भृगु ने ली त्रिदेवों की परीक्षा

गतांक से आगे…

उन्होंने तुरंत माता के चरण पकड़ लिए और उनसे अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई। माता पार्वती आगे आई और महादेव से प्रार्थना की कि भृगु तो उनके पुत्र की भांति हैं अतः उन्हें प्राणदान दें। उनके ऐसा कहने पर महादेव का क्रोध थोड़ा शांत हुआ। उन्हें शांत देख कर भृगु ने उनके चरण पकड़ते हुए परीक्षा के बारे में बताया। ये सुनकर महादेव हंसते हुए बोले महर्षि! आप तो स्वयं ज्ञानी हैं फिर आपने ऐसा कैसे सोचा कि सृष्टि के संहार का जो भार मुझ पर है वो बिना तमोगुण के पूर्ण हो सकता है। मुझमें तमोगुण की अधिकता है क्योंकि संहार के लिए ये आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यज्ञ के जिस पुण्य के लिए आप ये परीक्षा ले रहे हैं, उसे तो मैंने दक्ष के यज्ञ में ही त्याग दिया था। तब भृगु भगवान शिव की स्तुति करते हुए बोले, हे महादेव! मुझे ये ज्ञात है। आप तो समस्त यज्ञ और पुण्य से परे हैं किंतु फिर भी इसी बहाने मुझे आपकी इस लीला में भाग लेने का अवसर मिला। इससे मैं कृतार्थ हो गया। अब मेरे लिए क्या आज्ञा है? अब केवल नारायण ही बचे हैं किंतु सृष्टि के पालनहार की परीक्षा लेने में मुझे संकोच हो रहा है।तब महादेव ने कहा, महर्षि! ये तो कार्य आपने किया है वो नारायण की परीक्षा के बिना अधूरा है। उनकी परीक्षा लेने के बाद ही आपको ज्ञात होगा कि त्रिगुणातीत कौन है। अतः आप निःसंदेह वैकुंठ को प्रस्थान करें। महादेव की ऐसी आज्ञा सुनकर महर्षि भृगु उन्हें प्रणाम कर क्षीरसागर की और बढ़े। जब भृगु ऋषि अंदर गए तो वहां का अलौकिक दृश्य देख कर एक क्षण को मंत्रमुग्ध हो गए। अनंत तक फैले क्षीरसागर में स्वयं देव अनंत (शेषनाग) की शैय्या पर नारायण विश्राम कर रहे थे। त्रिलोक में जिनके रूप का कोई जोड़ नहीं था, वो देवी लक्ष्मी, जो स्वयं महर्षि भृगु और दक्षपुत्री ख्याति की पुत्री थी,नारायण की पाद सेवा कर रही थी। अपनी पुत्री और जमाता का ऐसा अलौकिक रूप देख कर महर्षि भृगु एक क्षण के लिए खो से गए। जब उनकी चेतना लौटी तब उन्होंने सोचा कि श्रीहरि तो इस जगत के स्वामी है हीं, किंतु उसके साथ-साथ वे उनके जमाता भी लगते हैं। फिर किस प्रकार वे उनकी परीक्षा लें? जमाता को तो लोग अपने शीश पर बिठाते हैं और इसी कारण वे किस प्रकार श्रीहरि को कटु शब्द बोलेंगे? उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि वे किस प्रकार भगवान विष्णु की परीक्षा लें। वे उसी प्रकार द्वार पर खड़े रह गए। उसी समय अचानक माता लक्ष्मी की दृष्टि द्वार पर खड़े अपने पिता पर पड़ी। उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और श्रीहरि के समक्ष बुलाया। महर्षि भृगु अब नारायण की शेष शैय्या तक पहुंचे और देवी लक्ष्मी से कहा कि वे अपने पति को सूचित करे कि उनके पिता वहां उपस्थित हैं। ये सुनकर देवी लक्ष्मी ने कहा कि अभी उनके स्वामी योग निद्रा में हैं अतः उन्हें जगाया नहीं जा सकता। उन्हें उनके जागने की प्रतीक्षा करनी होगी। अब यहां प्रभु की माया आरंभ हुई। अभी तक भृगु त्रिदेवों की परीक्षा ले रहे थे अब उनकी परीक्षा आरंभ हुई। उन्हें ये पता भी नहीं चला कि कब प्रभु ने उनकी परीक्षा आरंभ कर दी है। उसी माया के कारण अकस्मात उन्हें माता लक्ष्मी अपनी एक साधारण पुत्री प्रतीत होने लगी। उस कारण देवी लक्ष्मी के ऐसा करने से उनमें क्रोध का भाव उत्पन्न हो गया। त्रिगुणातीत की खोज करते-करते महर्षि भृगु ये भूल गए कि वे स्वयं त्रिगुणातीत नहीं हैं। प्रभु की माया से वशीभूत महर्षि भृगु ने क्रोधपूर्वक देवी लक्ष्मी से कहा, पुत्री! तुम्हें तो अपने पिता से वार्तालाप करने का शिष्टाचार भी नहीं पता। क्या तुम्हें ये ज्ञात नहीं कि पिता की आज्ञा अन्य सभी की आज्ञा से ऊपर होती है और अगर तुम्हें ये ज्ञात है तो तुम अपने पति को मेरे स्वागत हेतु क्यों नहीं उठा रही। जान पड़ता है कि इस छलिए के साथ रहते-रहते तुम अपने पिता का सम्मान करना भी भूल गई हो।  देवी लक्ष्मी ने भृगु की दंभ भरी बातें सुनी, किंतु ये जानकार कि ये प्रभु की माया से ग्रसित हैं, उन्होंने कुछ नहीं कहा। अब भृगु भगवान विष्णु की ओर मुड़े और ऊंचे स्वर में कहा, हे नारायण! क्या आपको ये भी नहीं पता कि अपने अतिथि का स्वागत सत्कार कैसे करना चाहिए?               

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