बिछुड़ रहे सभी बारी-बारी

17 मार्च, 2019 को गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर, 20 जुलाई को दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित, छह अगस्त को पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और 24 अगस्त को पूर्व वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री मोदी के जिगरी दोस्त, उनके ‘चाणक्य’ अरुण जेटली का पार्थिव निधन…। बीते साल 2018 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 16 अगस्त, दिल्ली के दिग्गज मुख्यमंत्री रहे मदनलाल खुराना 27 अक्तूबर को, पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार 12 नवंबर को हमें छोड़ कर चले गए थे। भाजपा ने एक ही साल में अपने छह कद्दावर और संस्थापक नेताओं को खोया है। बिछुड़े सभी बारी-बारी…। यह नियति का कौन-सा सिलसिला है, कैसा दुष्चक्रहै। जरा आंखों के आंसू तो सूखने दो, जरा दिल की धड़कनें तो शांत होने दो, जरा यादों के बवंडर तो थमने दो, जरा गम, शोक और शून्य को झेलने की ताकत तो बटोरने दो। लेकिन नियति कब सुनती है। बेशक जीवन-मृत्यु नियति के ही चक्रहैं, लेकिन हमें तो क्रर दुष्चक्रमहसूस हो रहा है। मानते हैं कि जिंदगी के पाले में मौत की पदचाप से ही व्यक्ति की पराजय निश्चित है। वह फिर ‘पार्थिव’ ही रह जाता है, लेकिन अरुण जेटली हमेशा इस देश की यादों में ‘जिंदा’ रहेंगे। वह सिर्फ  राजनेता या वकील ही नहीं थे, असंख्य गरीबों और जरूरतमंदों के ‘पालनहार’ भी थे। जिन पत्रकारों ने भाजपा और संसद को कवर किया है, वे उन्हें विस्मृत कैसे कर सकते हैं? उनके साथ भाजपा की न्यूज ब्रीफिंग के बाद जो दोपहरें बिताई हैं, वे रिश्ते एक मौत कैसे छीन सकती है? पत्रकारों के साथ बैठकर बिना छिलके के सेब और संतरे खाने और काली चाय (या दूध वाली भी) पीने और डायबिटीज वालों को नसीहत देने के संस्मरण कैसे कोई मौत मिटा सकती है? अरुण भाजपा के ही ‘सूर्य’ नहीं थे, बल्कि कांग्रेस और अन्य पार्टियों की हलचलों को भी ‘रोशन’ करते थे। उन अनुभवों और यादों का ‘सूर्यास्त’ कैसे हो सकता है? अरुण जेटली बहुमुखी प्रतिभा के धनी ही नहीं थे, बल्कि वह एक साथ अटल-आडवाणी और फिर मोदी के ‘प्रिय राजनेता’ थे, लिहाजा उनकी शख्सियत की व्याख्या करनी हो, तो उन्हें ‘भाजपा के अरुण’ कहा जा सकता है। बेशक आज उनका पार्थिव शरीर हमारे बीच नहीं है, लेकिन एक प्रखर, तेजस्वी वक्ता, बौद्धिक राजनेता, तार्किक सांसद एवं मंत्री, भाषायी जादूगर, गहन संविधान विशेषज्ञ एवं कानूनविद और कुल मिलाकर भाजपा का विश्वसनीय रणनीतिकार, संकटमोचक की असंख्य भूमिकाएं अरुण जेटली ने निभाई हैं। उन इतिहासों को कौन भूल सकेगा? अरुण पत्रकारों और पार्टियों के ‘डार्लिंग’ थे। उन्होंने अपने चारों तरफ  एक सुखद, सुंदर, सुगंधित संसार बुना था। जो उन्हें नहीं जानते थे या संवाद स्थापित नहीं किया था, वे अरुण के व्यक्तित्व की कुछ नकारात्मक व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन उनकी प्रखरता और बौद्धिकता पर उन्हें भी संदेह नहीं था। वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के 1974 में अध्यक्ष चुने गए, जेपी आंदोलन के युवा चेहरे बने और आपातकाल में 19 महीने तक अंबाला जेल में रहे। वहां से लेकर भाजपा के संस्थापक सदस्य बनने और केंद्रीय मंत्री बनने तक अरुण जेटली ने एक लंबा सफरनामा तय किया। ऐसा नहीं है कि इस दौरान उन्हें टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियां नहीं मिलीं या रोड़े-पत्थर रास्ते में नहीं थे, लेकिन वह संयमी, सहिष्णु, साहसी और कोलंबस की तरह थे, जिन्होंने अपना रास्ता तैयार किया और यह मिथ भी तोड़ा कि संघ परिवार की राजनीतिक इकाई सत्ता के संस्कार नहीं जानती। यदि आज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, तो उसमें जेटली की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 2002 में गोधरा दंगों और नरसंहार के बाद गुजरात मुख्यमंत्री पद से मोदी को हटाने पर आमादा थे, लेकिन अरुण ने पैरवी की और आडवाणी की संस्तुति थी कि मोदी बरकरार ही नहीं रहे, बल्कि 2013 में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार भी चुने गए। अरुण जेटली की कानूनी दलीलों ने ही मोदी को गोधरा के कलंक और अमित शाह को ‘तड़ीपार’ की सजा से बचाया, नतीजतन दोनों ही अरुण के जाने को ‘निजी क्षति’ करार दे रहे हैं। बहरीन में भारतीयों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ‘अपने प्यारे दोस्त’ को याद किया और भावुक हो गए। पीड़ा यह है कि एक पीढ़ी की वह ईमानदार और कर्मठ जमात असमय ही हमसे विदा हो रही है, जिसने देश, राजनीति, लोकतंत्र में मूल्यों को स्थापित किया, आम आदमी के आंसू पोंछे और मदद देकर उसे खड़ा करके अपने परिजनों के समान लाए। यह भी जाने की कोई उम्र होती है। जिसका जीवन देश और समाज को समर्पित हो, उसके लिए 67 साल की उम्र क्या होती है? लिहाजा नियति बड़ी क्रर लगती है। उनके राष्ट्रीय और महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर कल कुछ लिखेंगे। आज दिवंगत आत्मा के लिए प्रार्थना और शोकाकुल परिवार के लिए सांत्वना…! ओम् शांति…!

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