संकल्प ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार यह बयान दोहराया था-‘‘जिन्होंने देश को लूटा है, उन्हें पाई-पाई लौटानी पड़ेगी। 2014 से अब तक कइयों को जेल के दरवाजे तक भेज चुका हूं। कुछ जमानत पर हैं या कुछ कोशिश में इधर-उधर भाग रहे हैं, लेकिन अगले पांच साल में उन्हें जेल में डालने का वक्त है…।’’ प्रधानमंत्री का यह बयान चुनावी के साथ-साथ राजनीतिक भी था, लेकिन इसे ‘सियासी खुन्नस’ करार नहीं दिया जा सकता। कांग्रेसी लगातार यही भाषा बोल रहे हैं कि प्रधानमंत्री के विरोधियों के साथ ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के तहत काम किया जा रहा है। बेशक जांच एजेंसियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री के अधीन काम करती हैं, बेशक वे सरकार की आंख का इशारा भी समझती हैं, लेकिन इसी आधार पर एजेंसियां किसी भी मासूम को अपमानित या प्रताडि़त कर सकें, ऐसा भारतीय लोकतंत्र में संभव नहीं है। ऐसे निर्णय अदालतें करती हैं, जिनके नीर-क्षीर विवेक पर किसी को भी संदेह नहीं है। बेशक प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी बयान में भी राजनीति निहित थी, लेकिन उसी आधार पर ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ का संकल्प नहीं किया जा सकता। कांग्रेस नेता, पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री पी.चिदंबरम की गिरफ्तारी तो झांकी भर है। इस फेहरिस्त में कई बड़े राजनेताओं के नाम हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के दाग हैं। सीबीआई और प्रवर्त्तन निदेशालय (ईडी) पूछताछ के जरिए जांच कर रहे हैं। इस सूची में अधिकतर कांग्रेस के चेहरे ही ‘लांछित’ हैं। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों ही ‘नेशनल हेराल्ड’ अखबार के मामले में जमानत पर हैं। गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर  जमीन घोटाले के कई आरोप हैं और ईडी ने पूछताछ के लंबे दौर निपटाए हैं। अब फैसले अदालतों के विचाराधीन हैं। जमीन घोटालों में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी फंसे हैं और अदालत की पेशियां झेल रहे हैं। वह भी जमानत पर हैं। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में संदिग्ध हैं। हालांकि उन्हें अभी तक सीबीआई या ईडी के सख्त सवालों का बार-बार सामना नहीं करना पड़ा है। उत्तराखंड के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत पर, सदन में बहुमत के जुगाड़ के मद्देनजर, विधायकों की खरीद-फरोख्त का केस चल रहा है। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर आय से ज्यादा संपत्ति का मामला लंबे वक्त से अदालतों में है। फैसला आएगा, तो वरिष्ठ कांग्रेस नेता की नियति भी स्पष्ट होगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। वह अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले में आरोपी हैं, लेकिन गिरफ्तारी में वह क्या खुलासे करते हैं, यह महत्त्वपूर्ण होगा, क्योंकि कइयों की पगडि़यां उछल सकती हैं। कांग्रेस से भाजपा की तरफ जाएं, तो उधर भी कई चेहरे ‘दागदार’ नजर आते हैं, लेकिन जांच एजेंसियों का लंबा हाथ उन तक कम ही बढ़ रहा है। नारायण राणे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। उन पर कई आरोप हैं, लेकिन अब वह भाजपा में आ गए हैं, तो जांच की गति भी थम गई है। ऐसा ही तृणमूल से भाजपा में आए मुकुल रॉय और कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए हेमंत बिस्वा सरमा के साथ हुआ है। तेलुगूदेशम पार्टी छोड़कर राज्यसभा में जो चार सांसद ‘भाजपामय’ हुए थे, उन पर भी घपलों के काले दाग हैं, लेकिन वे भी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल और उनके परिजनों पर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। निष्कर्ष यही है कि भाजपा ऐसी गंगा है, जिसमें प्रवेश कर ही नेता पवित्र हो जाते हैं। भ्रष्टाचार के संदर्भ में यही राजनीति है। प्रधानमंत्री मोदी का ब्रह्म वाक्य-‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’-अधूरा सा लगता है। भारत बुनियादी तौर पर तभी भ्रष्टाचार मुक्त हो पाएगा, जब भ्रष्टाचार की किसी भी जड़ पर बराबर का प्रहार किया जाएगा। हम सभी आरोपियों को एक ही तराजू में नहीं तोलते। यदि चिदंबरम का केस पक गया है, तो उन्हें ‘पिंजरे’ में जाना ही था। इसी तरह भाजपा नेताओं के आरोपों की भी निरंतर जांच होनी चाहिए, ताकि वे एक निष्कर्ष तक पहुंच सकें। कांग्रेस भी भ्रष्टाचार से सबक सीखने की कोशिश करे, क्योंकि उसके साथ ऐसा दागदार इतिहास चिपका है। कमोबेश भ्रष्टाचार को ‘सत्य की लड़ाई’ कहना छोड़ दें। बहरहाल भ्रष्टाचार भारत के औसत मानस में मौजूद है, लिहाजा उसकी सफाई तक ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ की कल्पना करना भी बेकार है।

 

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