फोर्टिस में मौत के मुहाने से लौटी जिंदगी

कांगड़ा -जिंदगी और मौत के बीच आंख-मिचौनी का यह अनोखा केस था। मनीष के साथ जिंदगी और मौत का संघर्ष काफी लंबा चला। मनीष बार-बार जिंदगी की ओर आने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मौत हर बार झपटा मारकर उसे अपनी ओर खींच लेती। इस फेहरिस्त में संकटमोचक बने हार्ट स्पेशलिस्ट डा. अखिल गौतम। डा. गौतम ने अपने प्रोफेशनल हुनर और सूझबूझ से मौत को दरकिनार करके मनीष की जीवनरेखा को मजबूत कर दिया।  दरअसल 47 वर्षीय मनीष हार्ट अटैक के साथ फोर्टिस अस्पताल कांगड़ा पहुंचा था। डा. अखिल गौतम ने प्राथमिक निरीक्षण करने के उपरांत ही बता दिया कि यह हार्ट अटैक का सीरियस मामला है और मरीज को तुरंत उपचार की जरूरत है, लेकिन अभिभावक इसे हल्के में ले रहे थे व मरीज को घर ले जाने की बात कर रहे थे। इसी उहापोह में मनीष को अस्पताल की एमरजेंसी में फिर से अटैक हो गया और वह अचेत होकर कुर्सी से गिर गया। सौभाग्यवश डा. अखिल गौतम मौके पर ही थे। उन्होंने अपनी कार्डियक टीम के साथ तुरंत सीपीआर करके उसे उभारने की कोशिश की, लेकिन एमर्जेंसी से कैथलैब तक ले जाने के दौरान मरीज फिर अचेत अवस्था में चला गया। उसे चेतन अवस्था में लाने के लिए कार्डियक शॉक दिया गया, लेकिन थोड़ा सा होश संभालते ही उसकी सांसें फिर से उखड़ गईं। दोबारा कार्डियक शॉक देने पर मरीज की सांसें फिर से जवाब दे गईं। करीब आठ बार कार्डियक शॉक देने के बाद उसकी सांसों को संभाला जा सका। अब डा. अखिल के सामने चुनौती थी, उसके दिल की बंद नाडि़यों को खोलने की। डा. अखिल ने मरीज को तुरंत कैथलैब में लिया। उन्होंने करीब आधे घंटे की सघन प्रक्रिया में मरीज के दिल की बंद नाडि़यों को सफलतापूर्वक खोल दिया। इसके साथ ही हार्ट ने सामान्य रूप से काम करना शुरू कर दिया। इस संबंध में डा. अखिल गौतम ने कहा कि यह मामला अपने आप में जटिल, लेकिन रोचक था। करीब आठ बार कार्डियक शॉक देकर मरीज को मौत के चंगुल से छुड़ाना और फिर दिल की बंद नाडि़यों को खोलकर उसे खतरे से पूरी तरह बाहर निकालना बेशक चुनौतीपूर्ण, लेकिन सुकून देने वाली प्रक्रिया थी। हालात ऐसे थे कि थोड़ा सा भी विलंभ मरीज की जान पर भारी पड़ने वाला था, लेकिन फोर्टिस कांगड़ा में उपलब्ध संसाधनों और कुशल टीम की बदौलत संपूर्ण इलाज प्रक्रिया को प्रभावी तरीके से अंजाम दिया जा सका।

 

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