विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे…

बुद्धिइंद्रियाणि श्रवण त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात।

वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थः कर्मेंद्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ।।

श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा ये पांच ज्ञानेंद्रियां हैं, क्योंकि इनसे विषय का ज्ञान होता है तथा वाक, पाणि,पाद, गुदा और उपस्थ ये कर्मेंद्रियां हैं, क्योंकि इनका कर्मों की ओर झुकाव होता है। इनके द्वारा कर्म किए जाते हैं।

निगद्यतेऽन्तःकरणं मनोधी-रहकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः।

मनस्तु संकल्पविल्पिनादिभि- र्बुद्धि : पदार्थध्यवसायधर्मतः अन्नाभिमानादहमित्यहंकृतिः स्वार्थानुसंधानगुणेन चित्तम।।

अपनी वृत्तियों के कारण (याकि कार्यभेद से) अंतःकरण को ही मन, बुद्धि,चित्त और अहंकार (इन चारों नामों से) पुकारा जाता है अर्थात ये अंतःकरण ही भेद हैं। संकल्प-विकल्प के कारण मन पदार्थ का निश्चय करने के कारण बुद्धि अहम्-अहम्(मैं-मैं) ऐसा अभिमान करने से अहंकार और अपना ईष्ट चिंतन करने के कारण यह चित्त कहलाता है।

प्राणापानव्यानोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः स्वयमेव  वृत्तिभेदाद्विकृति भेदात्सुवर्लिलादिवत।।

अपने विकारों के कारण, सुवर्ण और जल आदि के समान प्राण ही वृत्तिभेद से प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान इन पांच नामों वाला ही होता है।

वागादिपंच श्रवणादिपंच प्राणादि पंचाभ्रमु  खानि पंच।

बुदध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सुक्ष्मशरीरमाहुः।।

वागादि पांच कर्मेंद्रियां,श्रवणादि पांच ज्ञानेंद्रियां, प्राणादि पांच प्राण, आकाशदि पांच भूत, बुद्ध आदि अंतःकरण चतुष्टय, अविद्या तथा काम और कर्म इसे पुर्यष्टक अथवा सूक्ष्म शरीर कहते हैं।

इदं शरीरं शृंणु सूक्ष्मसंज्ञितं  लिंगं त्वचंचीकृतभूतसंभवम।

सवासनं कर्मफलानुभावकं  स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः।।

यह सूक्ष्म अथवा लिंग शरीर अपंचीकृत पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुआ है। यह वासनायुक्त होकर कर्मफलों का अनुभव करता है और स्वरूप का ज्ञान होने के कारण आत्मा की अनादि उपाधि है।

स्वप्नो भवत्यस्य विभक्तयवस्था स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र।

स्वप्ने तु बुद्धिः स्वयमेव जाग्रत कालीननानाविधिपासनाभिः कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते यत्र स्वयंज्येतिरयं परमात्मा।।

स्वप्न इसकी अभिव्यक्ति अवस्था है, जहां यह स्वयं ही बचा हुआ भासित होता है। स्वप्न में जहां यह स्वयंप्रकाश, परमात्मा, शुद्ध चेतन ही (भिन्न-भिन्न पदार्थों के रूप में) भासता है, वहां बुद्धि जाग्रत काल की नाना प्रकार की वासनाओं से कर्ता आदि भावों को प्राप्त होकर स्वयं ही वैसी प्रतीत होने लगती है।

धीमात्रकोपाधिरशेषसाक्षी न लिप्यते तत्कृतकर्मनलेशैः यस्मादसंबस्तत एव कर्मभिर्न लिप्यते किंचिदुपाधिना कृतैः।।

बुद्धि ही जिसकी उपाधि है, ऐसा वह सर्वसाक्षी बुद्धि के किए हुए कर्मों से असंग होने के कारण तनिक भी लिप्त नहीं होता। अतः उपाधिकृत कर्मों से असंग रहता है।

सर्वव्यापृतिकरणं लिंगमिदं स्याच्चिदात्मनः पुंसः वास्यादिकमिव तक्ष्णस्तेनैवात्मा भवत्यसंयोगयम।।

यह लिंगदेह चिदात्मा बढ़ई के वसूले की तरह पुरुष के संपूर्ण व्यापारों का कारण है। इसलिए यह आत्मा असंग है।                                               

You might also like