक्ष की फितरत से न बिगड़ेगा न सुधरेगा, बल्कि समाज की जागरूकता में पंचायती राज की निरंकुशता पर लगाम लगाने की ताकत पैदा करनी होगी।

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