सावन में कविताओं के झूले

Aug 25th, 2019 12:05 am

तन को शीतल करतीं कविताओं ने बाकायदा मौसम के झूले तैयार किए, तो मन की निर्मलता में गहरे तक प्रवेश करते कवियों ने योल कैंप के वेद मंदिर में अपने-अपने आसन जमा दिए। कांगड़ा लोक साहित्य परिषद के तत्त्वावधान में करीब दो दर्जन कवियों ने वर्षा ऋतु की कविताओं से मन के अनेक आंगन धो दिए। डा. कंवर करतार ने काले महीने की विरह में नव दुल्हन के भाव को ‘काला महीना – है घनघोर बादल, इठलाती धरा परिधान हरयावल! रिवाज व रीतें निभाती यह दुनिया, नव दुल्हन तेरे घर उदास बाबुल! तापित विरह से व्याकुल हुआ मन, पहुंचूं कैसे प्रियतम के आंगन’ में पिरो कर समां बांधा, तो डा. युगल डोगरा ने ‘फूलों के बहकने का अंदाज अलग है, चिडि़यों के चहकने का राज अलग है’, के तहत सावनी मिजाज को अलंकृत किया। ‘ये मंदिर भी सूना, ये मस्जिद भी सूनी। मंदिर के कुछ फूल मस्जिद में लाओ, आओ यहां वेदगान सुनाओ’ जैसी पंक्तियों की पांत बिछा कर राजकुमार त्रिगर्ति ने अपने विमर्श का इंद्रधनुष दिखाया, तो प्रभात शर्मा ने पहाड़ी भाषा में सावन के मायनों की सांस्कृतिक छटा बिखेर दी। डा. अदिति गुलेरी ने पहाड़ की मिट्टी से बारिश के स्पर्श का जिक्र कुछ यूं किया, ‘बरस जाएं सारी बूंदें – यादें जलती-बुझती हैं।’ ‘बद्दल बरा दे’ में अपनी लोक स्मृतियों के आईने में डा. कुशल कटोच चुटकियां लेते दिखे, तो सावन के परिदृश्य में सुरेश भारद्वाज सवाल पूछते हैं, ‘क्यों खाती भाव सखी।’ ‘चल बंदिया तेरे शहर बसिए’ में पंकज कश्यप बरसाती मौसम के घुंघरुओं की तान छेड़ देते हैं और जब कविता कुछ और आगे बढ़ती है, तो सतपाल घृतवंशी लोक संस्कृति की लोक भावन तस्वीर पेश कर देते हैं। सावन के मात्रात्मक व गुणात्मक पहलुओं पर कवि सम्मेलन को पूरी तरह भिगोने में डा. गौतम शर्मा व्यथित की सुरमयी आवाज से निकली पंक्तियां झंकार पैदा करती हैं, तो मेघ की तरह गुनगुनाते मंजर पर अपनी थाप बजाते डा. प्रत्यूष गुलेरी भी थप-थप और छप-छप कर देते हैं। रमेश मस्ताना ने सावनी शृंगार से विभोर शब्दों को निचोड़ा तो, ‘दरिया भी आर-पार है, जाना भी उस पार है’ में साजन के इंतजार की नाव को किनारा मिल जाता है। मौसम की अठखेलियों में डा. विजय पुरी और भूपेंद्र जम्वाल की कविताएं मेघ की तरह मंजर को गुनगुना कर श्रोताओं के मन में गुदगुदी पैदा करती हैं। अश्विनी धीमान की ‘सौणे दी रुत’ और अपनी लय में ‘सुआद बसदा लूणे च मित्रा, बाकी तुड़के छेड़े न’ में दुर्गेश नंदन का गीत कहीं सितार के हर तार को बजा देता है। युवा कवियों में कश्मीर सिंह, गोपाल शर्मा व लोकेश नंदन की कविताएं परिमार्जित होती हैं तथा साहित्य की संभावना में अपना स्थान सुनिश्चित करती हैं। अंत में वेद मंदिर के प्रांगण में स्वामी रामस्वरूप के आशीर्वचनों के बीच कविताओं की बरसात जब लय में आती है और ‘ऋतु सावन, मनभावन होती, भीगी चादर दामन होती, धूप-छांव हर आंगन होती’ की स्वर लहरियों में डा. व्यथित के योगदान को सुना जाती हैं।

नारी वजूद से निकली कविताएं

‘नावों के रुख की, जो यह पा न सके हम! उन सदाओं में डूब जाना जरूरी है खुद के लिए’ – ये पंक्तियां औरत के अक्स और नक्श में डा. अदिति गुलेरी के संग्रहण ‘बात वजूद की’ को एक अलग मुकाम पर खड़ा कर देती हैं। औरत की संपूर्णता का कवितामय होना या कविता के संघर्ष में नारी का होना अगर सत्य है, तो इस पुस्तक में समाज का लेखा-जोखा, रिश्तों, ख्वाबों और वादों की कई हदें तथा शिकवे हैं। यादों और स्मृतियों के कई झरोखे खुलते हैं। यहां ‘दादा जी’ हैं, पापा के करीब ‘कवि की बेटी’ होने की दौलत है, साथ ही कवयित्री का एहसास उस पालने की तरह है जहां कोई ‘नन्हा शैतान’ अपने छोटे हाथों की कसरत में कवितामय सृजन का उद्गार करता है। कुछ कविताएं मखमली हैं, इश्क की गवाही देती हैं या किसी सैलाब में बहते हुए कह उठती हैं, ‘इक्क नाव इक्क खेवट, डूब भी जाएं भंवर में। गम नहीं – जल भी जाएं अग्न में, कम नहीं।’ कविताओं के लहजे में सादगी का बोध, इनसानी फितरत के तकाजे तथा रूह से निकले प्यार की अभिव्यक्ति के बीच, उनके सवाल, सोच के दायरे और जवाब की परिभाषा में ‘इश्क की गवाही, तुम नहीं – तुम्हारी आंखें देती हैं। बातों की रुसवाई तुम नहीं, तुम्हारी तड़प देती है’ तक पहुंचने का क्रम नारी लेखन को किताब के जरिए खूबसूरत नुमाइंदगी देता है। कुल एक सौ एक कविताओं का माल्यार्पण, ‘बात वजूद की’ संग्रहण में हुआ है। खासियत यह भी है कि अदिति अपनी कविताओं के मार्फत पाठक से जिंदगी के तरानों का सहज मिलन कराती हैं और बेसबब होती मजबूरियों से हटकर विशुद्ध साहित्यिक नपाई करती हैं, ‘जी हां! जलते हैं, बुझते हैं – हम खुद से कभी-कभी। औरों की हम क्या कहें – रूठते हैं, खुद से भी कभी-कभी।’ स्त्री संवेदना से निकली किताब, ‘मेरा जिस्म पड़ा है उसी धरा पर, मां की कोख पश्चात। अपना पहला कदम मैंने रखा था जिस धरा पर’, सुनाते हुए मां की लोरियों से अंगारे चुन लेती है, तो अपने एहसास में मोती बनकर, ‘इक्क हंसी इक्क उदासी, जो पल-पल हंसाती – जो पल-पल रुलाती। तुम्हारे वजूद के उस एहसास के साथ में’ तक कई बिंब परोस देती है।   

-निर्मल असो

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